यूपी चुनावी दंगल 2022: संगीत के इस तीर्थ पर पलायन की बात करने वाले आज तक न बनवा सके एक कराना घराने का स्मारक

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यूपी चुनावी दंगल 2022: संगीत के इस तीर्थ पर पलायन की बात करने वाले आज तक न बनवा सके एक कराना घराने का स्मारक

देश में संगीत की परंपरा को गति देने वाले किराना धराना को आज कैराना को सभी दल भूल गए हैं। विधानसभा चुनाव के माहौल में किराना घराना न उस भाजपा को याद कर है जो कैराना में पलायन का मुददा उठा रही है और न सपा रालोद का गठबंधन। जबकि कैराना के किराना घराने ने देश की संगीत परंपरा को कायम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मेरठ। यूपी चुनावी दंगल 2022 – संगीत के माहिर किराना घराना ने अपने हुनर पर देश में अपनी सुरमई पहचान बनाई। इस घराने ने मोहम्मद रफी,मन्ना डे जैसे फनकारों ने यहां से संगीत का हुनर सीखा और पूरी दुनिया में अपने गायन का लोहा मनवाया। किराना घराने के संगीत की रोशनी से जगमगाए देश के प्रसिद्ध फनकारों के गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं। लेकिन राजनीति के चलते ये कैराना का ये संगीत घराना आज भी उपेक्षा का शिकार है। कैराना में किराना घराना के जिस उस्ताद अब्दुल करीम खां ने देश में संगीत को एक से एक विख्यात कलाकार दिए वहीं आज राजनैतिक दलों के चुनावी एजेंडे से गायब हो गए हैं। आज कैराना में पलायन का मुददा तो प्रमुखता से भाजपा उठा रही है और सपा रालोद गठबंधन भाईचारे की बात कर रहा है लेकिन वो किराना घराने को पुन स्थापित करने की बात नहीं कर रहा है। बता दें कि कैराना आगमन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संगीत के किराना घराना का जिक्र तो किया।

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लेकिन वे कैराना पलायन पर आकर किराना घराने को पहचान देने की बात भूल गए। अफसोस है कि इस किराना घराने पर राजनीति कभी संजीदा नहीं हुई। आज भले ही सरकारी सहायता न मिलने पर किराना घराना के संस्थापक अब्दुल करीम खां समेत उनके परिवार के दर्जनों लोग कैराना से पलायन कर गए हो लेकिन इनको बुलाने की बात कोई नहीं कर रहा है। उस्ताद अब्दुल करीम खां, अब्दुल वहीद खां, सारंगी वादक शकूर खां जैसे कैराना कस्बे के हुनरमंदों के जर्जर मकान उनके अतीत की कहानी कह रहे हैं। कभी मैसूर,जयपुर और बडौदा राजघराने की शान रहे उस्ताद अब्दुल करीम खां का जन्म इसी कैराना में 18 के दशक में हुआ था। जिन्होंने अपने पिता उस्ताद काले खां से संगीत की कला सात-आठ साल की उम्र में सीखी थी। गायन और सारंगी वादन में अब्दुल करीम को सिद्धहस्त था। कैराना में तवज्जों नहीं मिली तो बीस साल की उम्र में कस्बा छोड़ दिया और राजघराने की शान बन गए।

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कभी आए भे मन्ना डे और भीमसेन जोशी :

कैराना में मन्ना डे और पंडित भीमसेन जोशी आए थे। जिन्होंने उस्ताद अब्दुल करीम से संगीत की शिक्षा ली थी। 1964 में जब पंडित भीमसेन जोशी कैराना आए तो उन्होंने उस्तााद अब्दुडल करीम के घर को बाहर से सजदा किया था। प्रसिद्ध गायक मन्ना डे 1970 में कैराना आए। उस दौराना मेला छडियाना चल रहा था। इस दौरान वे अपनी चप्पल उतारकर कैराना घूमे थे। मन्ना डे ने कहा था ये गुरु की भूमि और संगीत का तीर्थ है। तीर्थ में चप्पल पहनकर घूमना नहीं चाहिए।

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