Site icon Buziness Bytes Hindi

क्या एक पूर्व ब्यूरोक्रेट पार लगा पायेगा यूपी में भाजपा की नैया?


क्या एक पूर्व ब्यूरोक्रेट पार लगा पायेगा यूपी में भाजपा की नैया?

ज़ीनत सिद्दीकी


वैसे तो हर राज्य में चुनाव से पहले सत्ता और संगठन में फेर बदल आम बात है मगर जब बात यूपी की हो तो बात आम नहीं ख़ास हो जाती है क्योंकि राजनीतिक हलकों में यह प्रचलित है कि केंद्र की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर गुज़रता है. किसी भी सरकार के लिए चुनावी साल कड़ी परीक्षा वाला होता है और फिर आजकल तो पूरे देश में कोरोना संक्रमण केंद्र और राज्य सरकारों की कड़ी परीक्षा ले रहा है.

बात उत्तर प्रदेश की है जो चुनावी वर्ष से गुज़र रहा है, ज़ाहिर सी बात है आम आदमियों के लिए इस समय मुद्दा भले ही कोरोना हो मगर राजनीतिक दलों के लिए कोरोना से कहीं बड़ा मुद्दा हमेशा चुनाव रहता है. यह हाल के महीने में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में लोगों ने देख लिया है कि कैसे कोरोना के चरम काल में भारी भारी चुनावी सभाएं और रोड शो किये गए। किसी भी वार्निंग, किसी भी चेतावनी, किसी भी अपील का पार्टियों पर, विशेषकर केंद्र में शासित भाजपा पर कोई असर नहीं पड़ा जिसका नतीजा आज लोगों के सामने है.

ऐसा ही कुछ यूपी में भी देखा गया कि सारी अपीलों को ठुकराते हुए अदालत के आदेश को मोहरा बनाकर पंचायत चुनाव कराये गए और जो कोरोना शहरों तक सीमित था उसे गाँव गाँव पहुँचाया गया और उसका भी परिणाम यह हुआ कि हज़ारों की संख्या में लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा. अगर सिर्फ सरकारी आंकड़ों को ही सच मानें तब भी स्थिति बड़ी भयावह रही है.

बहरहाल इन सारे विषम हालात के बीच पिछले कई दिनों से यूपी में सरकार और सत्ताधारी पार्टी भाजपा में सियासी हलचलें काफी तेज़ हो गयी हैं। जहां सरकार में फेरबदल की बातें सुनने को मिल रही हैं वहीँ संगठन में बड़े बदलाव की बातें हो रही हैं. पार्टी आला कमान की हाई लेवल मीटिंग हो चुकी है, मीटिंग में समाजसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिसका राजनीति से कभी कोई वास्ता नहीं रहता, का मौजूद होना एक लाज़मी सी बात है. ख़बरें जो छन छनकर आ रही हैं उसके हिसाब से तो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर उसी को वापस लाया जा रहा जिसने अपने प्रदेशाध्यक्ष काल में पार्टी को बम्पर जीत दिलाई थी , मुख्यमंत्री पद के मज़बूत दावेदार भी थे मगर ऐन मौके पर किस्मत रूठ गयी और योगी जी पर मेहरबान हो गयी. वहीँ इन सबके बीच एक सबसे महत्वपूर्ण नाम जो उभर कर सामने आ रहा है वह पूर्व ब्यूरोक्रेट अरविन्द कुमार शर्मा का है जो संभवतः केशव मौर्या के स्थान पर उप मुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी संभालेंगे।

फेरबदल तो और भी होंगे, कुछ जाएंगे, कुछ आएंगे मगर अरविन्द कुमार शर्मा के सरकार में एक महत्वपूर्ण पद पर आने की बात शायद भाजपा की चुनावी रणनीति का अहम् हिस्सा है और इसकी तैयारी इसी साल जनवरी के महीने से शुरू हो चुकी थी. 12 जनवरी 2021 को VRS लेने वाले आईएएस अरविन्द कुमार शर्मा 14 जनवरी को भाजपा में शामिल होते हैं और फिर एमएलसी बनाये जाते हैं. इसके बाद इनकी सरगर्मी बढ़ने लगती है और बात पीएमओ को सीधे रिपोर्ट करने पर पहुँच जाती है.

अगर इस पूर्व आईएएस की पिछली ज़िन्दगी पर गौर करें तो पहली महत्वपूर्ण बात यह मिलेगी कि अरविन्द शर्मा का सीधा कनेक्शन गुजरात से है क्योंकि वह 1988 बैच के गुजरात कैडर के ही IAS अधिकारी रहे हैं और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक उनका नौकरशाही का एक लम्बा सफर है. 2014 में जब से मोदी जी ने केंद्र में सत्ता संभाली है, राज्यों के चुनावों की तैयारी में गुजरात मॉडल की बड़ी बात होती है और ज़िम्मेदारी में गुजरात कनेक्शन होता ही है.

चूँकि कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने सत्ताधारी पार्टी की इमेज को भारी नुकसान पहुँचाया है इसलिए हमेशा अपनी इमेज के लिए परेशान रहने वाली पार्टी इस इमेज सुधार अभियान के लिए ही शायद अरविन्द शर्मा को बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपने की तैयारी कर रही है.

मोदी जी को दरअसल अरविन्द कुमार शर्मा पर बड़ा भरोसा है, 2001 में केशुभाई को हटाने के बाद जब नरेंद्र मोदी को गुजरात की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी तब से लेकर अबतक उनका साथ बरक़रार है, पहले गुजरात में फिर दिल्ली में. कहते हैं कि 2001 में जब केशुभाई को हटाने की बात हो रही थी तब किसी आईएएस ने मुख्यमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी का नाम सुझाया था.

बहरहाल यूपी में सत्ता और संगठन में अंदरखाने की खबर यह है कि बहुत कुछ चल रहा है जिसमें सबकुछ अच्छा नहीं चल रहा है. कोरोना के कारण प्रदेश के जो हालात हैं वह किसी से छुपे नहीं हैं, नाकामियों की एक अनगिनत सूची है, तीसरी लहर की बात हो रही है, तरह तरह के रंगों के फंगस बीमारी की शक्ल में तबाही मचाने के लिए दस्तक दे रहे हैं ऐसे में भाजपा के लिए विधानसभा चुनाव कितने मुश्किल या आसान साबित होंगे यह तो समय ही बताएगा। पंचायत चुनावों में बड़ी उम्मीदों के बावजूद योगी जी नाकाम रहे यह बात अपनी जगह बिलकुल सच है मगर अरविन्द कुमार शर्मा उससे बड़ा चुनावी इम्तेहान अच्छे नंबरों से पास कर लेंगे यह अपने आप में बड़ा सवाल है जो भविष्य के गर्त में छुपा है. एक और ब्यूरोक्रेट राजनीति में आया है, बड़ी ज़िम्मेदारी मिलने की बात हो रही है, कितना सफल होगा, भविष्य बताएगा।

Exit mobile version