रंजीता सिन्हा
कोरोना की तीसरी लहर आने की आशंका कहीं दूसरी लहर को न रोक पाने की नाकामी मिटाने की प्री-प्लानिंग तो नहीं? बुद्धिजीवियों के मन में उठ रहे इस सवाल के पीछे तर्क है-सवाल है। तर्क यह है कि तीसरी लहर आने की आशंका का अगर समय रहते चिकित्सा वैज्ञानिकों ने आंकलन कर लिया है तो दूसरी लहर का क्यों न कर सके और सरकारी व्यवस्थाएं ऐसे में फेल हो गईं। खुद प्रधानमंत्री ने कहा है कि कोरोना इस बार तूफान बनकर लौटा है। ऐसे में इसकी पूर्व तैयारियों को लेकर चिकित्सा वैज्ञानिकों ने सरकार को क्यों नहीं चेताया? या चेताया था और तैयारियां ओवरकॉफिडेंस अथवा अज्ञानतावश नहीं की गईं? सभी कह रहे हैं कि कोरोना महामारी की इस दूसरी लहर के आगे व्यवस्था असफल साबित हुई। कौन है इतनी और इस कदर मौतों का जिम्मेदार? सत्ता संचालक या सलाहकार?
असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस जादुई शख्स का नाम है जिससे अधिकांश भारतीय कठिन से कठिन समस्या का समाधान पल भर में कर देने की उम्मीद रखते हैं। आम आदमी को भरोसा है कि वह हर चीज का तुरंत हल ढूंढ लेंगे। इसलिए मौजूदा मुश्किल हालात में उनकी ही सूरत जेहन में आना स्वाभाविक है। इसीलिए आक्रोशित लोग कह रहे हैं कि, कोरोना तूफान बनकर वापसी कर रहा था और सरकार सो रही थी। इस बात में कितना दम है? इस सवाल का जवाब तलाशिये तो पाएंगे कि, विदेशी आक्रमण, घरेलू नक्सलवाद, आंतरिक दंगों या गृहयुद्ध की सूचनाओं पर पैनी नजर और कान रखने वाली व्यवस्था आखिर इस महामारी के ताजे आक्रमण को क्यों न भांप सकी? आखिर सरकार एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है जो देश और देशवासियों को बचाने की खातिर ही काम करती है। सरकार के रूप में किसी व्यक्ति विशेष को लेकर भले टिप्पणी की जाय पर सरकार के रूप में भारत की तस्वीर देखें तो बात हजम नहीं होती। भारत जैसे विशाल देश में 29 राज्य और सात केंद्र शासित प्रदेश हैं और सभी राज्यों के अपने-अपने मुख्यमंत्री हैं। उनके पास पर्याप्त कर्मचारियों के साथ एक पूर्ण सचिवालय है।
केन्द्र के साथ-साथ नागरिक स्वास्थ्य राज्यों की भी प्रमुख प्राथमिकता है। अस्पतालों के लिए लाइसेंस, क्षमता बढ़ाना, उपकरण, स्टाफ, बजट सहित स्वास्थ्य सेवा से संबंधित हर व्यवस्था राज्यों द्वारा अपने-अपने राज्य की जनसंख्या और बीमारियों की आशंका के हिसाब से अलग-अलग की जाती है। अस्पतालों की निगरानी भी राज्यों द्वारा होती है और हर राज्य में एक स्वास्थ्य मंत्री होता है, जिनके अधीन तीन से चार वरिष्ठ नौकरशाह होते हैं। उनमें से कई भारतीय प्रशासनिक सेवा से आते हैं।
आंकलन करें, तो पाएंगे कि कुल 36 संस्थानों -राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों- में 36 मंत्री होते हैं और प्रति मंत्री औसतन चार खास नौकरशाह का हिसाब लगाएं, तो 144 नौकरशाह होते हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री होते हैं। उनके अधीन भी एक राज्यमंत्री होता है। सचिवालय में स्वास्थ्य सचिव, कम से कम तीन अतिरिक्त सचिव, एक दर्जन से अधिक सचिव और कई उप सचिव या निदेशक होते हैं। यह कुल मिलाकर लगभग 30 बुद्धिजीवियों का एक अच्छा समूह है, जिनमें से कई आईएएस कैडर के हैं। वरिष्ठ राजनेताओं और नौकरशाहों के राज्य ढांचे के साथ इस समूह को जोड़ दें, तो कुल 210 लोग मात्र जन स्वास्थ्य की देखभाल के लिए जिम्मेदार हैं।
आखिर जन-स्वास्थ्य के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार इनमें से कोई भी व्यक्ति कोरोना की दूसरी लहर की गति का अनुमान क्यों नहीं लगा सका? जबकि उनके सामने पश्चिमी देशों के पिछले उदाहरण थे, जिन्होंने कोरोना की दूसरी लहर का सामना किया और परेशानी भुगती। नतीजतन लगभग हर चीज की कमी पड़ गई- बिस्तर, दवा-इंजेक्शन और ऑक्सीजन। आप इसके लिए डॉक्टरों या नर्सिंग स्टाफ को दोष नहीं दे सकते।
राजनीतिक नेतृत्व को हमेशा संबंधित कर्मचारियों, सेना या अन्य द्वारा जानकारी दी जाती है। सूचनाओं का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर होता है, न कि हर मामले में ऊपर से नीचे की ओर। नौकरशाही इसमें विफल रही और बड़े पैमाने पर चूक गई। क्या वाकई विफल रही या सुप्रीम व्यवस्था को आईना दिखाने के लिए मूक बनी रही? अगर ऐसा किया गया तो क्यों? और अगर ऐसा जानबूझकर नहीं किया गया तो इस अज्ञानता, असफलता, आपाधापी का जिम्मेदार कौन है?

