उदयपुर की घटना के बारे क्या लिखूं और कैसे लिखूं, कहाँ से शुरू करूँ, मन-मस्तिष्क कुंद हो जाता, विचलित हो जाता है जब कोई ऐसी लोमहर्षक घटना होती है, यह भारत है और यहां इस तरह की घटना की कोई जगह नहीं है. ऐसी घटनाये भारत में तो क्या कहीं भी नहीं होनी चाहिए। लेकिन हम मानते हैं कि भारत में इंसान बस्ते हैं और इंसानों की बस्ती में हैवानों का क्या काम. हम तो कहेंगे कि अपने को मुसलमान और नबी का गुलाम कहने वाले उदयपुर कांड के दोनों नौजवान तो हैवान कहने के लायक भी नहीं है, इन्हे सिर्फ शैतान कहा जाना चाहिए जहाँ से हैवान निकलते हैं, या उससे भी कड़ा कोई शब्द जो शायद मुझे नहीं मालूम. नबी के नाम पर सर तन से जुदा करने का नारा लगाने वाले यह वहशी दरिंदे अपने नबी के बारे कितना जानते हैं, उनके बार में कितना पढ़ा है, क्या कहीं पर नबी ने ऐसा कहा है कि जो हमारे बारे में बुरा कहे उसका सिर धड़ से जुदा कर दो.
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उदयपुर में जो कुछ हुआ उससे सबसे ज़्यादा शर्मिंदा आज हिन्दुस्तान का मुसलमान है. हम अपने हिन्दू पड़ोसियों से आँखें नहीं मिला पार रहे हैं क्योंकि हमें मालूम है कि एक सच्चा मुसलमान इस तरह की कार्रवाई का समर्थन कभी नहीं कर सकता। ISIS के मॉड्यूल की कभी पैरवी नहीं कर सकता क्योंकि वह किसी धर्म के लिए लड़ाई नहीं लड़ता, वह शैतानी सोच वालों का एक ऐसा गिरोह है जिसे सिर्फ बर्बादी में यकीन है, तबाही में भरोसा करता है, जो पैसे के लिए हत्याएं करता है और करवाता, इन जैसे लोगों की माली मदद करने वालों की दुनिया में कमी नहीं, हर विघटनकारी इन जैसे तत्वों की मदद करता है. हमें यह नहीं मालूम इस घटना में ISIS का सीधा हाथ या नहीं लेकिन घटना को देखकर यह ISIS से प्रेरित ज़रूर लगता है. भारत में इस शैतानी गिरोह का आना अच्छा शगुन नहीं है. जिन जिन देशों में ISIS या उस जैसी सोच वाले लोगों के, संगठनों के कदम पड़े हैं, बर्बाद ही हुए हैं. ज़रुरत है इस सांप के फन को कुचलने की, ताकि यह किसी को डस न सके.
उदयपुर कांड क्यों हुआ इसके बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन इस कांड को जस्टिफाई हरगिज़ नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया पर आज भी बहुत से लोग इस बारे में क्रिया की प्रतिक्रिया का तर्क दे रहे हैं. हिंसा की प्रतिक्रिया हिंसा नहीं हो सकती, विचारों के विरोध को कुचलने या दबाने का यह कोई तरीका नहीं है. जुर्म होते हैं, जब से दुनिया बनी है तब से हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे मगर अब हर जुर्म पर दो पक्ष हो जाते हैं, एक विरोध वाला और दूसरा समर्थन वाला। सवाल यही है कि जुर्म कैसा भी हो उसका समर्थन कैसे किया जा सकता है? उयदयपुर में भी एक जघन्य अपराध हुआ है जिसका समर्थन तो किसी भी दृष्टिकोण से नहीं किया जा सकता।
इस हत्याकांड को सिर्फ धर्मान्धता की पराकष्ठा ही कहा जा सकता है, धर्म जब तक पूजा तक सीमित रहता है धर्म रहता है लेकिन धर्म जब सोचने समझने की शक्ति छीन ले तो फिर ऐसे ही कन्हैया कांड होते हैं और ऐसे ही गौस और रियाज़ का जन्म होने लगता है, इन लोगों ने किसी व्यक्ति की हत्या नहीं की है बल्कि इस्लाम का नाम लेकर, अपने मज़हब का नाम लेकर घिनावना गुनाह किया, और सिर्फ गुनाह ही नहीं किया है, बल्कि उसकी नुमाइश भी की है. शब्द नहीं मिलते ऐसे दरिंदों की दरिंदगी का वर्णन करते हुए. नूपुर शर्मा ने जो बयान दिया उसपर बड़ी टीका टिप्पणी हुई, हंगामा भी हुआ, हलकी फुलकी हिंसा भी हुई मगर अब सारा मामला शांत था, इस्लामिक देशों ने भी अपना विरोध जताया, भारत ने उसपर प्रतिक्रिया दिखाई, पार्टी ने उसपर कार्रवाई भी की, हो सकता है आप उससे संतुष्ट न हुए हों लेकिन किसी के विचारों की अभिव्यक्ति का बदला इस तरह लेना, कम से कम भारत जैसे देश में तो स्वीकार नहीं है. बहुत से इस्लामिक देशों में इस तरह की वारदातें होती रहती हैं, उसका परिणाम भी वो देश भुगत रहे हैं, ऐसे देशों का नाम लेने से कोई फायदा नहीं। मगर भारत में यह हरगिज़ स्वीकार नहीं।
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सरकार को कुछ सोचना होगा, कुछ करना होगा, यह मामला कोई आम हत्या का मामला नहीं है, यह मामला ISIS या अलक़ायदा की कार्यशैली की नुमाइंदगी कर रहा है. ऐसा भारत में पहली बार हुआ है. सरकार को चाहिए कि वो प्रयास करे कि यह अंतिम हो. आरोपी दबोचे जा चुके हैं, गहन जांच होने चाहिए और हर दोषी को एक मिसाली सजा दी जानी चाहिए। यहाँ मैं बच्चों के माँ बाप से भी अपील करूंगा कि अपने जवान होते बच्चों पर गहरी निगाह रखें क्यों गुनाह आपके बच्चे करेंगे और अपमानित पूरा समाज होगा।

