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समान से सेक्युलर क्यों हुई नागरिक संहिता?

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अमित बिश्नोई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को लाल किले से अपने स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कुछ पुरानी बातों और पुराने वादों को नया क्लेवर देने की कोशिश की और साथ ही ये सन्देश भी देने की कोशिश की कि सामान नागरिक संहिता जैसे अपने पुराने वादे को पूरा करने के लिए उनकी सरकार प्रतिबद्ध है, भले उन्हें ये मालूम है कि उनकी सरकार के कुछ सहयोगी इस मामले में कभी भी परिस्थितियों को उनके विपरीत कर सकते हैं. नामकरण में माहिर मोदी जी और उनकी पार्टी भाजपा ने शायद इसीलिए कॉमन सिविल कोड में कॉमन की जगह सेक्युलर शब्द जोड़ दिया है ताकि सुनने में लोगों को अच्छा लगे. वैसे संविधान से सेक्युलर शब्द को हटाने की वकालत करने वाली सत्ताधारी पार्टी को वक्त की नज़ाकत को देखते हुए अब इस शब्द के इस्तेमाल से परहेज़ नहीं दिखाई दे रहा है.

लाल किले की प्राचीर से देश को 11वीं बार सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता समय की मांग है और उनका मानना ​​है कि देश में नागरिक संहिता पर चर्चा करनी चाहिए क्योंकि देश में अब तो जो नागरिक संहिता हैं वो भेदभाव वाली और सांप्रदायिक है, अब इस भेदभावपूर्ण संहिता को समाप्त करने की जरूरत है और उसकी जगह हमें एक धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता लागू की ज़रुरत है। प्रधानमंत्री मोदी को देश की नागरिक संहिता अचानक सांप्रदायिक नज़र आने लगी, जबकि उनकी पार्टी के शासन वाले कई प्रदेश इस समान नागरिक संहिता लागू करने का एलान कर चुके हैं या फिर तैयारी में हैं. लेकिन ये जानते हुए कि UCC को लागू करना अब इतना आसान नहीं क्योंकि भाजपा के पास अब अपना बहुमत नहीं है, इसलिए उसमें अब समान की जगह सेक्युलर जोड़ दिया गया है. बता दें कि समान नागरिक संहिता भाजपा के 2019 के चुनावी घोषणापत्र का भी हिस्सा था और इसे मोदी-3.0 में लागू होना था जिसका पायलट प्रोजेक्ट उत्तराखंड में शुरू हो चूका था लेकिन लोकसभा चुनाव में भाजपा को अपने दम पर 400 की जगह सिर्फ 240 सीटें मिलीं और इस कहानी में अब सेक्युलर वाला ट्विस्ट आ गया.

प्रधानमंत्री का समान से सेक्युलर पर आना किसी को हैरान नहीं कर रहा है, सामने हरियाणा, झारखण्ड और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव मुंह बाए खड़े हुए हैं. UCC से मोदी जी और अमित शाह पीछे हट नहीं सकते लेकिन इस प्रारूप में अब आगे बढ़ना भी उनके लिए बहुत मुश्किल है. इंडिया गठबंधन के रूप में विपक्ष काफी मज़बूत होता जा रहा है, इन तीनों चुनाव वाले राज्यों से भाजपा के लिए समाचार शुभ नहीं मिल रहे हैं, जो सर्वे रिपोर्ट्स आ रही हैं उनमें भाजपा मुश्किल में नज़र आ रही है. महाराष्ट्र में सहयोगी दल सिरदर्द बने हुए हैं, सांप छछूंदर वाली हालत हो गयी है, न निगलते बनता है और न उगलते। अजीत पवार वाली एनसीपी के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता कि चुनाव तक वो किस करवट दिखाई देंगे। फिलहाल तो पार्टी मुखिया अजीत पवार ने एलान कर दिया है कि वो चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसके अलावा उनका एक बयान और भी चर्चा में है जिसमें वो किसी बात पर अफ़सोस जता रहे हैं, राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि उन्हें भाजपा के साथ जाने का पछतावा हो रहा है, शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले से उनकी मुलाकातों का सिलसिला भी बढ़ रहा है, हालाँकि भाजपा ये उनका घरेलू मामला बता रही है लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं हैं कि राजनीतिक परिवार में मुलाकातें घरेलू नहीं राजनीतिक ही होती हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी तरफ से स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में चुनावी एजेंडा सेट करने की भरपूर कोशिश की है. एक राष्ट्र एक चुनाव की उन्होंने एकबार फिर वकालत की और विपक्ष से भी कहा कि वो इस बारे में कदम आगे बढ़ाये। लोगों में सन्देश पहुँचाने की कोशिश की विपक्ष चाहता है कि देश के किसी न किसी राज्य में चुनाव चलते रहे हैं क्योंकि वो चुनाव की राजनीति करना चाहता है, उसे देश के विकास से कोई मतलब नहीं. इसके अलावा प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में अपनी सरकार की कई उपलब्धियों को भी गिनाया लेकिन इस बार वो लाल किले से जनता से कोई नया वादा नहीं कर सके. अगर कोई नई बात कहने की कोशिश की तो वो यही कि सरकार को अब सेक्युलर शब्द से कोई परहेज़ नहीं है. मोदी जी को अब अच्छी तरह से पता चल चूका है कि सेक्युलर शब्द देश के खमीर में है, उसका ज़मीर भी सेक्युलर ही है इसलिए सेक्युलर शब्द से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता।

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