उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और मजलिस का संभावित गठजोड़

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उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और मजलिस का संभावित गठजोड़

प्रदेश की सियासत पर कितना प्रभाव डाल पायेगा ?

उबैद उल्लाह नासिर

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और मजलिस का संभावित गठजोड़

बिहार में हालांकि मजलिस इत्तेहादुल मुस्लेमीन और बहुजन समाज पार्टी ने मिल कर चुनाव लड़ा था उनके इस गठबंधन में उपेन्द्र कुशवाहा भी शामिल थे लेकिन मजलिस ने मुस्लिम बाहुल्य सीमांचल से जो पांच सीटें जीती है उन में इन दोनों पार्टियों का कितना योगदान था इसका विश्लेषण अभी नहीं हो पाया है लेकिन आम ख्याल यही है की यह जीत मजलिस की अपनी जीत है इसमें इन दोनों पार्टियों का कोई ख़ास योगदान नहीं रहा है I

मिली सूचनाओं के अनुसार 2020 में होने वाले UP विधानसभा के चुनाव के लिए मायावती का मजलिस से गठबंधन हो सकता है I मगर इससे प्रदेश की राजनीति पर कोई ख़ास असर पड़ेगा यह ज़रा मुश्किल दिखाई दे रहा है क्योंकि सियासी तौर से मायावती का ग्राफ बहुत गिर चुका है I BJP के साथ उनका फ़्लर्ट कोई नई बात नहीं है लेकिन इसबार उनका बीजेपी से जो परोक्ष या अपरोक्ष समर्थन है उसमें सियासत से ज्यादा भय शामिल है क्योंकि वह लगातार ED और CBI की रडार पर हैं I दूसरे खुद उनका दलित वोट बैंक भी काफी हद तक बीजेपी छीन चुकी है, मुस्लिम उनसे बीजेपी के साथ के कारण नाराज़ रहते ही थे अब उन्होंने पहले कुंवर दानिश अली और अब मुनकाद अली को उनके ओहदों से हटाकर मायावती ने मुसलमानों को एक गलत पैगाम फिर दे दिया है I ऐसी हालत में ओवैसी से गठ जोड़ कर के वह मुसलमानों का कितना विश्वास हासिल कर सकेंगी यह सोचने वाली बात है I अब राजनैतिक सच्चाई यह है कि दलित न उनके कहने से ओवैसी को और मुसलमान न ओवैसी के कहने से मायावती को वोट देगा I

वैसे भी दलित मुस्लिम सियासी इत्तेहाद की कोशिश 1967 में डॉ अब्दुल जलील फरीदी के द्वारा पहली बार शुरू की गई थी I उस समय डॉ लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के नारे के साथ डॉ फरीदी भी उनके सियासी प्रयोग का हिस्सा बन गए थे इस गैर कांग्रेसवाद से कांग्रेस को जो नुक़सान हुआ वह तो हुआ ही लेकिन सबसे ज्यादा फायदा उठाया आरएसएस ने I राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या के कारण देश भर की नफरत का दंश झेल रहा आरएसएस देश भर में सियासी और समाजी तौर से 1967 तक अछूत बना हुआ था लेकिन लोहिया जी के गैर कांग्रेसवाद के नारे और कांग्रेस को हारने के लिए सभी सियासी पार्टियों के गठ जोड़ संयुक्त विधायक दल (SVD) में आरएसएस की सियासी शाखा जनसंघ भी शामिल हो गयी जिससे उसे न सियासी और समाजी मान्यता मिली बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी भी मिली तब से लेकर अन्ना मूवमेंट तक कांग्रेस के खिलाफ बने हर गठजोड़ में आरएसएस की सियासी शाखा बीजेपी शामिल रही और हर बार सबसे ज्यादा सियासी फायदा भी उसी ने उठाया I उत्तर प्रदेश में मायावती ने तीन बार बीजेपी से मिलकर सरकार बनाई इस तरह उन्होंने न केवल मुसलमानों बल्कि धर्मनिर्पेक्ष समाजवादी लोकतांत्रिक विचारों पर विश्वास रखने वाले लोगों यहाँ तक की आंबेडकर वादियों की भी नज़रों में खुद को संसंदेहास्पद बना लिया है उनकी इस सियासी कलाबाज़ी का सब से ज्यादा नुकसान दलित मुस्लिम सियासी इत्तेहाद का ख्वाब देखने वालों को हुआ I

डॉ फ़रीदी के बाद भी कई बार यह कोशिश हुई लेकिन कभी कामयाब नहीं हो सकी न आइंदा कामयाबी के इमकान हैं क्योंकि कोई भी अन्य पार्टी कभी किसी मुस्लिम नेता को सत्ता में ड्राइविंग सीट नही देगी वह मुसलमानों के आबादी में ज़्यादा होने के बावजूद नम्बर दो पोजीशन पर ही रखेगी I ओवैसी मायावती के सियासी इत्तेहाद में यही होगा कि मायावती फिर मुख्यमंत्री बन जाएँगी मगर इससे मुसलमानों को क्या मिलेगा मंत्रीमंडल में 2-3 मंत्री वैसे भी होते थे इस बार 4-5 हो जायेंगे मगर उनकी हैसियत क्या होती है इसका नदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि गुजरात विधानसभा के चुनाव में मोदी जी की चुनावी मुहीम में मायावती बिना बुलाये ही अपने मंत्री हाजी याकूब क़ुरैशी को लेकर गयी थीं और कुरैशी साहब की इतनी हिम्मत नहीं हुई थी और इतनी गैरत नहीं जागी थी कि वह उनका साथ जाने से इंकार कर देते भले ही उनसे मंत्री पद छीन लिया जाता I

सियासी नाता जोड़ने और तोड़ने में मायावती का रिकॉर्ड बहुत ही शानदार रहा है I उनका पहला सियासी नाता मुलायम सिंह यादव से 1993 में बना था और वह किस तरह टूटा लखनऊ के सरकारी गेस्ट हाउस में क्या हुआ यह शायद आज के नवजवानों को न मालूम हो लेकिन एक बिलकुल नए रंगरूट पत्रकार के तौर पर मैं उसका चश्मदीद गवाह हूँ I उसके बाद मायावती ने बीजेपी से मिलकर सरकार बना ली लेकिन यह सरकार भी अपना समय पूरा करने से पहले ही ढेर हो गयी I विधानसभा के नए चुनावों का एलान हुआ और इसबार मायावती का गठबंधन हुआ कांग्रेस से, चुनाव का नतीजा आया तो यह गठजोड़ सबसे अधिक सीटें तो ले आया लेकिन बहुमत नहीं पा सका सरकार बनना टेढ़ी खीर हो गया क्योंकि जो फार्मूला भी पेश किया जाता उस में मायावती के मुख्य मंत्री बन्ने को लेकर अडंगा लग जाता, मायावती इससे कम पर राज़ी नहीं होती थीं नतीजा यह हुआ की प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाना पडाI तब स्व कांशी राम जी ज़िंदा थे सरकार बनाने का समझौता बीजेपी से कर लिया और कांग्रेस खड़ी मुंह देखती रह गयी भरे जलसा आम में मौलाना बुखारी मरहूम की मौजूदगी में विपक्ष में बैठने लेकिन बीजेपी के साथ सरकार बनाने का वादा धराशायी हो गया प्रेस कांफ्रेंस में जब कांशी राम जी से कहा गया कि यह तो मौक़ा परस्ती है तो उन्होंने सीना ठोंक के कहा था “हाँ मैं पक्का मौक़ापरस्त हूँ “ 6-6 महीने की मुख्यमंत्री वाला यह फार्मूला मायावती का टर्म पूरा होते ही फिर धराशायी हो गया लेकिन बीजेपी उनसे ज्यादा शातिर निकली उसने मायावती ही नहीं कांग्रेस के भी बहुत से विधायकों को तोड़कर अपनी सरकार बना ली I अभी पिछले संसदीय चुनाव में मायावती ने अखिलेश यादव से समझौता किया जो चुनाव ख़त्म होते ही समाप्त हो गया I कहने का तात्पर्य यह है कि मयावती के लिए समझौते करना और अपने सियासी फायदे और सत्ता हासिल करने के लिए उन्हें तोडना कोई मुश्किल काम नहीं उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता I ओवैसी उन से समझौता करके उत्तर प्रदेश की सियासत को बहुत प्रभावित भी नहीं कर पायेंगे लेकिन “पहले हराने के लिए लड़ो फिर जीतने के लिए “ के स्व कांशी राम के फार्मूला पर अमल करते हुए ओवैसी साहब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को नुकसान तो पहुंचा सकते हैं और शायद फिलहाल उनकी राजनीति का मकसद भी यही है लेकिन इससे देश और समाज का जो नुकसान हो रहा है उसकी चिंता न कांशी राम को थी न मायावती को और न शायद ओवैसी साहब को है I

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