अराजनैतिक किसान आंदोलन में बढ़ रही राजनीतिक दलों की सक्रियता
जीत का श्रेय लेने को आतुर नेता कर रहे उकसाने वाली भाषणबाजी
भाकियू इस समय अपने स्वर्णिम दौर से गुजर रही है जब पूरे देश के किसानों का समर्थन उसे मिल रहा है। कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन में निःसंदेह भारतीय किसान यूनियन और उसके नेता राकेश टिकैत हीरो बनकर सामने आये हैं। 40 किसान संगठनों को मिलाकर शुरू किया गया किसान आंदोलन अब भाकियू और टिकैत बंधुओं पर सिमट कर रह गया है। किसानों का अपार समूह आज राकेश टिकैत के समर्थन में खड़ा है। मगर किसान आंदोलन में राजनीतिक दलों की बढ़ती भागीदारी से इस आंदोलन के हाईजैक होने की आशंका बलवती हो रही है। ऐसे में भाकियू और टिकैत बंधुओं को हर कदम संभल कर उठाने और नेतृत्व की कमान पूरी तरह अपने हाथ में रखने की आवश्यकता है। इस आंदोलन का पूर्ण श्रेय भाकियू को मिले इसके आवश्यक है कि पहले की तरह इसका मंच अराजनैतिक ही बना रहे और राजनीतिक दलों की भागीदारी मंच के सामने तक ही सीमित रहे।
चै.महेन्द्र सिंह टिकैत के बाद भाकियू की कमान उनके बेटे नरेश और राकेश टिकैत ने संभाली। मगर भाकियू में फूट बढ़ती गयी और भाकियू से अलग होकर अनेक किसान संगठन बनते चले गये। इसके चलते वेस्ट यूपी में भाकियू की स्थिति कमजोर हो गयी। मगर किसान आंदोलन में भाकियू नेता राकेश टिकैत की आंखों से बहे आंसूओं ने जहां इस आंदोलन की तस्वीर बदल दी वहीं किसानों खासकर जाट समुदाय को एकजुट होने और भाकियू के फिर से संगठित होने का अवसर भी दे दिया। दिल्ली की सीमा पर उमड़े किसानों के सैलाब नेे इस आंदोलन को पुर्नजीवित कर दिया। किसानों की ताकत बढ़ी तो सरकार ने भी कदम पीछे खींच लिये। पीएम मोदी ने अपना रूख स्पष्ट कर किसानों से वार्ता जारी रखने के संकेत दिये तो भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष चै.नरेश टिकैत ने भी पीएम के प्रति सम्मान जाहिर कर सकारात्मक संदेश दिया।
संभावनाएं इसी बात की हैं कि जल्द ही सरकार और किसानों के बीच वार्ता कर कोई बीच का रास्ता निकाला जा सकता है। सरकार के बदले रूख और उसपर बढ़ते दबाव के चलते किसान आंदोलन की कामयाबी की खुशबू फैलने लगी है। ऐसे में जीत का श्रेय और आंदोलन की सफलता का राजनीतिक लाभ उठाने के लिये राजनीतिक दलों में होड़ मच रही है। लगभग सभी विपक्षी दलों के नेता आंदोलन स्थल पर पहुंच कर किसान आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं। दो महीने से किसान मंच से दूर होने की राजनीतिक बैचेनी राकेश टिकैत के आंसू बहने के साथ ही दूर हो गयी। विपक्ष का हर नेता राकेश टिकैत को समर्थन देने के लिये या यूं कहें कि इन आंसूूओं की गंगा के सहारे यूपी चुनाव की वैतरणी पार करने की मंशा लिये गाजीपुर बार्डर पहुंच रहा है। रालोद मुखिया अजीत सिंह ने जहां राकेश टिकैत से फोन पर बात की वहीं जयंत चैधरी खुद धरना स्थल पर पहुँच गये। सपा के अखिलेश यादव ने भी राकेश टिकैत से वार्ता कर उन्हें समर्थन देने का आश्वासन दिया। आम आदमी पार्टी सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, दिल्ली सरकार में मंत्री सत्येंद्र जैन और दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष राघव चड्ढा धरना स्थल पर पहुंच कर दिल्ली के सीएम केजरीवाल के किसान आंदोलन के समर्थन में खड़े होने का दावा कर रहे हैं वहीं कांग्रेसी सांसद दीपेंद्र हुड्डा, प्रताप सिंह बाजवा, उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी लल्लू सिंह अलका लांबा जहां गाजीपुर बार्डर पहुंच कर राकेश टिकैत को समर्थन दे रहे हैं। वहीं राहुल और प्रियंका गांधी हर मंच पर खुद को किसानों का समर्थक साबित करने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। वहीं देश के अनेक कोनों से राजनीतिक दलों के नेता आंदोलन स्थल पर पहुंच कर बयानबाजी कर खुद को किसान हितैषी साबित कर रहे हैं।
किसानों के समर्थन में मुजफ्फरनगर में बुलाई गयी महापंचायत में शिरकत करते हुए रालोद नेता जयंत चैधरी ने मोदी सरकार के खिलाफ बने मौके का पूरा फायदा उठाते हुए भाकियू, खाप पंचायतों और किसानों को अपने पक्ष में करने का पूरा प्रयास किया। वहीं भाकियू का समर्थन हासिल करने और खुद को किसान हितैषी साबित करने के लिये सपा नेता नाहिद हसन पीएम मोदी पर अभद्र टिप्पणी कर बैठे। वजह साफ थी कि किसी तरह आंदोलन में खुद को स्थापित कर कामयाबी का श्रेय हासिल करना और जाट वोट बैंक अपने पाले में खिंचने का प्रयास करना। चै.नरेश टिकैत बातों में फंसे और अराजनैतिक दल होने के बावजूद चुनाव में रालोद को समर्थन देने की बात कह बैठे। इससे रालोद को वेस्ट यूपी में संजीवनी जरूर मिली लेकिन कहीं न कहीं भाकियू की अराजनैतिक छवि जरूर प्रभावित हुई है।
भाकियू से मिले समर्थन के बाद रालोद ने वेस्ट यूपी में मिले मौका का लाभ उठाने के प्रयास तेज कर दिये हैं और जयंत चैधरी ने अनेक जगहों पर रैली-बैठकों को संबोधित कर किसान आंदोलन में अपनी भूमिका सुनिश्चित करना शुरू कर दिया है। भाकियू द्वारा रालोद को समर्थन दिये जाने से परेशान समाजवादी पार्टी भी किसान आंदोलन में अपनी भूमिका को लेकर अनिश्चितता की स्थिति में है। ऐसे में सपा भी इस आंदोलन में खुद को आगे रखने का हर संभव प्रयास करेगी।
इन हालातों में किसान आंदोलन का नेतृत्व करने की स्थिति में आ चुकी भाकियू के समक्ष सरकार से अपनी बात मनवाने के साथ चरम पर आ चुके किसान आंदोलन को राजनीतिक दलों द्वारा हाईजैक किये जाने से बचाने का दबाव भी है। यदि किसानों के धरने में राजनीतिक दखलअंदाजी बढ़ती गयी तो एक ओर जहां अराजनैतिक संगठन पर राजनीतिक दलों के साथ होने का आरोप लगेगा वहीं दो माह से अधिक समय से धरने पर बैठे किसान संगठन भी नेपथ्य में चले जायेंगे। भाकियू सहित इन सभी किसान संगठनों की मेहनत और आंदोलन का लाभ यह राजनीतिक दल उठा ले जायेंगे और भाकियू सहित बाकी सभी ठगे रह जायेंगे। हालांकि चै.नरेश टिकैत अपनी ओर से सावधानी बरत रहे हैं और राकेश टिकैत भी नेताओं की बयानबाजी का किसी भी प्रकार समर्थन नहीं कर रहे हैं मगर राजनीतिक आकांक्षाएं मन में रखे नेताओं से आवश्यक दूरी बनाये रखना आंदोलन की शुचिता और सफलता के लिये जरूरी है।

