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SBI मुख्यालय (तारावाली कोठी) में विवादित शिलालेखों का क्या काम?


SBI मुख्यालय (तारावाली कोठी) में विवादित शिलालेखों का क्या काम?

अमित बिश्‍नोई

लखनऊ। ऐतिहासिक इमारतें जो ASI के संरक्षण में हैं या वो जो सरकार के उपयोग में, इन सारी इमारतों में आपको उस ईमारत के इतिहास के बारे में जानकारी देनेवाले शिलालेख मिल जायेंगे। इन शिलालेखों में उस ईमारत के बारे में, उसके निर्माणकर्ता के बारे में काफी जानकारी आपको मिलती है. ऐसी ऐतिहासिक इमारतों में लगे शिलापट्टों की भाषा भी बड़ी सुसभ्य और विवाद से परे होती है लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की तारावाली कोठी जो अब स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ( State Bank Of India) की मुख्य ब्रांच है। एक ऐसा शिलापट्ट लगा हुआ है जिसकी भाषा काफी विवादित है, कम से कम लखनऊ की तहज़ीब के तो बिलकुल खिलाफ है.

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इस शिलापट्ट में इस ऐतिहासिक ईमारत को मूर्त रूप देने वाले अवध के दूसरे बादशाह शाह नसीरुद्दीन हैदर को एक अय्याश बताया गया है. इस ईमारत की ऐतिहासिकता के बारे बहुत कुछ लिखा गया है जो इतिहासकारों की किताबों में दर्ज है, लेकिन यहाँ पर ज़िक्र सिर्फ इस शिलापट्ट में लिखी विवादित इबारत से है. यह शिलापट्ट दो भाषाओँ हिंदी और अंग्रेजी में है. इबारत के नीचे इसके प्रस्तुतकर्ता करता का नाम दिया गया है. हिंदी के शिलापट्ट के नीचे जनसम्पर्क एवं सामाजिक सेवा बैंकिंग विभाग, स्थानीय प्रधान कार्यालय लखनऊ अंकित है जबकि अंग्रेज़ी वाले शिलालेख में प्रस्तुतकर्ता के रूप में प्रभाकर शर्मा चीफ जनरल मैनेजर, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया, लोकल हेड ऑफिस लखनऊ का नाम दर्ज है. शिलालेख के नीचे लगी एक पट्टिका में यह भी अंकित है कि इस शिलालेख को श्री मनोहर लाल, उपमहाप्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक, मुख्य शाखा के निर्देशन में स्थापित किया गया है।

Image Credit Hasan Zaidi

जब इस बारे में बैंक के अधिकारीयों से संपर्क करने की कोशिश की गयी तो संपर्क स्थापित न हो सका और जिन लोगों ने नाम न छपने की शर्त पर बात की तो उन्होंने इन शिलालेखों का ठीकरा पुरातत्व विभाग पर फोड़ दिया और आगे कुछ भी कहने से बचते हुए नज़र आये. आप इस इबारत को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि यह भाषा पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की तो बिलकुल नहीं हो सकती। पुरातत्व विभाग किसी ईमारत के इतिहास के बारे में तो जानकारी दे सकता है लेकिन उस ईमारत के निर्माणकर्ता के आचरण के बारे में कुछ नहीं कह सकता, इसलिए इस विवादित शिलालेख की भाषा के लिए ASI को ज़िम्मेदार ठहराने वाली बात गले से बिलकुल नहीं उतरती।

फिर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि 2002 में लगे यह शिलापट्ट जो बैंक की ओर से ही लगाए गए माने जायेंगे, इनमें किसी की अय्याशी का ज़िक्र क्यों, किसी का चरित्र हनन क्यों? बैंक वैसे भी एक सार्वजानिक स्थल होता है, ऐसे में पब्लिक प्लेस पर इस तरह के शिलालेख का क्या औचित्य, बैंक क्या सन्देश देना चाह रहा है. देश के सबसे बड़े बैंक को किसी के चरित्र या आचरण पर इस तरह की टिप्पणी करने का अधिकार है? अगर यह किसी के निजी विचार हैं तो उनके प्रस्तुतिकरण में बैंक का उपयोग क्यों?

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इस विवादित शिलापट्ट को लगे हुए 12 वर्ष हो चुके हैं और यह अब भी तारावाली कोठी कहें या State Bank Of India की मेन ब्रांच में मौजूद है और अभी तक किसी ने इसे वहां से हटाने या बदलने की कोशिश नहीं की. हालाँकि 2020 में जब मुख्यालय का कायाकल्प हुआ तब एक और शिलापट्ट स्थापित हुआ जिसमें “तारावाली कोठी का इतिहास” से एक उद्धरण अंकित किया गया जिसमें शाह नसीरुद्दीन हैदर को नक्षत्रों से प्रेम करने वाला बताया गया, बाकी उनके चरित्र पर किसी तरह की कोई बात नहीं लिखी गयी. इसका मतलब यह भी लगाया जा सकता है कि 2002 में रहे बैंक के चीफ जनरल मैनेजर प्रशांत शर्मा की अपनी सोच रही होगी लेकिन एक दशक से अधिक समय बीतने के बाद भी उसे सहेजे रखने का मतलब यही है कि State Bank Of India भी उनके विचारों से सहमत है. एक सरकारी बैंक का इस तरह की विवादित भाषा का समर्थन करना अपने आप में खुद एक बड़ा सवाल है।

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