देहरादून। उत्तराखंड में अब तक हुए पिछले विधानसभा चुनावों (Assembly Election) का इतिहास उठाकर देखे तो ऐसे कई मिथक चुनाव के दौरान बने हैंं जो कि आज तक कायम हैं। ये सभी पिछले चार चुनावों के के दौरान ही इतिहास दोहराते आ रहे हैं। इस बार ये पांचवा चुनाव है। जिसमें इस बार भी इन मिथकों पर राजनीतिक विश्लेषकों के साथ ही प्रदेश की जनता की नजर है। ये राजनैतिक मिथक काफी दिलचस्पी पैदा करने वाले हैं। आज चुनाव परिणाम (election result)आने वाला है। जिसके बाद पता चलेगा कि प्रदेश में किसकी सरकार बनने जा रही है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही प्रदेश में सरकार बनाने के दावें कर रही हैं। लेकिन यहां पर वो मिथक बता रहे हैं जो कि पहाड़ की सियासत में एक सियासी परंपरा की तरह हैं। पहला मिथक यही है कि उत्तराखंड में पिछले चार चुनावों में कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा की सरकार बनी है। यानी पिछले चार चुनाव में कोई एक पार्टी फिर से दोबारा रिपीट नहीं हुई है। यानी किसी एक पार्टी ने दोबारा कुर्सी हासिल नहीं की है।
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2002 में कांग्रेस आई तो 2007 में भाजपा ने सरकार बनाई। 2012 में कांग्रेस की वापसी हुई तो 2017 में भाजपा सत्ता में आई। अब देखते हैं कि यह मिथक टूटता है या फिर बना रहेगा। सीएम रहते चुनाव जीतना भी एक प्रकार का मिथक है। माना जाता है कि सीएम रहते जो भी चुनाव लड़ा वह हार गया। 2002 में चुनाव जीतकर एनडी तिवारी सीएम बने उसके बाद से उन्होंने प्रदेश में कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा। 2007 में बीसी खंडूरी मुख्यमंत्री बने और 2012 में वह चुनाव हार गए। 2012 में कांग्रेस से चुनाव जीते विजय बहुगुणा ने 2017 में चुनाव नहीं लड़ने का मन बनाया। बहुगुणा के बाद प्रदेश के सीएम बने हरीश रावत ने 2017 के चुनाव में दो सीटों से चुनाव लड़ा। लेकिन वो एक पर भी चुनाव नहीं जीत सके। मौजूदा कार्यकाल में भाजपा के दो सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत व तीरथ सिंह रावत चुनाव मैदान से बाहर हैं। मौजूदा सीएम पुष्कर धामी ही चुनाव मैदान में हैं। देखना है कि क्या सीएम धामी चुनाव जीतकर उत्तराखंड में नया रिकॉर्ड बना पाएंगे।

