अहमदाबाद। गुजरात की 12 प्रतिशत पटेल आबादी है। अगर पाटीदार समुदाय की बात करें तो राज्य में आदिवासी आबादी 15.5 फीसदी है। जो पाटीदारों से अधिक है। लेकिन इसके बावजूद भी पाटीदार गुजरात में सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक तौर पर सबसे सशक्त हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टी के पाटीदार बिरादरी से 51 विधायक चुनाव जीतकर आए थे। जो राज्य में किसी भी समुदाय के सबसे अधिक थे। ये गुजरात के पाटीदार बिरादरी के लिए एक बड़ी बात है। वर्तमान में, कई राजनीतिक दलों के लिए सवाल यह है कि क्या पाटीदार समुदाय 2017 की तरह ही इस बार भी भाजपा से नाराज़ होंगे। क्या इस बार 2022 के विधानसभा चुनाव में पाटीदार कांग्रेस में या फिर आम आदमी पार्टी के पास जाएंगे?
आम आदमी पार्टी ने गुजरात में कमान युवा पाटीदार नेता गोपाल इटालिया के हाथ में सौंपी है। क्या इससे कोई फर्क पड़ेगा? गुजराती के राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो हर पार्टी का भविष्य में पाटीदार मतदाताओं पर टिका रहा है। लेकिन गुजरात में कमज़ोर होती कांग्रेस और अपने संगठन को मजबूत करती आम आदमी पार्टी को देखते हुए माना जा रहा है कि इस बार भी भाजपा चुनाव में पाटीदारों को ख़ुश करने में कामयाब होगी। गुजरात में जब विजय रूपाणी मुख्यमंत्री बने थे तब पटेलों ने मुख्यमंत्री पद की मांग उठाई थी। भाजपा पटेल समुदाय की इस मांग से संतुष्ट भी थी। विजय रूपाणी सहित पूरे मंत्रिमंडल को हटा दिया गया और भूपेंद्र पटेल गुजरात के मुख्यमंत्री बना दिया गया था।
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गुजरात के 61 साल की राजनीतिक इतिहास में भूपेंद्र पटेल पांचवें पाटीदार मुख्यमंत्री हैं। राज्य में अब तक कुल 17 मुख्यमंत्रियों में से पांच पाटीदार समुदाय के मुख्यमंत्री रहे हैं। अगर गुजरात के राजनीतिक इतिहास की बात करें तो चिमनभाई पटेल पहले पाटीदार मुख्यमंत्री बने थे। वह पहले जनता दल से और फिर कांग्रेस से मुख्यमंत्री बने थे। उनसे पहले के सभी मुख्यमंत्री व्यापारी और ब्राह्मण समुदायों से बनते आ रहे थे। चिमनभाई पटेल के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री बाबूभाई जशभाई पटेल दो बार मुख्यमंत्री बने और उसके बाद भाजपा से केशुभाई पटेल और आनंदी बहन पटेल मुख्यमंत्री बनीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात की राजनीति की जड़ तक पहुंच चुके हैं। उनको पता है राज्य में पटेल बिरादरी के वोटों की अहमियत क्या है। इसलिए नरेंद्र मोदी कभी भी पाटीदारों के बीच आने का मौका नहीं छोड़तें हैं। गुजरात में अन्य समाजों के विपरीत, पाटीदार बिरादरी अपने समाज को एकजुट करने के लिए हमेशा प्रयास करती रही है। भले ही पटेल बिरादरी कदवा और लिउआ के नाम पर बंटे हुए हैं। लेकिन उन्होंने सामाजिक संरक्षण पर ज़ोर दिया है। अर्थात पैसे से समाज के लिए कैसे उपयोगी हो। यही कारण है कि आज गुजरात में हर पार्टी के लिए पटेल बिरादरी आज अहम है। आने वाले चुनाव में देखना है कि पटेल बिरादरी भाजपा की तरफ ही अपना झुकाव रखती है या फिर किसी दूसरी पार्टी को अपना रहनुमा मानती है।
