चौथे चरण बाद कहाँ खड़ा है चुनाव

आर्टिकल/इंटरव्यूचौथे चरण बाद कहाँ खड़ा है चुनाव

Date:


चौथे चरण बाद कहाँ खड़ा है चुनाव

अमित बिश्‍नोई

यूपी के सात चरणों के चरणबद्ध चुनाव के चार चरणों का समापन हो गया. इन चार चुनावी आयोजनों में 231 विधानसभा सीटों का नतीजा EVM के गर्भ में भले ही समा चूका हो लेकिन EVM से बाहर चर्चाओं का ज्वार और बढ़ चूका है, लोग बाग़ अभी से ही सरकार बनाने और बिगाड़ने के समीकरण बनाने लगे हैं. जहाँ तक चौथे चरण की बात है तो पहले के चरणों की तरह इस चरण में भी मतदान 2017 की अपेक्षा कम हुआ है और चुनावी पंडित पूरा गुणा भाग इसी मुद्दे पर लगा रहे हैं। बड़े मिश्रित आंकलन सामने आ रहे हैं. मेनस्ट्रीम मीडिया (Mainstream media) पर कुछ और चल रहा है और उससे हटकर नया विकसित हो रहा मीडिया कुछ और इशारा कर रहा है, ज़मीन पर उतरकर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे लोग और कमरे में बैठकर चुनावी आंकलन करने वालों की कहानी बड़ी विरोधाभासी दिख रही है.

Read also: उत्तर प्रदेश चुनाव : आतंकवाद बनता जा रहा है बड़ा चुनावी मुद्दा !

आज हम यहाँ बात करेंगे गुज़र चुके मतदान और अगले चरणों में आने वाले सियासी तूफ़ान की. बात जहाँ तक निपट चुके चार चरणों की है तो वह यकीनन भाजपा के लिए मुश्किल भरे हुए ही नज़र आये हैं. किसान आंदोलन से उपजे तनाव के कारण भाजपा को पहले ही इस बात का एहसास था कि उसे पश्चिमी यूपी की सीटों पर नुकसान उठाना पड़ेगा मगर तीसरे, चौथे और उसके बाद के चरणों में वह अपनी पोजीशन को बरकरार रखते हुए उस नुक्सान की थोड़ा बहुत भरपाई कर लेंगे लेकिन वोटिंग पैटर्न को देखते हुए ऐसा होता प्रतीत नहीं हो रहा है.

जाट लैंड या किसान लैण्ड से निकलकर चुनाव अब काऊ बेल्ट और सोशल इंजीनियरिंग की बेल्ट में प्रवेश कर चूका है. 2017 के चुनाव में भाजपा के चाणक्य अमित शाह (Chanakya Amit Shah) ने जातीय समीकरणों को साधने का जो फार्मूला अपनाया था उसे इसबार अखिलेश यादव ने हथिया लिया है जो आगे आने वाले चरणों में भाजपा को कड़ी चुनौती पेश करेगा, यह निश्चित है. अबतक के हुए चुनाव के बाद जो ख़बरें निकलकर आ रही हैं उससे यकीनन समाजवादी पार्टी के हौसले बुलंद हैं, चुनाव चूंकि आमने सामने का हो चूका है, जिसका अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) को बहुत लाभ मिल रहा है और यह बात भाजपा को भी मालूम है तभी अमित शाह अचानक हाथी के प्रासंगिक होने की बाते करने लगे हैं. भाजपा के चाणक्य के मुंह से बसपा की स्वीकार्यता अचानक प्रकट हुई हो इस बात को कोई भी राजनीति का जानकार नहीं मानेगा। यह बाकायदा चुनावी दांव के रूप में फेंका गया एक पासा है. दरअसल अमित शाह यह नहीं चाहते कि अब बचे हुए चरणों में मुकाबला आमने सामने का हो, वह मुकाबले को त्रिकोणीय बनाना चाहते हैं, वह चाहते हैं कि बसपा का जो वोट आमने सामने की लड़ाई में सपा को जा रहा वह वापस बसपा को जाय. राजनीति में ऐसा होता है जब हालात ऐसे बन जाते हैं कि विरोधी के लिए भी वोट माँगना पड़ता है और अमित शाह का बसपा पर बयान वही सब है.

Read also: अमित शाह ने उत्तराखंड के चंपावत जिले में हुई सड़क दुर्घटना पर जताया दुख , अनिल बलूनी और अजय टम्टा ने भी जताया शोक

अगर हम चार चरणों के हो चुके चुनाव का मिश्रित आंकलन करें तो मुकाबला बराबरी या उसके आसपास का ठहरता हुआ नज़र आ रहा है. इन चरणों कि 231 सीटों पर पिछली बार भाजपा का 191 पर कब्ज़ा था. भाजपा के पक्ष में यह संख्या इतनी बड़ी है कि लोगों को यकीन नहीं हो रहा कि भाजपा को इतना बड़ा नुक्सान हो जायेगा कि वह सत्ता से बेदखल हो जाएगी, क्योंकि बाहर से देखते हुए लहर जैसी तो कोई बात नज़र नहीं आ रही, हाँ अंडर करेंट की बात लोग ज़रूर कर रहे हैं. अब यह अंडर करेंट अगर वाक़ई में है तो यह योगी जी के लिए कितना घातक है यह देखने वाली बात होगी। हो सकता है योगी जी इस करेंट के झटके को सह जांय। बहरहाल अंडर की बात अभी अंडर ही है और अक्सर अंडर ही रह जाती है.

वहीँ अखिलेश के समर्थन में लोगों का यह भी कहना है जब 2012 के समीकरण 2017 में उलट सकते हैं तो 2017 के 2022 में क्यों नहीं? बात में दम भी है. 2017 में मोदी मैजिक रहा था, मुज़फ्फरनगर के दंगों के कारण हालात पूरी तरह भाजपा के अनुकूल थे जो बाद में नतीजों के रूप में सामने आये और भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला और प्रदेश को मुख्यमंत्री के रूप में एक योगी। लेकिन इसबार तो भाजपा के अनुकूल वाले कोई मुद्दे भी नहीं हैं, अभी तो मोदी मैजिक भी नज़र नहीं दिख रहा है शायद उनके भाषणों का स्तर उस लेवल पर पहुँच गया है जहाँ जीत हासिल करने के लिए कुछ भी बोला जा सकता है, यहाँ तक कि विरोधी पार्टी के चुनाव चिन्ह को आतंकी उपकरण बताया दिया गया. एक राज्य के चुनाव में रूस और यूक्रेन (Russia and Ukraine) के बीच चल संघर्ष की बात की जा रही है. पूरे पांच साल छुट्टा जानवरों से परेशान किसानों को अब गोबर थिरेपी दी जा रही है. और मुझे लगता है कि इस चुनाव में अभी बहुत कुछ ऐसा होने वाला जिसके बारे सुनकर वोटर माथा पकड़ने वाला है. मुझे लगता है कि अंतिम तीन चरणों में पश्चिम बंगाल से ज़्यादा गन्दा चुनाव होने वाला है.

Read also: पुतिन ने यूक्रेन में सैन्य अभियान की घोषणा की

बहरहाल वोटर के मन में क्या था और क्या है यह तो वही जाने लेकिन सामने जो दिख रही है वह तस्वीर चार चरणों के बाद भी धुंधली ही है, उम्मीद है कि पांचवें चरण तक यह तस्वीर साफ़ हो जानी चाहिए। इस वक्त मुकाबला योगी-मोदी-शाह (Yogi-Modi-Shah) के अग्रेसिवनेस और अखिलेश के कूलनेस के बीच चल रहा है. भाजपा बुरी तरह इस बात पर जुटी हुई कि अखिलेश की कूलनेस टूटे और उन्हें कुछ मसाला मिले, मगर अबतक भाजपा के हर बाउंसर को आसानी छोड़ते जा रहे हैं, एकबार भी उसे हिट करने की कोशिश नहीं की है और शायद उनकी यह कूलनेस उनके लिए काम कर रही है.

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

जाने माने शायर बशीर बद्र का शुक्रवार को 91...

बढ़ती उम्र में इनके लिए मातृत्व सुख आसान नहीं था!

छोटे पर्दे की कई मशहूर अदाकाराएं लंबे इंतजार और...

आयुष्मान भारत योजना क्या है? पात्रता, लाभ और आवेदन प्रक्रिया

स्वास्थ्य संबंधी खर्च कई परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक...