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जंगल तो हम बचा रहे पर खुद को कैसे बचाएं?


जंगल तो हम बचा रहे पर खुद को कैसे बचाएं?

पारुल शुक्ला

11 सितंबर को राष्ट्रीय वन शहीद दिवस मनाया जाता है. इसे सेलिब्रेट करने का उद्देश्य वन या जंगल को बचाने के दौरान शहीद होने वाले वनकर्मियों को सम्मान देना होता है. लेकिन क्या आपको पता है कि जंगल को बचाने वाले इन योद्धाओं का न के बराबर ध्यान रखा जाता है. दुनिया में वैसे तो वन रक्षकों को दिक्कतें ज्यादा होती हैं लेकिन भारत में खतरा सबसे अधिक है. आज आपको बिजनेस बाइट्स उनकी समस्याओं से रूबरू कराने जा रहा है.

बड़ी मुसीबत बनते तस्कर
यहां फील्ड स्टाफ अपने परिवार से दूर दुर्गम स्थानों पर बिना किसी आधुनिक सुविधा के काम करता है. अक्सर टिम्बर और माइनिंग माफिया के अलावा घुसपैठियों और शिकारियों के संगठित समूहों से उनका सामना होता है. इसके अलावा जंगली जानवरों से जंगल और आसपास के इलाकों में रहे लोगों की हिफाजत करने में भी इन वन रक्षकों का रोल है.

फील्ड स्टाफ के पास आधुनिक हथियार नहीं
महत्वपूर्ण है कि इस काम में फील्ड स्टाफ के पास कोई आधुनिक हथियार या फायर आर्म्स (बंदूक वगैरह) नहीं होते. अंतर्राष्ट्रीय रेंजर्स फेडरेशन के मुताबिक भारत दुनिया में “रेंजरों के लिए सबसे खतरनाक देश” है. साल 2012 से 2017 के बीच पूरी दुनिया में कुल 526 वन रक्षकों की जान गई. इनमें से 162 भारत के थे. ये आंकड़ा कुल मरने वालों का 31 प्रतिशत है. इससे पता चलता है कि भारत में हर महीने कम से कम दो या तीन वन रक्षकों की जान जा रही है. भारत में वन रक्षकों की मौत का यह आंकड़ा कितना भयावह है वह इस बात से भी पता चलता है कि इन पांच सालों में दूसरी सबसे अधिक 51 मौतें कांगो में हुई जो भारत में हुई मौतों के एक तिहाई से भी कम है.

देश भर में 50,000 स्थाई वन रक्षक
आज पूरे देश में करीब 50,000 स्थाई वन रक्षक (फॉरेस्ट गार्ड और रेंजरों समेत वन रक्षा में लगे कर्मचारी) हैं जिनके लिए अधिकारियों ने सरकार से कुछ मांगें रखी हैं उनमें कार्यस्थल पर आकस्मिक मृत्यु हो जाने पर परिवार को 25 लाख रुपए मुआवजा देने की पहली मांग है. मारे गए स्टाफ का पूरा वेतन तब तक हर महीने उसके परिवार को दिया जाता रहे जब तक वह कर्मचारी जीवित रहने पर नौकरी करता. मारे गए कर्मचारी के बच्चों को उसी तरह प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति योजना का फायदा मिले जैसे सेना के जवानों के बच्चों को मिलता है. इसके अलावा ड्यूटी पर मारे गए या अनुकरणीय साहस दिखाने वाले वन रक्षकों को उसी तर्ज पर वीरता पदक मिले जैसे पुलिस कर्मियों को दिया जाता है.

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