By: Dheeraj Upadhyay
लखनऊ: यूपी विधानसभा चुनाव का घमासान हर चरण के साथ और दिलचस्प होता जा रहा है। एक तरफ जहाँ गठबंधन के पक्ष में माहोल दिखता है तो दूसरी तरफ कम वोटिंग कुछ और संकेत देती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट बेल्ट में पहले चरण के मतदान और मुस्लिम बहुल जिलों में दूसरे चरण के मतदान के बाद, लड़ाई अब तीसरे चरण में सपा के गढ़ ‘यादव लैंड’ में पहुँच चुकी है।
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यूपी विधानसभा चुनाव का तीसरा चरण यूपी के 16 जिलों में फैली 59 सीटों पर होगा।
इसमें पश्चिमी यूपी के 5 जिले- फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, कासगंज और हाथरस शामिल है। वहीं इस चरण में अवध क्षेत्र के भी 6 जिले- कानपुर, कानपुर देहात, औरैया, कन्नौज, इटावा, फर्रुखाबाद शामिल है। साथ ही बुंदेलखंड क्षेत्र के 5 जिले- झांसी, जालौन, ललितपुर , हमीरपुर और महोबा में भी मतदान होना है।
यह क्षेत्र कभी समाजवादी पार्टी (सपा) का गढ़ हुआ करता था, लेकिन 2017 में यह लगभग धराशायी हो गया था। जबकि 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा ने इस क्षेत्र की 59 में से 37 सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि, इस क्षेत्र की राजनीति में नया मोड़ तब आया जब 2017 की मोदी लहर में यह किला ढहता नजर आया और बीजेपी ने 59 में से 49 सीटें जीती, वही सपा को केवल 9 सीटों से संतोष करना पड़ा। जबकि कांग्रेस को एक सीट मिली और बसपा का खाता भी नहीं खुल सका।
साल 2017 में यादवों का गढ़ कहे जाने वाले फिरोजाबाद, कासगंज, एटा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, कन्नौज और औरैया में भी अखिलेश को समर्थन नहीं मिला था। इस क्षेत्र से सपा को 30 में से केवल 6 सीटें मिली थीं, जबकि भाजपा ने 23 सीटे जीती थी। वही 2012 में सपा ने 25 सीटें जीती थीं और भाजपा ने केवल एक सीट जीती थी।
तीसरे चरण में अखिलेश के लिए अहम चुनौती
तीसरे चरण में सबसे कड़ा मुकाबला यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिए भी है, जो नामांकन दाखिल करने के मामले में आगे-पीछे होते नजर आए। सपा अध्यक्ष ने पहले आजमगढ़ से चुनाव लड़ने के संकेत दिए, जो जातीय समीकरण के हिसाब से सपा का दूसरा गढ़ है। लेकिन अखिलेश ने आजमगढ़ के स्थान पर यादव बाहुल्य करहल (मैनपुरी) को चुना।
मैनपुरी यादव परिवार का मजबूत गढ़ रहा है जहां मुलायम सिंह यादव भी 2019 के लोकसभा चुनाव में सांसद बने थे। मुलायम इस सीट से चार बार सांसद रह चुके हैं। उन्होंने 1996, 2004, 2009, 2019 में सीट जीती। 2014 में, मुलायम ने आजमगढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा।
केंद्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल देंगे कड़ी टक्कर
करहल में अखिलेश का मुकाबला करने के लिए बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह बघेल को मैदान में उतारा है जो पार्टी में ओबीसी चेहरा भी हैं। पूर्व में बघेल सपा के पूर्व वफादार और मुलायम सिंह यादव के विश्वासपात्र थे, जो उनके सुरक्षा गार्ड से उनके एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में उभरे थे। मुलायम ही उन्हें 1998 में राजनीति में लाये थे लेकिन 2009 लोकसभा चुनाव में फ़िरोज़ाबाद से टिकट न मिलने के कारण बघेल बसपा में चले गए लेकिन अखिलेश से चुनाव हार गए। फिर 2014 में भी हार गए।
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अखिलेश के लिए इस बार भी शिवपाल से चुनौती रहेगी क्योंकि दिसंबर 2016 में अखिलेश और उनके चाचा शिवपाल यादव के रिश्तो में खटास आ गयी थी जिसका खामियाजा 2017 में परिणामों में देखने को मिला था। वहीं 2019 आम चुनाव में सबसे सुरक्षित कन्नौज सीट डिम्पल यादव, सपा-बसपा गठबंधन के बावजूद भी हार गयी थी। कन्नौज से डिंपल का हारना यादव परिवार के लिए बड़ा झटका था। यही कारण है कि अखिलेश ने अन्य क्षेत्रों में जातीय समीकरणों को साधने के लिए छोटे दलों से गठबंधन करने के साथ अपने चाचा शिवपाल कि पार्टी प्रसपा से भी गठबंधन किया है ताकि सपा यादव लैंड में बढ़त ले सके।

