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दिल्ली में कांग्रेस का दुश्मन नंबर 1 कौन?

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अमित बिश्नोई
दिल्ली विधानसभा चुनाव में एक शोर मचा है कि मुकाबला सिर्फ दो पार्टियों के बीच यानी सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और भाजपा के दरम्यान है। भाजपा को सत्तारूढ़ इसलिए कहा कि क्योंकि दिल्ली में LG हाउस से भी एक समानांतर सरकार चलती है जिसे केंद्र द्वारा बिठाया जाता है और केंद्र में भाजपा की हुकूमत है. इन चुनावों में देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को लोग सिरे से ख़ारिज कर रहे हैं, कम से कम वह लोग तो ज़रूर खारिज कर रहे हैं जो आम आदमी पार्टी और भाजपा के प्रति ज़्यादा वफादारी रखते हैं, कांग्रेस को ख़ारिज करने वालों में अल्पसंख्यक समाज के एक बड़ा तबका भी शामिल है, यह वह तबका है जो भले ही कांग्रेस को पसंद करता हो, जिसे भले ही राहुल गाँधी बहुत अच्छे लगते हों और जिसे केजरीवाल भी पसंद न हों लेकिन उसे हर हाल में भाजपा को हराना है और उसकी नज़र में कांग्रेस पार्टी भाजपा को हरा नहीं सकती इसलिए कांग्रेस को वोट नहीं देगा। इसे ही कहते हैं कट्टरवाद, यह वो लोग हैं जो उन कट्टर हिंदुत्ववादियों की आलोचना करते हैं जो किसी भी हालत में मोदी जी को यानि भाजपा को वोट देते हैं.

यह वह लोग हैं जो खुले आम यह बात कहते हैं कि मुसलमानों के मुद्दे पर केजरीवाल चुप्पी साध लेते हैं, फिर वह चाहे दिल्ली दंगों का मामला हो या फिर देश भर में मस्जिदों के नीचे ढूंढें जा रहे मंदिरों की बात हो. मगर इन सबके बावजूद उन्हें कांग्रेस की जगह केजरीवाल पर ज़्यादा भरोसा है. मुसलमानों के एक बड़े वर्ग की इस सोच का भुगतान दिल्ली में कांग्रेस पार्टी पिछले कई चुनावों से भुगतती आ रही है, फिर वो चाहे लोकसभा का चुनाव हो या फिर विधानसभा का. कांग्रेस पार्टी की दिल्ली में हालत शून्य की अवस्था में पहुँच चुकी है. केजरीवाल को भी इस बात का बहुत अच्छी तरह से पता है कि वो मुसलमानों के मसलों पर बोलें या न बोलें, समाज का यह अल्पसंख्यक वर्ग झक मारकर उसी को वोट देगा और इसलिए वह खुलकर सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीती भी खेल रहे हैं.

केजरीवाल की यह सोच काफी हद तक सही भी है, दिल्ली के उन कई इलाकों में जहाँ मुसलमान निर्णायक स्थिति में हैं, इसी हालत में नज़र आते हैं. उन्हें नापसंद होने के बावजूद केजरीवाल अपनी मजबूरी नज़र आते हैं. हालाँकि इस बार के चुनाव में स्थिति थोड़ी बदली हुई नज़र आ रहीहै. कांग्रेस पार्टी बहुत कुछ तो नहीं मगर कुछ तो करती हुई दिखाई दे रही है. कम से कम वो ज़मीन पर खड़ी हुई और लड़ाई लड़ती हुई नज़र आ रही है. इसबार उसके लिए भाजपा और आम आदमी पार्टी एक समान हैं. भाजपा तो उसके निशाने पर पूरे देश में ही रहती है लेकिन जहाँ तक दिल्ली की बात है तो पिछले दो विधानसभा चुनाव की तुलना में कांग्रेस का इस बार का कैंपेन और रणनीति बदली हुई भी है और ज़ोरदार भी. यहाँ तक कि आम आदमी पार्टी के बड़े नेताओं, चाहे वह केजरीवाल हों, मनीष सिसोदिया हों या मौजूदा मुख्यमंत्री आतिशी, सभी के खिलाफ धाकड़ उम्मीदवार दिए हैं.

इसबार के चुनाव में कांग्रेस पार्टी एक बार फिर लोगों को शीला दीक्षित के ज़माने की याद दिला रही है और लोग भी शीला दीक्षित के ज़माने से आज की तुलना कर रहे हैं. शीला दीक्षित के बेटे और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संदीप दीक्षित केजरीवाल को चुनौती दे रहे हैं और बड़ी गंभीर चुनौती दे रहे हैं, कम से कम रणनीतिक तौर पर तो वो केजरीवाल से आगे ही नज़र आ रहे हैं. अपने विधानसभा क्षेत्र का पचास प्रतिशत हिस्सा उन्होंने पैदल नाप दिया है, एक एक दरवाज़े को खटखटाया है, अभी मतदान को दो हफ्ते का समय है और उनका इरादा 70 प्रतिशत वोटरों तक व्यक्तिगत रूप से पहुँचने का है. 8 फरवरी को नई दिल्ली सीट का नतीजा क्या आएगा इसके बारे में गारंटीशुदा कोई बात नहीं कही जा सकती लेकिन संदीप दीक्षित के प्रयासों में कोई कमी नहीं नज़र आ रही हैं.

कांग्रेस पार्टी ने इस बार के चुनाव के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित किये हैं. निश्चित ही उन लक्ष्यों में सरकार बनाने का लक्ष्य तो बिलकुल ही नहीं है, भले कांग्रेस की प्रेस ब्रीफिंग में लगातार इस तरह के दावे किये जा रहे हों. कांग्रेस का इन चुनावों में सबसे बड़ा लक्ष्य अपने मत प्रतिशत को डबल डिजिट में पहुँचाना है क्योंकि उसे मालूम है कि उसका मत प्रतिशत अगर 10 प्रतिशत को पार कर गया तो दस साल बाद उसकी दिल्ली विधानसभा में नुमाइंदगी भी हो जाएगी, भले ही उसकी संख्या कम ही हो. दिल्ली में बह रही चुनावी हवा से अंदाजा लगाने वाले कई राजनीतिक पंडित चांदनी चौक, कस्तूरबा नगर और कई अन्य सीटों पर कांग्रेस पार्टी के चांस देख रहे हैं. उन्हें लगता है कि बचे हुए दिनों में कांग्रेस पार्टी ने अगर अपने चुनावी कैम्पेन को अच्छे से चलाया तो निश्चित ही भविष्य में दिल्ली के लिए उसकी राह थोड़ी हमवार हो सकती है. कांग्रेस पार्टी ने अगर अपने लक्ष्य के आसपास भी अपने को पा लिया तो इसका असर दिल्ली समेत पूरे देश में जा सकता है खासकर अल्पसंख्यक वर्ग के उन लोगों की सोच पर असर पड़ सकता और बदलाव आ सकता है जो कांग्रेस पार्टी को पसंद करने के बावजूद वोट करने में हिचकिचाते हैं. दिल्ली की राजनीति की बात करें तो कांग्रेस पार्टी को अच्छी तरह मालूम है, कम से कम दिल्ली से जुड़े कांग्रेस के नेताओं का तो स्पष्ट मानना है कि दिल्ली में कांग्रेस पार्टी को अगर ऊपर आना है तो आम आदमी पार्टी को नीचे जाना ही होगा। ऐसे में चाहे इंडिया ब्लॉक की मजबूरी हो या फिर कोई और बात आम आदमी पार्टी से किसी भी तरह की सहानुभूति रखने से कांग्रेस पार्टी को दूर रहना होगा। अजय माकन जैसे नेताओं का स्पष्ट मानना है कि आम आदमी पार्टी के साथ रहकर दिल्ली में कांग्रेस पार्टी का रिवाइवल कभी नहीं सकता। AAP का जन्म कांग्रेस की ज़मीन पर हुआ है, कांग्रेस पार्टी को उससे अपनी ज़मीन छीननी ही पड़ेगी, इसलिए दिल्ली चुनाव में कांग्रेस पार्टी के निशाने पर भाजपा से ज़्यादा आम आदमी पार्टी है.

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