अमित बिश्नोई
दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार का दौर कल शाम ख़त्म हो गया, कल यानि 5 फरवरी को लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। आम आदमी पार्टी एकबार फिर सरकार बनाने की कोशिश में है और तकनीकी तौर पर चौका मारना चाहती है। बीजेपी ने भी इस बार चुनाव जीतने के लिए कमर कस ली है, दिल्ली पर पूरी तरह आधिकारिक तौर पर राज करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी एकबार फिर प्रयासरत हैं, और आप को आपदा साबित करने में लगे हैं। वहीं कांग्रेस पार्टी फिर से दिल्ली में अपनी पैठ जमाने की कोशिश में है और शीला दीक्षित के काल में वापस जाने की जीतोड़ में कोशिश है। दिल्ली के ज़मीन पर अगर लोगों से बातें करें तो मुकाबला सीधा AAP और भाजपा के बीच होता हुआ नज़र आएगा लेकिन बीच में कांग्रेस पार्टी कहीं न कहीं ज़बरदस्त सेंधमारी करती हुई दिखाई दे रही है. यह बात इस बात से भी नज़र आ रही है क्योंकि पिछले एक हफ्ते के चुनाव प्रचार को अगर देखें तो केजरीवाल के निशाने पर पीएम मोदी से ज़्यादा राहुल गाँधी दिखाई दिए, वहीँ राहुल गाँधी ने भी केजरीवाल को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
दिल्ली की डेमोग्राफी को अगर देखें तो राष्ट्रीय राजधानी में करीब 12.9% मुस्लिम मतदाता हैं जो चांदनी चौक, उत्तर-पश्चिमी दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली, नई दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली में बसे हैं। यह वोट बैंक दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है और इस बार भी ऐसा ही लग रहा है, हालाँकि यह समुदाय राजनीतिक स्तर पर हाशिए पर है। ऐसे में सबसे दिलचस्प बात यह होगी कि क्या इस बार कांग्रेस दिल्ली में मुस्लिम वोट वापस पा सकेगी या फिर यह समुदाय एकबार फिर आम आदमी पार्टी के साथ खड़ा रहेगा और भाजपा आने के खौफ में एक बार फिर सत्ताधारी पार्टी पर भरोसा जताएगा? दिल्ली की सत्ता आंकड़ों की बात करें तो ओखला में मुस्लिम करीब 50% हैं जो हमेशा से निर्णायक भूमिका में रहते हैं , जिस तरफ इस बड़े वोट बैंक का झुकाव हो जाता है उसकी नैया पार हो जाती है. इसी विधानसभा क्षेत्र में शाहीन बाग का वो इलाका भी आता है जो CAA-NRC के खिलाफ अपने विशिष्ट धरना प्रदर्शन की वजह से दुनिया भर में मशहूर हुआ, इसके अलावा जसोला, तैमूर नगर, मदनपुर खादर जैसे मुस्लिम बहुल गांव भी आते हैं। 1998 से 2008 तक कांग्रेस ने इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा था। कांग्रेस उम्मीदवार परवेज़ हाशमी 2013 तक इस सीट से लगातार चुनाव जीतते रहे। इसके बाद वे आम आदमी पार्टी के आसिफ मोहम्मद खान से चुनाव हार गए। 2015 और 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के अमानतुल्लाह खान ने इस सीट से चुनाव जीता और विधायक बने जो अब भ्रष्टाचार के कई मामलों में फंसे हैं और उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया था। ऐसे में इस सीट पर आप की छवि खराब हुई है जिसका सीधा फायदा बीजेपी और कांग्रेस को मिल सकता है।
कांग्रेस पार्टी ने ओखला से आसिफ मोहम्मद खान की बेटी अरीबा खान को मैदान में उतारा है, जो दिल्ली नगर निगम में पार्षद भी हैं और काफी तेज़ तर्रार नेता भी हैं। आम आदमी पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस के अलावा ओखला से इस बार AIMIM भी चुनाव लड़ रही है। AIMIM ने सीएए के विरोधी कार्यकर्ता शिफा उर रहमान को चुनाव में उतारा है। 2020 के दिल्ली दंगों में कथित भूमिका के लिए जेल में बंद शिफा उर रहमान की पत्नी नुरैन फातिमा उनके लिए प्रचार कर रही हैं। मुस्तफाबाद एक और मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र है जहां 2020 में सीएए-NRC के विरोध में दंगे हुए थे। एआईएमआईएम ने इस सीट से ताहिर हुसैन को मैदान में उतारा है, जिन्होंने आप छोड़ दी थी। 2020 के दिल्ली दंगों में शामिल होने का आरोप लगने के बाद केजरीवाल ने अपने विधायक को छोड़ दिया। हालाँकि मुसलमान असदुद्दीन की पार्टी को मौका दे सकते हैं, थोड़ी मुश्किल है क्योंकि कांग्रेस को मुसलमानों की बड़ी संख्या सांप्रदायिक ताकतों से लड़ने वाली पार्टी मानती है.
आम आदमी पार्टी ने अपने पिछले दो कार्यकालों में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के बीच गहरी पैठ बनाई है। इसने अपनी मुफ्त की राजनीति के लिए आर्थिक तंगी और गरीबी से जूझ रहे लोगों के बीच अपना मज़बूत आधार बनाया है, इसलिए इस पार्टी ने मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा जीता है। हालांकि पार्टी CAA के खिलाफ शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन के दौरान चुप्पी साधे रही और 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान या उसके बाद मुसलमानों के समर्थन में सामने नहीं आई। इसलिए मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग आम आदमी पार्टी से बिखर सकता है। दिल्ली के चुनाव प्रचार को अगर देखें तो एक हफ्ता पहले जो मुसलमान आप को इसलिए वोट करने की बात कर रहा था ताकि भाजपा सत्ता में न आ पाए लेकिन अब ऐसा सोचने वालों का भी मन बदलने लगा है और वो कांग्रेस पार्टी की तरफ देखने लगे हैं.

