नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित रसुवा जिले में भोटेकोशी-ल्हेन्डे खोला सिस्टम के पास आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। घर, सड़कें, पुल और दूसरे जरूरी बुनियादी ढांचे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। इस आपदा में मरने वालों की संख्या 300 के करीब पहुंच गई है, जबकि सैकड़ों लोग अभी भी लापता हैं।
शुरुआती रिपोर्टों में आशंका जताई गई थी कि भूकंप के कारण बर्फ खिसकने से बाढ़ आई होगी। हालांकि, बाद में सैटेलाइट तस्वीरों और जियोलॉजिकल जांच में संकेत मिले कि घटना की वजह टेक्टोनिक भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियर या बर्फ का गिरना और उसके साथ मलबे का तेजी से नीचे आना था।
इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि नेपाल में भूकंप, बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाएं बार-बार क्यों आती हैं?
दो टेक्टोनिक प्लेटों के बीच स्थित है नेपाल
नेपाल में भूकंप का खतरा उसकी भौगोलिक स्थिति से जुड़ा है। इंडियन और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट्स लगातार एक-दूसरे की ओर बढ़ रही हैं।
इंडियन प्लेट लगभग 20-21 मिलीमीटर प्रति वर्ष की गति से यूरेशियन प्लेट की ओर बढ़ रही है। दोनों प्लेटों के बीच टकराव करीब 5 करोड़ साल पहले शुरू हुआ था और आज भी जारी है। इसके कारण हिमालय के नीचे पृथ्वी की ऊपरी परत में लगातार दबाव और बदलाव होते रहते हैं। यही वजह है कि नेपाल में बड़े भूकंप आने का खतरा बना रहता है।
संकरी घाटियां बढ़ाती हैं अचानक बाढ़ का खतरा
नेपाल दुनिया की कुछ सबसे ऊंची पर्वत चोटियों वाला देश है। यहां कई नदियां संकरी और खड़ी ढलान वाली घाटियों से होकर गुजरती हैं।
जब अचानक बड़ी मात्रा में पानी किसी संकरी हिमालयी घाटी में पहुंचता है, तो उसे फैलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिलती। तेज ढलान के कारण पानी तेजी से नीचे की ओर बढ़ता है। इससे अचानक आने वाली बाढ़ ज्यादा खतरनाक हो सकती है।
तेजी से गर्म हो रहा हिमालय
हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र का गर्म होना भी खतरे को बढ़ा रहा है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों का आकार कम हो रहा है और वे पीछे हट रहे हैं।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) के 2026 के आकलन के अनुसार, 2000 के बाद हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हो गई है। साथ ही, लंबे समय तक ग्लेशियरों की निगरानी भी सीमित है।
हजारों ग्लेशियल झीलें भी बड़ा खतरा
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की 2020 की एक सूची में कोशी, गंडकी और करनाली बेसिन में 3,624 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी।
इनमें 47 झीलों को संभावित रूप से खतरनाक माना गया था। इनमें 25 तिब्बत, 21 नेपाल और एक भारत में थी। ग्लेशियरों और आसपास के इलाकों में लगातार हो रहे बदलाव के कारण खतरे का स्तर भी समय के साथ बदल सकता है।
बर्फ, चट्टान और मलबा बन सकते हैं जानलेवा
हालिया बाढ़ को लेकर शुरुआती रिपोर्टों में भूकंप के कारण भूस्खलन की आशंका जताई गई थी। बाद के विश्लेषण में घटना को ग्लेशियर, बर्फ और चट्टानों के गिरने से जोड़ा गया।
ऐसी स्थिति में ऊंचे पहाड़ों से बर्फ, चट्टान और मलबा तेजी से नीचे आता है। खड़ी ढलान इसकी रफ्तार बढ़ाती है और नदी इसे आगे ले जाती है। इसका सबसे ज्यादा असर नीचे घाटियों में रहने वाले लोगों और वहां मौजूद बुनियादी ढांचे पर पड़ता है।
मॉनसून की भारी बारिश बढ़ाती है मुश्किल
नेपाल दक्षिण एशियाई मॉनसून के रास्ते में स्थित है। भारी बारिश के दौरान पहाड़ी ढलानों में बड़ी मात्रा में पानी जमा हो जाता है।
इससे जमीन कमजोर हो सकती है और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। भूस्खलन नदी का रास्ता रोक सकता है और बाद में अचानक बड़ी मात्रा में पानी निकलने से बाढ़ आ सकती है।
हिमालय की ढलानें प्राकृतिक रूप से अस्थिर
हिमालय भूगर्भीय रूप से सक्रिय और अपेक्षाकृत नए पहाड़ हैं। यहां की खड़ी ढलानें स्वाभाविक रूप से अस्थिर हैं।
भारी बारिश और भूकंप के अलावा सड़क निर्माण, जंगलों की कटाई, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव, मिट्टी का कटाव और ग्लेशियरों का पीछे हटना इस अस्थिरता को और बढ़ा सकता है।
नदियों और घाटियों के पास बने हैं घर और प्रोजेक्ट
नेपाल की पहाड़ी भौगोलिक स्थिति के कारण निर्माण के लिए समतल जमीन सीमित है। इसी वजह से कई बस्तियां, सड़कें, पुल और पनबिजली परियोजनाएं नदी और घाटियों के आसपास बनाई गई हैं।
समस्या यह है कि बाढ़ और भूस्खलन के दौरान पानी और मलबा भी अक्सर इन्हीं रास्तों से गुजरता है। ऐसे में आपदा आने पर जान-माल और बुनियादी ढांचे को बड़ा नुकसान हो सकता है।
राहत और बचाव भी आसान नहीं
नेपाल का पहाड़ी इलाका आपदा के बाद राहत और बचाव कार्य को भी मुश्किल बनाता है। भूस्खलन से किसी गांव या बस्ती तक जाने वाली एकमात्र सड़क बंद हो सकती है।
पुल टूटने से पूरी घाटी का संपर्क कट सकता है। भारी मलबे के कारण बचाव दल और वाहन प्रभावित इलाकों तक नहीं पहुंच पाते। इससे राहत पहुंचाने और लोगों को निकालने में ज्यादा समय लग सकता है।
एक नहीं, कई खतरों से घिरा है नेपाल
नेपाल की चुनौती किसी एक प्राकृतिक खतरे तक सीमित नहीं है। यहां भूकंप, भारी मॉनसून बारिश, बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियरों में बदलाव और खड़ी पहाड़ी ढलानें एक साथ जोखिम पैदा करती हैं।
इसके अलावा, तेजी से शहरीकरण, कमजोर निर्माण और बुनियादी ढांचे के अपर्याप्त मानक नुकसान को और बढ़ा सकते हैं। यही कारण है कि नेपाल में एक प्राकृतिक घटना कई दूसरी समस्याओं को जन्म दे सकती है और देखते ही देखते बड़ी आपदा का रूप ले सकती है।
