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एक सवालिया पोस्टर पर इतनी बौखलाहट क्यों?


एक सवालिया पोस्टर पर इतनी बौखलाहट क्यों?

ज़ीनत सिद्दीक़ी
एक पोस्टर ने पिछले कई दिनों से सियासी और समाजी हंगामा मचा रखा है. एक पोस्टर जिसमें एक ज्वलंत सवाल है, एक पोस्टर जिसमें बड़ी सभ्य, संसदीय और मर्यादित भाषा में देश के प्रधानमंत्री से पूछ गया कि हमारे बच्चो की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दिया? यह एक ऐसा सवाल है जो देश का हर नागरिक अपने देश के मुखिया से पूछ सकता है. यह वह सवाल है जिसने इस महामारी में अपने परिवार के किसी सदस्य को या बहुत से सदस्यों को खोया है. यह वह सवाल है जो अपने बीमार मरीज़ के लिए ऑक्सीजन और बेड के लिए अस्पताल-अस्पताल भटका है. क्या इनको अपने देश के मुखिया से यह सवाल पूछने का हक़ नहीं।

बात देश की राजधानी दिल्ली की है, वह शहर जहाँ से पूरा देश कण्ट्रोल होता है, जहाँ नीति और नियम बनते हैं देश की आम जनता की भलाई के लिए, उस शहर के कई इलाक़ों में एक सवालिया पोस्टर लगा ” मोदी जी! हमारे बच्चो की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दिया”. पोस्टर क्या लगे मानों सरकार पर पहाड़ टूट पड़ा हो. दिल्ली पोलिस इतनी तेज़ी से हरकत में आयी जैसे देश के खिलाफ कोई साज़िश रच दी गयी हो. आनन् फानन दर्जनों FIR और गिरफ्तारियां। यह गिरफ्तारियां क्यों? एक बड़ा सवाल।

ज़ाहिर सी बात है क्रिया की प्रतिक्रिया होनी ही थी. शुरुआत हुई कांग्रेस पार्टी के दो नेताओं राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा से जिन्होंने इन गिरफ्तारियों के विरोध खुद को गिरफ्तार करने की मोदी सरकार को चेतावनी दे दी, देखते ही देखते “Arrest me too” एक अभियान बन गया और इस अभियान में क्या राजनीतिक, क्या सामाजिक, क्या बुद्धिजीवी, क्या प्रौढ़ और क्या युवा, हर वर्ग धर्म और के जाति के लोग हिस्सा बन गए. 25 लोगों की गिरफ्तारियों पर हज़ारों, लाखों लोगों की सरकार को चेतावनी “मुझे भी गिरफ्तार करो’ एक बड़ा सवाल बन गयी. अब क्या करेगी सरकार, क्या इन सभी को करेगी गिरफ्तार?

एक तार्किक सवाल पर सरकार की इतनी बौखलाहट क्यों? सरकार ने 25 लोगों को गिरफ्तार किया, चुनौती लाखों लोगों ने पेश कर दी. देश के मुखिया ने जब विदेशों को मदद के लिए वैक्सीन भेजी थी तब भी सियासी तौर पर विरोध के सुर उठे थे लेकिन आम लोगों ने कोई विरोध नहीं किया था क्योंकि उन्हें यक़ीन दिलाया गया था कि देश के लोगों के लिए भरपूर मात्रा में वैक्सीन मौजूद है. अब जब वैक्सीन लगने का मौक़ा आया तो पता चला किल्लत है. फिर तो सवाल उठेगा ही. देश के हर नागरिक को यह अधिकार है कि जिस चीज़ पर पहले मेरा अधिकार है वह किसी और को क्यों?

पिछले सात सालों से मोदी जी की हर बात पर जनता का भरपूर सहयोग मिला है, नोटबंदी की लाइन से लेकर थाली, ताली, दिया, बाती, टॉर्च, मोबाइल सबकुछ। हर बात का समर्थन किया। जो मोदी जी कहेंगे, हम करेंगे। पर अब बात अपनों की जान जाने की है, इसका समर्थन कैसे कर सकते हैं. विरोध तो करेंगे ही, सवाल तो पूछेंगे ही.

आप भले यह तर्क दे सकते हैं कि पोस्टर के पीछे सियासत है. माना भी जा सकता है कि यह पोस्टर सियासी पैंतरा है, मगर पोस्टर का सवाल सियासी नहीं लगता। कोरोना महामारी के भयावह हालात में यह एक वाजिब सवाल है जिसका जवाब देना सरकार के लिए ज़रूरी है, भले ही वह सियासी तौर पर ही क्यों न पूछ गया हो. कांग्रेस पर या दूसरी पार्टियों पर आप राजनीति करने का आरोप लगाकर बच नहीं सकते। इस सवाल की शुरुआत भले ही किसी राजनीतिक पार्टी ने की हो मगर इस सवाल पर 25 बेगुनाहों जिनमें ज़्यादातर बेरोज़गारी जूझ रहे लोग शामिल थे की गिरफ़्तारी ने सरकार के रवैये और मंशा पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है.

एक सवाल और कि दिल्ली पुलिस की इतनी बड़ी कार्रवाई क्या उसका अपना फैसला था या कहीं से ऊपर से निर्देश था. यह इसलिए भी कि दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है.

अंत में बस एक बात कि खबर दबाने के चक्कर में सरकार की फ़ज़ीहत तो हो ही गयी. जिस पोस्टर को शायद हज़ार, पांच सौ लोग देखते उसे पल भर में पूरे देश ने देख लिया। सरकार को यह बात अच्छी तरह समझना चाहिए कि आवाज़ को जितना दबाने की कोशिश होती है उसकी तेज़ी और बढ़ जाती है.

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