यूपी चुनावी दंगल 2022: गर्म चुनावी फिजा में शांत दलित मतदाता ने बढ़ाई सियासी दलों की बेकरारी

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यूपी चुनावी दंगल 2022: गर्म चुनावी फिजा में शांत दलित मतदाता ने बढ़ाई सियासी दलों की बेकरारी

मेरठ। यूपी चुनावी दंगल 2022 – गर्म चुनावी फिजा में इस बार दलित मतदाताओं की शांति ने सियासी दलों की बेकरारी बढ़ा दी है। दलितों की आबादी 20 प्रतिशत है। ये वो आबादी है जो मूड में आने पर किसी को भी सत्ता का स्वाद चखा सकती है। बसपा इन्हीं दलितों के सहारे सत्ता पर काबिज होती रही और मायावती को इसी समाज ने 4 बार सूबे का मुख्यमंत्री बना दिया। लेकिन इस बार 2022 के विधानसभा चुनाव में ये दलित मतदाता की चुप्पी राजनैतिक दलों की समझ से परे दिखाई दे रही है।

लेकिन दलितों के वोटों को हासिल करने के लिए प्रत्याशी और राजनैतिक दल मेहनत कर रहे हैं। प्रदेश के दलित वोट बैंक को साधने के लिए जहां भाजपा और आरएसएस मेहनत कर रहे हैं। वहीं दूसरे दल सपा और कांग्रेस भी दलितों को मनाने में जुटे हैं। भाजपा जहां अपनी सत्ता बचाने के लिए चुनाव को चुनौती के रूप में ले रही है। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस,गठबंधन और बसपा सत्तादल भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। भाजपा के दिग्गज स्टार प्रचारकों ने जहां पहले चरण के चुनावी जनसंपर्क अभियान में एक—एक जिले को पूरी तरह से मथ डाला है।

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इसके अलावा पीएम नरेंद्र मोदी,गृहमंत्री अमित शाह और सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी जनसंपर्क कर चुनाव को भाजपा के पक्ष में करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बसपा की मायावती अब चुनाव प्रचार अभियान पर निकली हैं तो वहीं कांग्रेस की प्रियंका गांधी अकेले ही पूरे चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। इन सबसे बावजूद भी सभी की नजरें दलित मतदाताओं पर टिकी है। इस बार दलित वर्ग के थिंक टैंक में गहन मंथन चल रहा है।

पहले के चुनाव में कमाल करते रहे हैं दलित मतदाता :

प्रदेश का दलित मतदाता अपनी वोट की अहमियत और उसकी ताकत को समझता है। यहीं कारण है कि इसी दलित मतदाताओ के बदौलत मायावती सत्ता के शिखर तक पहुंचती रही है। बसपा पहली बार विधानसभा चुनाव में 1993 में उतरी थी। इस चुनाव में दलित के वोटो के बदौलत उसकी मत में भागीरादी 11.12 प्रतिशत रही थी। इस चुनाव में बसपा 67 सीट जीत सकी थी। उसके बाद वर्ष 1996 में विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट बैंक बढ़ा और ये 19.64 प्रतिशत तक जा पहुंचा। 2002 में दलितों के मतों के बदौलत बसपा का वोट प्रतिशत 23.06 रहा और मायावती को 98 सीटें मिली थी। विधानसभा चुनाव 2007 में तो बसपा ने कमाल ही कर दिया। जब पार्टी को 30.43 फीसदी वोट मिले और 206 सीट जीतकर मायावती ने अपनी सरकार बनाई। हालांकि इसमें बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का भी कमाल रहा था।

2012 गिरना शुरू हुआ बसपा का वोट ग्राफ

विधानसभा चुनाव 2012 में हुए तो इस चुनाव में बसपा को काफी नुकसान हुआ। 2007 में 206 सीटें जीतने वाली बसपा सौ के आंकड़े से नीचे आ गई और पार्टी को मात्र 80 सीटें ही मिली। वहीं इसका मत प्रतिशत भी कम होकर 25.95 प्रतिशत पर आ गया। 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट प्रतिशत और घटा और ये 22.24 प्रतिशत हो गया। इस 2017 के चुनाव में बसपा मात्र 19 सीटों पर सिमट गई। इतना सब कुछ होने के बाद भी बसपा का दलितों से मोह भंग नहीं हुआ आज ​बसपा इसी दलितों के बूथे मैदान में ताल ठोक रही है।

पश्चिमी उप्र में दलितों की सबसे अधिक संख्या जाटव,खटीक,वाल्मीकि,पासी जैसी बिरादरियों की है। लेकिन इनमें सबसे अधिक वोटर संख्या यानी 50 प्रतिशत पर जाटव का कब्जा है। भाजपा के दलित नेता चरण सिंह लिसाडी का कहना है कि आज दलित अपने वोटों की कीमत जान गया है। इसलिए वो अब एक जगह वोट नहीं करता। जहां उसको अपना और समाज का लाभ दिखाई देता है वहीं दलित समाज वोट करता है। दलित चिंतक सतीश कुमार का कहना है कि दलितों को लेकर हमेशा से राजनीति होती रही है। राजनैतिक दल अपने लाभ के लिए इस समाज को मोहरा बनाते रहे हैं। अब मुददे के साथ ही सुरक्षा और सम्मान भी प्राथमिकता पर है। ऐसे में जरूरी नहीं कि दलित एक ही जगह वोट करें।

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दलित प्रभाव वाले जिले :

पश्चिमी उप्र में दलितों के प्रभाव वाले जिलों में मेरठ,आगरा,मथुरा, हापुड, बुलंदशहर, मुरादाबाद, बिजनौर, रामपुर, सहारनपुर,नोएडा इत्यादी हैं। इन जिलों में दलितों का मत चुनाव को पलटने में बड़ी भूमिका निभाता रहा है। आगरा में दलितों की अच्छी खासी संख्या है। इसके बाद सहारनपुर में दलितों मतदाताओं की संख्या काफी है। इसलिए ही मायावती ने अपने चुनावी अभियान की शुरूआत आगरा से की है।

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