उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में क्या मिथक तोड़ पायेगी भाजपा

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उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में क्या मिथक तोड़ पायेगी भाजपा

  • राज्य निर्माण के बाद से कोई भी पार्टी लगातार दो बार चुनाव नहीं जीती
  • एनडी तिवारी के बाद कोई भी सीएम पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया

सुनील शर्मा

अगले वर्ष होने वाले उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। सभी राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप के बाण चलाने शुरू कर दिये हैं। अनेक मोर्चों पर रणनायक निर्धारित कर दिये गये हैं और सभी दल बहुमत से सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं। अब जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा यह तो चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा। मगर उत्तराखंड चुनाव से एक ऐसा मिथक भी जुड़ा है जो चुनाव को दिलचस्प बना रहे है। राज्य में अब तक हुए चार विधानसभा चुनाव में कोई भी राजनीतिक दल लगातार दो बार सरकार बनाने में कामयाब नहीं हुआ है। वहीं प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री एनडी तिवारी को छोड़ कर कोई भी मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया।

उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिलों को अलग कर वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड राज्य बनाया गया था। राज्य के प्रथम मुख्यमन्त्री नित्यानन्द स्वामी और दूसरे मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी थे। लेकिन उस समय तक उत्तराखंड विधानसभा का गठन नहीं हुआ था। उत्तराखंड अब तक 10 मुख्यमंत्री देख चुका है जिनमें से आठ सीएम विधानसभा में निर्वाचित हुए थे।

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उत्तराखंड राज्य का गठन होने के बाद वर्ष 2002 में पहला विधानसभा चुनाव हुआ जिसमें जनता ने कांग्रेस को सत्ता सिंहासन सौंपा। 2 मार्च 2002 से 7 मार्च 2007 तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एनडी तिवारी ने बतौर मुख्यमंत्री पांच साल तक कुर्सी संभाली। लेकिन 2007 में हुए चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और भाजपा को विजय हासिल हुई। 8 मार्च 2007 से 23 जून 2009 भाजपा नेता भुवन चन्द्र खण्डूरी मुख्यमंत्री पद संभाला। हालांकि वह पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये और 24 जून 2009 से 10 सितम्बर 2011 तक रमेश पोखरियाल निशंक को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया। दूसरी विधानसभा में सीएम पद पर एक बार फिर परिवर्तन हुआ ओर भुवन चन्द्र खण्डूरी को फिर से सीएम की जिम्मेदारी सौंपी गयी।

2012 में हुए उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में एक बार फिर सत्तारूढ दल से जनता का मोह भंग हुआ और एक बार फिर कांग्रेस को उत्तराखंड में सरकार बनाने का मौका मिला। हालांकि मुख्यमंत्री पद पर फिर अदला-बदली होती रही और राज्य की तीसरी विधानसभा में विजय बहुगुणा ने 13 मार्च 2012 से 31 जनवरी 2014 तक
हरीश रावत ने 1 फरवरी 2014 से 27 मार्च 2016 तक मुख्यमंत्री पद संभाला। 27 मार्च 2016 से 21 अप्रैल 2016 तक प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा। 21 अप्रैल 2016 से 22 अप्रैल 2016 तक मात्र एक दिन के लिये हरीश रावत मुख्यमंत्री बने और प्रदेश में एक बार फिर 19 दिन के लिये राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। इसके बाद 11 मई 2016 से 18 मार्च 2017 तक हरीश रावत फिर से प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाये गये।

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2017 में कांग्रेस को फिर से जीत हासिल करने की उम्मीद थी मगर जनता ने एक बार फिर संगठन को झटका दिया और प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। इस सरकार ने भी मुख्यमंत्री पद पर अनेक बदलाव देखे। चैथी विधानसभा के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बने त्रिवेन्द्र सिंह रावत जिन्होंने 18 मार्च 2017 से 10 मार्च 2021 तक सीएम पद संभाला। लेकिन विवादों के चलते उन्हें सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा और तीरथ सिंह रावत ने 10 मार्च 2021 से लेकर 4 जुलाई 2021 तक सीएम पद संभाला। लेकिन अपने कार्यों से अधिक अपने बयानों से चर्चा में आये तीरथ सिंह रावत को भी सीएम कुर्सी छोड़नी पड़ी। 4 जुलाई 2021 को पुष्कर सिंह धामी को मुख्यमंत्री बनाया गया जो वर्तमान में भी सीएम पद संभाले हुए हैं।

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उत्तराखंड राज्य के गठन के 20 साल के राजनीतिक इतिहास में किसी भी दल को लगातार दो बार सरकार बनाने का अवसर नहीं मिला है। ऐसे में देखना होगा की सत्तारूढ भाजपा क्या इस मिथक को तोड़ने में कामयाब हो पाती है या यह मिथक एक बार फिर अपना प्रभाव दिखाने में कामयाब होगा। राज्य में पांचवी बार 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव किसके लिये विजयश्री लेकर आयेंगे इसका इंतजार सभी को रहेगा।

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