मुआवज़े पर हलफनामे के बहाने दिखी केन्द्र सरकार की मंशा

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मुआवज़े पर हलफनामे के बहाने दिखी केन्द्र सरकार की मंशा

रंजीता सिन्हा
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भले इस कोरोना काल में हताश हो रहे देशवासियों से आपदा में अवसर तलाशने की अपील की हो, हालातों को देखते हुए राज्य सरकारों ने भी आपदा शब्दों का इस्तेमाल सरकारी कागजों पर किया हो, पर खुद केन्द्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट को दिया ताजा हलफनामा महामारी को आपदा नहीं मानता। इस हलफनामे में कहा गया है कि, आपदा कानून के तहत अनिवार्य मुआवजा केवल प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, बाढ़ आदि पर ही लागू होता है। सरकार की ओर से कहा गया है कि अगर एक बीमारी से होने वाली मौत पर अनुग्रह राशि दी जाए और दूसरी पर नहीं तो ये गलत होगा। यहां बात सोचने की है कि, देश में ऐसे हालात हुए जबकि महामारी ने लाखों लोंगों को मौत की नींद सुला दिया, बिजनेस ठप पड़ गये, सैकड़ों की नौकरियां चलीं गईं, परिवार उजड़ गये, अस्पतालों में मरीजों और श्मशान घाटों पर शवों के अंतिम संस्कार को जगह नहीं थी… पर यह सबकुछ क्या आपदा की श्रेणी नहीं था? बस इसलिए कि यह प्राकृतिक आपदा यानि बाढ़, भूकम्प की तरह नहीं था। नतीजतन सरकार पीडि़तों को राहत देने के नाम पर आर्थिक मुआवजा नहीं देगी।

एक खबर के मुताबिक, अर्थ विशेषज्ञ ब्लूमबर्ग ने 12 अर्थशास्त्रियों के अनुमान के आधार पर यह बात कही है कि, कोविड-19 महामारी को खत्म होने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की क्षमता को परखा जाएगा। इसके बावजूद इस बात में कोई शक नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से ग्रोथ करने वाली अर्थव्यवस्थाओ में से एक बनकर उभरेगी। अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. जॉन सी हल्समन का भी मानना है कि त्रासदी के बावजूद भारत धरती पर सबसे तेजी से बढ़ती शक्ति बना रहेगा और अपनी आधारभूत मजबूती के दम पर विश्व में सबसे ताकतवर देशों में शुमार किया जाएगा। डॉ. हल्समन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की भी तारीफ की है। कोविड-19 (कोरोना वायरस) महामारी की दूसरी लहर में रिकॉर्ड मरीजों की संख्या के कारण संकट में घिरने के बावजूद भारत का वैश्विक दबदबा कम नहीं होगा। अमेरिकी विशेषज्ञ भारत के मजबूत आंकड़ों की तरफ इशारा करते हुए आगे कहते हैं कि आर्थिक आंकड़े झूठ नहीं बोलते। उन्होंने दावा किया है कि 2050 तक वैश्विक जीडीपी में भारत की 15 फीसदी हिस्सेदारी हो जाएगी।

अब यहां बात सोचने की यह है कि अगर राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय अर्थ विशेषज्ञ भारत की तस्वीर का इन हालातों में भी इतनी साकारात्मकता से आंकलन कर रहे हैं तो सरकार स्वयं खुद को इतनी निरीह करार क्यों दे रही है? खुद सरकार ने कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वालों के परिजनों को मुआवजा देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर हलफनामा दाखिल कर बताया गया है कि कोरोना से जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को 4 लाख रुपये का मुआवजा नहीं दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट को बताया गया है कि हर किसी कोरोना संक्रमित मरीज की मौत पर मुआवजा देना राज्यों के वित्तीय सामथ्र्य से बाहर है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि करोना की वजह से सरकार आर्थिक दबाव में है। एक तरफ जहां कोरोना की वजह से स्वास्थ्य व्यवस्था पर सरकार को बहुत पैसा खर्च करना पड़ रहा है, वहीं टैक्स वसूली भी बहुत कम हो गई है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति पर काफी दबाव पड़ा है। इसलिए सरकार कोरोना पीडि़त परिवार को चार लाख रुपया मुआवजा आर्थिक मदद के तौर पर नहीं दे सकती। इतना पैसा खर्च करने से कोरोना से लडऩे में सरकार की कोशिशों पर असर पड़ेगा। मुआवजा देने से फायदा कम और नुकसान ज्यादा होगा।

अब सवाल उठता है कि क्या मुआवजा बांट देने से सरकार की कोरोना नियंत्रण की कोशिशों पर असर पड़ेगा या न बांटने से पीडि़त समाज की तकलीफ और भी बढ़ जाएगी? इस सरकार की उम्र अब सात बरस की हो चली है और कोरोना बामुश्किल दो साल का भी नहीं हुआ। अगर एक्सपट्र्स यह कह रहे हैं कि, कोविड-19 के कारण उपजे आर्थिक संकट से बाहर आकर भारत नए सिरे से विकास के सुनहरे युग के लिए तैयार है, इसमें अर्थव्यवस्था के बारे में आईएमएफ के उस अनुमान का भी जिक्र है, जिसमें चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी में 11.5 फीसदी की दर से बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है। ऐसे में क्या सरकार कोविड राहत फंड की ही धनराशि पीडि़तों में शेयर कर दे तो?

सच पूछिये तो भारत सरकार देश में ही नहीं पूरी दुनिया में मोदी सरकार के नाम से लोकप्रिय है। बीते साल सालों में मोदी एक असाधारण व्यक्तित्व के रूप में उभरे हैं, जिनके लिए कुछ भी असंभव नहीं। अमेरिकी डेटा इंटेलिजेंस फर्म मॉर्निंग कंसल्ट द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, मई में कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान लोकप्रियता रेटिंग में गिरावट के बावजूद, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी अन्य वैश्विक नेताओं की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। केवल तीन विश्व नेताओं की स्वीकृति रेटिंग 60 के उपर है जिसमें पीएम मोदी सबसे उपर हैं। ऐसे में भारत को अपने अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता का ध्यान रखते हुए क्या राहत राशि बांटने को लेकर संवेदनशील नहीं होना चाहिये? हलफनामे में अपील मुआवजे की धनराशि कम करने को लेकर भी की जा सकती थी?

बता दें कि रिकॉर्ड के मुताबिक, देश में अब तक कोरोना से महामारी के कारण 3,86,713 लोगों की मौत हो चुकी है। पीडि़तों के लिए डेथ सर्टिफिकेट पर केंद्र ने कहा कि कोविड से हुई मौतों को मृत्यु प्रमाणपत्रों में कोविड मौतों के रूप में प्रमाणित किया जाएगा। कहीं कोविड मरीजों की संख्या को बोझ दिखाने के लिए तो सरकार ने अस्पताल के बाहर कहीें भी किसी भी तरह कोरोना से प्रभावित होकर काल के गाल में समाने वालों की मौतों को भी कोविड डेथ तो नहीं माना? बहरहाल, केंद्र सरकार ने कोर्ट को यह भी बताया है कि आपदा कानून के तहत आपदा की प्रस्थिति में फैसला लेना सिर्फ सरकार का अधिकार है। इसमें कोर्ट दखल नहीं दे सकता।

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