अमित बिश्नोई
रामायण में लिखा है कि जब लक्ष्मण जी मुर्छित हो गये थे उस समय हनुमान जी ने संजीवनी बूटी लाकर उनकी जान बचाई थी, भारतीय राजनीती में कांग्रेस की दशा भी उस मूर्छित इंसान जैसी ही है जो धीरे धीरे मरणासन की ओर बढ़ रहा है और जिसे आज एक हनुमान की तलाश है जो संजीवनी लाकर उसकी जान बचा सके. देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए आज के दौर में हनुमान कौन साबित हो सकता है इसके लिए अगर हम नज़र दौड़ाएं तो एक ही चेहरा नज़र आता है और वह है PK यानी भारतीय राजनीति के धुरंधर रणनीतिकार प्रशांत किशोर। कांग्रेस को फिर से ज़िंदा करने के दावे तो बहुत से लोग करते हैं लेकिन प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) के अलावा किसी और के पास मूर्छित कांग्रेस को होश में लाने की क्षमता दूर दूर तक नहीं दिखाई देती।
प्रशांत किशोर(Prashant Kishor) कांग्रेस के कई बार करीब आ चुके हैं, राहुल और प्रियंका से रिश्ते भी अच्छे हैं, कुछ समय पहले उनके कांग्रेस पार्टी में जाने की बातें भी खूब चर्चा में थीं, मामला लगभग तय हो गया था मगर फिर वही ढाक के तीन पात, कांग्रेस पार्टी एकबार फिर निर्णय लेने में नाकाम रही और पीके नज़दीक आते आते एकबार फिर दूर हो गए. अब एकबार फिर दोनों की नज़दीकियों की चर्चा हो रही है, प्रशांत किशोर इसे आधिकारिक रूप से मान भी रहे हैं कि हाँ गुजरात को लेकर कांग्रेस से बात चल रही है लेकिन वह इसके बारे में कुछ भी बताने से मना भी करते हैं. शायद दूध का जला इसबार छाछ फूंक फूंककर पी रहा है.
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दरअसल कांग्रेस से दोबारा नज़दीकी की पहल इस बार प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की तरफ से हुई , पीके ने बिना शर्त गुजरात में होने वाले चुनाव में कांग्रेस पार्टी को अपनी सेवाओं का ऑफर दिया। पीके कई बार खुले मंचों से साफ़ तौर पर कह चुके हैं कि कांग्रेस पार्टी के बिना भाजपा से मुकाबला करने की बातें मूर्खता है, बकौल पीके इतनी कमज़ोर होने के बावजूद कांग्रेस पार्टी देश में 200 लोकसभा सीटों पर भाजपा से सीधे रूप से मुकाबले में हैं और यह काफी बड़ा नंबर है.
इसके अलावा प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) की भविष्य की राजनीति के लिए कांग्रेस पार्टी काफी सूट करती है. इन सबके बीच एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि किसको किसकी ज़्यादा ज़रुरत है. प्रशांत किशोर को कांग्रेस पार्टी की या कांग्रेस पार्टी को प्रशांत किशोर की. मेरी नज़र में तो देश अंदर जो राजनीतिक हालात हैं उनको देखते हुए दोनों को ही एक दूसरे की ज़रुरत है. प्रशांत किशोर ने इसबार काम मांगने के लिए किसी पार्टी की तरफ हाथ नहीं बढ़ाया है, उनकी महत्वाकांक्षाएं कुछ और हैं जिनको पूरा करने के लिए उन्हें कांग्रेस पार्टी का साथ चाहिए। कांग्रेस पार्टी के लिए भी विन विन वाली सिचुएशन है, प्रशांत किशोर के साथ कांग्रेस पार्टी का कोई नुक्सान नहीं होने वाला, नुकसान तो जो होना था वह बीते दिनों हुए पांच राज्यों के चुनावों में हो चूका, अब इससे बुरा क्या होगा।अलबत्ता पीके का साथ कांग्रेस पार्टी के लिए संजीवनी ज़रूर बन सकता है.
सवाल यह उठता है कि पीके ने गुजरात ही क्यों चुना? चुनाव तो कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी होने वाले हैं। दरअसल प्रशांत किशोर अच्छी तरह समझते हैं कि गुजरात पीएम मोदी (PM Modi) की कितनी बड़ी कमज़ोरी है. उन्हें मालूम है कि अगर गुजरात भाजपा के हाथ से निकल गया तो पीएम मोदी की साख पर बहुत बड़ा बट्टा लग सकता, उनकी मायावी छवि को इतनी गहरी चोट पहुँच सकती है कि जिसका सीधा असर 2024 के आम चुनाव पर पड़ सकता है. पीके को मालूम है कि गुजरात में भाजपा को हराया जा सकता है, पिछले विधानसभा चुनावों में यह साफ़ तौर नज़र भी आया. कांग्रेस की कुछ कमज़ोरियाँ सत्ता में वापसी के लिए उसकी राह में रोड़ा बनीं, प्रशांत किशोर उन्ही कमज़ोरियों को दूर कर भाजपा और मोदी से गुजरात छीनना चाहते हैं और अगर ऐसा हो गया तो समझ लीजिये गुजरात कांग्रेस के लिए संजीवनी बनेगा और प्रशांत किशोर हनुमान क्योंकि गुजरात में मोदी को हराना पहाड़ उठाने से कम नहीं है. अब सवाल यही उठता है कांग्रेस और पीके का संगम होगा या नहीं?
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यहाँ यह बात भी ध्यान में रखने लायक है कि यूपी की तरह गुजरात में भी दशकों से कांग्रेस पार्टी सत्ता से दूर है, फर्क सिर्फ इतना है कि यूपी में कांग्रेस लगभग साफ़ हो चुकी है और गुजरात में इसबार आम आदमी पार्टी कांग्रेस को हाफ करने की जुगत में है, तो कांग्रेस के लिए इसबार मुश्किलें और बढ़ेंगी ऐसे में उसके पास प्रशांत किशोर(Prashant Kishor) जैसे चुनावी रणनीतिकार का होना बहुत ज़रूरी है. देश को कांग्रेस मुक्त होने से बचाने के लिए पीके की यह पहल सराहनीय कही जाएगी क्योंकि देश को बढ़ती निरंकुशता से बचाने के लिए कांग्रेस जैसी नेशनल पार्टी का मज़बूत होना बहुत ज़रूरी है. पीके ने तो पहल कर दी अब बारी कांग्रेस की है, क्या कांग्रेस बढ़ाएगी हाथ?

