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हरियाणा का अगला सीएम कौन?

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अमित बिश्नोई
पांच अक्टूबर को हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए हुए मतदान के बाद आये एग्जिट पोल्स के नतीजों की अगर बात करें तो सभी ने एक सुर में कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने की भविष्यवाणी की है, इन पोल्स में कुछ ने सिंपल मेजोरिटी और कुछ ने थम्पिंग मेजोरिटी की बात कही है, किसी भी पोल्स्टर ने भाजपा की सरकार बरकरार रहने की बात नहीं कही है, हालाँकि मुख्यमंत्री सैनी का अलग ही कहना है, वो आठ अक्टूबर को EVM से जिन्न निकलने और कांग्रेस नेताओं को EVM को गालियां देते हुए दिखाई दे रहे हैं. खैर नतीजों से पहले हर एक को जीत का दावा करने का पूरा अधिकार है। अब अगर एग्जिट पोल्स को सच मानते हुए ये मान लिया जाय कि कल यानि मंगलवार को आने वाले नतीजे भी कांग्रेस पार्टी के लिए मंगलकारी होंगे तो बड़ा सवाल यह है कि हरियाणा का मुख्यमंत्री कौन होगा क्योंकि कांग्रेस पार्टी ने किसी भी नेता को CM चेहरा घोषित नहीं किया था, न तो भूपिंदर हुड्डा को जो पिछली दो कांग्रेस सरकारों में मुख्यमंत्री रहे हैं, न ही हरियाणा कांग्रेस की दलित चेहरा और वरिष्ठ नेता कुमारी शैलजा को और न ही रणदीप सुरजेवाला को जिनका नाम भी CM पद के लिए सामने आ रहा है. अगर ये तीन नाम नहीं तो क्या कोई सरप्राइज़ चेहरा सामने आएगा?

एग्जिट पोल्स की बात करें तो सभी ने कांग्रेस पार्टी को 50 से 65 तक सीटें मिलने की बात कही है जिसका मतलब सिंपल मेजोरिटी से लेकर विशाल बहुमत है। सिर्फ एक एग्जिट पोल में जो दैनिक भास्कर ने कराया, उसी ने कांग्रेस को बहुमत से कम सीटें दी हैं. भास्कर ने कांग्रेस को 40 से 44 मिलने की बात कही है जो बहुमत के काफी करीब है मगर कम है, नायब सिंह सैनी का EVM से जिन्न निकलने की बात कहना शायद इसी एग्जिट पोल से निकला बयान है. खैर आठ अक्टूबर को क्या होगा ये कल देखा जायेगा मगर इसमें कोई शक नहीं कि ये एग्जिट पोल के अनुमान अगर सच साबित होते हैं तो कांग्रेस के लिए यह बहुत बड़ी राहत होगी जो पिछले एक दशक से केंद्र और हरियाणा दोनों ही जगह पर संघर्ष करती हुई नज़र आ रही है. लोकसभा चुनावों में उम्मीद से बेहतर नतीजे निकालने के बाद एक प्रमुख हिंदी भाषी राज्य में मिलने वाली जीत पार्टी के साथ-साथ पूरे विपक्ष का मनोबल बढ़ाएगी, हालाँकि हरियाणा में इंडिया गठबंधन अलग अलग चुनाव मैदान में था, आम आदमी पार्टी ने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे.

कांग्रेस पार्टी के लिए ये जीत बहुत बड़ी राहत तो ज़रूर होगी लेकिन इसके आगे का सफर इतना आसान नहीं होगा। मतदान से कुछ दिनों पहले तक अंतरकलह से जूझ रही कांग्रेस पार्टी के आला कमान ने मतदान पूर्व उस अंतरकलह पर तो काबू पा लिया और अपने वोटों के बिखराव को बचा लिया लेकिन मतदान के बाद जब सरकार बनाने की बात आएगी तब सबकुछ इतना आसान नहीं होगा। जो गुटबाज़ी चुनाव के दौरान दिखाई दे रही थी वो एकबार फिर उभरकर सामने आएगी क्योंकि मुख्यमंत्री पद के लिए भूपिंदर हुड्डा तो रेस में सबसे आगे हैं ही, शैलजा ने भी अपनी उम्मीदवारी को कभी खारिज नहीं किया, बल्कि मतदान के दिन तक उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को मज़बूती से पेश किया और वो भी नेशनल मीडिया के सामने। तो जब हाईकमान मुख्यमंत्री पद के अहम सवाल पर फैसला करने के लिए बैठेगा तो उसके सामने समस्याओं का एक पिटारा होगा जिसका सर्वमान्य हल निकालना आसान नहीं होगा।

अगर पहली पसंद की बात करें तो निश्चित ही भूपिंदर हुड्डा ही वो नाम हैं, भले ही चुनाव के दौरान उनका नाम आधिकारिक रूप से मुख्यमंत्री पद के लिए न घोषित किया गया हो लेकिन पूरा चुनावी अभियान उन्ही के इर्द गिर्द ही रहा है, शैलजा तो लगभग 10-12 दिन चुनावी अभियान से दूर होकर कोपभवन में बैठ गयी थीं हालाँकि पार्टी आलाकमान वक्त की नज़ाकत देखते हुए उन्हें मनाने और मंच पर हुड्डा और शैलजा का हाथ मिलवाने में कामयाब रहा. भूपेंद्र सिंह हुड्डा 2005 से 2014 तक हरियाणा के मुख्यमंत्री के तौर पर राज्य का नेतृत्व कर चुके हैं और इस चुनाव में भी मुख्यमंत्री पद के लिए स्वाभाविक पसंद बने हुए हैं. हालाँकि पिछले 20 वर्षों में हरियाणा में पार्टी के अंदर कई अन्य मजबूत दावेदार भी उभरे हैं। इनमें से लोकसभा सांसद और दलित चेहरा कुमारी शैलजा पहला बड़ा नाम हैं जो हरियाणा कांग्रेस की अध्यक्ष भी रह चुकी है, हरियाणा की बड़ी दलित नेता मानी जाती हैं और खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी मानती हैं और उसे मुखरता से पब्लिक और पार्टी फोरम पर रखती हैं. एक और नाम कांग्रेस पार्टी के वाचाल राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला का भी है, हालाँकि उन्होंने कभी मुखरता से सीएम पद के लिए अपनी दावेदारी को सार्वजानिक तौर पर नहीं पेश किया लेकिन एंटी हुड्डा ग्रुप का होने के नाते उनके समर्थक उनके नाम को भी उछालते रहते हैं.

जो जानकारी मिल रही है उसके मुताबिक रेस शुरू हो चुकी है, मोर्चाबंदी होने लगी है, भूपिंदर हुड्डा रविवार को दिल्ली पहुँच गए हैं और चुनावी नतीजे वो दिल्ली मैं बैठकर ही देखेंगे। सीएम पद के लिए पहली पसंद होने के बावजूद वो कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं इसीलिए दिल्ली में बैठकर फील्डिंग सजाने में जुट गए हैं. हालाँकि सीएम पद के सवाल पर हुड्डा एक लॉयल कांग्रेसी की तरह यही कहते हैं कि इसका फैसला पार्टी आलाकमान करेगा. वहीँ कुमारी शैलजा अपने को कांग्रेस की वफादार सिपाही और तिरंगे में ही लिपटकर दुनिया से जाने की बात कह रही हैं। सीएम पद के लिए अंतिम निर्णय की बात वो भी आलाकमान पर ही छोड़ती हैं लेकिन साथ में यह भी कहती हैं कि पार्टी आलाकमान उनके अनुभव और वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ नहीं करेगा। दूसरी तरफ आलाकमान ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है, संगठन महासचिव कहते हैं कि नतीजों के बाद विधायक फैसला करेंगे, कांग्रेस पार्टी में यही परंपरा है, यहाँ पर पर्ची देखकर नाम नहीं पुकारा जाता, जो होता है पारदर्शी होता है. हालाँकि होता यही है कि जीते हुए विधायक फैसला आलाकमान पर छोड़ देते हैं और फिर आलाकमान कोई नाम निश्चित कर देता है. देखने वाली बात यही होगी कि अगर एग्जिट पोल्स के अनुमान कल यानि 8 अक्टूबर को नतीजों में परिवर्तित होते हैं तो कांग्रेस आलाकमान किसके नाम पर अपनी मुहर लगाएगा।

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