29 अक्टूबर शनिवार को लाभपंचमी है। कार्तिक शुक्ल पंचमी लाभपंचमी के नाम से जानी जाती है। इसको सौभाग्य पंचमी भी कहा जाता है। जैन धर्म में इसको ज्ञान पंचमी कहते हैं। व्यापारी लोग अपने काम का मुहूर्त आदि लाभपंचमी को करते हैं। लाभपंचमी के दिन धर्मसम्मत जो धंधा शुरू किया जाता है उसमें बहुत बरकत आती है।
संतों-महापुरुषों के मार्गदर्शन-अनुसार चलने का निश्चय करके भगवद्भक्ति के प्रभाव से क्रोध,काम,मोह, लोभ और अहंकार इन पाँचों विकारों के प्रभाव को खत्म करने का दिन भी लाभपंचमी है।
लाभपंचमी के पाँच अमृतमय वचनों को याद रखे जाते हैं।
➡ पहली बात :— भगवान हमारे हैं, हम भगवान के हैं। ऐसा मानने से भगवान में प्रीति पैदा होगी। शरीर, घर, संबंधी जन्म के पहले नहीं थे और मरने के बाद भी नहीं रहेंगे। परमात्मा मेरे साथ सदैव हैं और रहेगा। ऐसा सोचने से लाभपंचमी के पहले आचमन द्वारा अमृतपान का लाभ मिलेगा।
➡ दूसरी बात :— हम भगवान की सृष्टि में रहते हैं। भगवान की बनायी दुनिया में रहते हैं। तीर्थभूमि में रहना पुण्य मानते हैं तो जहाँ हम रह रहे हैं वहाँ की भूमि भी भगवान की है। चाँद,सूरज, श्वास, हवाएँ,धडकन सब भगवान के हैं। हम तो भगवान की दुुनिया में हैं और भगवान के घर में रहते हैं।
➡ तीसरी बात :— आप जो भोजन करते हैं भगवान का सुमिरन करके, भगवान को मानसिक रूप से भोग लगा कर करें। इससे पेट तो भरेगा इसी के साथ ही हृदय भगवद्भाव से भर जायेगा ।
➡ चौथी बात :— माता-पिता, गरीब, पडोसी , जिस किसी की सेवा करो तो यह बेचारा है … मैं इसकी सेवा करता हूँ..मैं नहीं होता तो इसका क्या होता.- ऐसा मत सोचो। भगवान के नाते सेवाकार्य करों।
➡ पाँचवीं बात :— अपने तन-मन को और बुद्धि को विशाल बनाते रहो। घर,मोहल्ले, गाँव , राज्य, राष्ट्र से आगे विश्व में अपनी मति को फैलाते रहो। सबका मंगल, सबका भला हो, सबका कल्याण हो, सभी को सुख-शांति मिले। इस प्रकार की भावना करके दिल को बडा बनाओ। परिवार के भले अपने भले का आग्रह छोड दो। समाज के भले के लिए परिवार हित का आग्रह छोड़ो। एकाकार होकर बदलनेवाले विश्व में सत्यबुद्धि तथा उसका आकर्षण और मोह छोड दो।

