अमित बिश्नोई
नए साल का स्वागत करने की तैयारियों पूरी हो चुकी होंगी क्योंकि कुछ ही घंटों के बाद हम 2023 को अलविदा कहकर 2024 में प्रवेश करने वाले हैं. इस दौरान देश में कहीं DJ की धुन पर लोग थिरक रहे होंगे, कहीं शराब के जाम छलक रहे होंगे, कहने का मतलब देश के हर शहर में कई ऐसी जगहें होंगी जहाँ लोगों का जमावड़ा होगा। नए साल की मस्ती में लोग इतना करीब आएंगे कि उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं होगा कि वो अपने साथ कुछ ऐसा कैरी करके ले जा रहें हैं जिसने 2020 में देश में तबाही मचा दी थी, देश को कब्रिस्तान में बदल दिया था, जी हाँ मैं कोरोना वायरस की बात कर रहा हूँ, वहीँ भयावह, जानलेवा और बहरूपिया वायरस जिसने पूरी दुनिया की रफ़्तार को थाम दिया था। मेरा मकसद ये नहीं कि आपकी नई साल की खुशियों को मैं कम करूँ या ये कहूँ कि नए साल का जश्न मनाना ठीक नहीं। यहाँ सवाल ये है कि नए साल के जश्न को मनाने का तरीका थोड़ा बदला जा सकता है क्योंकि सामने जब खतरा दिखाई देता है तो रास्ता बदलना ही अक्लमंदी होती है।
देश में 5 दिसंबर को कोरोना संक्रमण को नए मामले दहाई में सिमट चुके थे और आज की तारीख में बढ़कर चार हज़ार को पार कर चुके हैं। सिर्फ नए मामले ही नहीं, मौतों का सिलसिला भी बढ़ा है, मौतों का सिलसिला जहाँ पूरी तरह बंद हो चुका था वो फिर शुरू हो चूका है और मरने वालों की संख्या भी धीरे धीरे बढ़ रही है, आज की बात करें तो सेहत महकमे के आंकड़ों के अनुसार पांच लोगों की मौत हुई. ये बताने का मकसद सिर्फ ये है सिर्फ आप ही नहीं नए साल के जश्न का इस्तकबाल करने के लिए कोरोना भी तैयारी कर रहा है, वो भी आपके साथ नए साल का धूमधाम से जश्न मनाएगा और पार्टियों से होता हुआ आपके घरों में, आपके करीबियों के पास पहुंचेगा।
दरअसल हम लोग जो सामने होता है सिर्फ उसे ही देखते हैं, पीछे क्या हो चूका है, इससे कोई सबक नहीं सीखते। आप भी नहीं और शायद सरकार भी नहीं। आज सुबह अख़बारों की सुर्ख़ियों में नए साल के लिए जारी एडवाजरी देखीं। इन हिदायतों में सारा ज़ोर नशे को लेकर था, शराब को लेकर था, पुलिस प्रशासन का सारा ज़ोर इन निर्देशों में इसी बात पर दिखा कि नए साल के जश्न में हुड़दंग करने वालों की खैर नहीं, किसी ने कोरोना वायरस से बचने की बात नहीं की, किसी ने ये नहीं समझाया कि देश में कोरोना वायरस ने रूप बदलकर फिर पैर पसार लिए हैं और अब वो उस मौके के इंतज़ार में है कि कब वो बड़ा हमला कर सके और नए साल की पार्टियों से अच्छा मौका उसे और कहाँ मिलेगा।
देश में आज कोरोना के जो चार हज़ार मामले सामने आये हैं उनमें से अकेले केरल से 2500 से ज़्यादा मामले हैं, केरल का ज़िक्र इसलिए क्योंकि यहाँ ईसाई समुदाय के लोग बड़ी संख्या में हैं और इस समुदाय में न्यू ईयर पार्टी का कल्चर आम होता है. ऐसे में राज्य सरकार भी इस तरह की कोई एडवाइज़री नहीं जारी करती कि इस समुदाय में नाराज़गी हो और यही हालत देश के कुछ और राज्यों में है जिनमें से ज़्यादातर दक्षिण से हैं , यहाँ पहले से ही कोरोना वायरस पैर पसार चुका है और अब वो खाद पानी के इंतज़ार में बैठा है. अब ये आप पर है कि उसे खाद पानी देकर बड़ा करना चाहेंगे या फिर उससे दूरी बनाकर उसके मुरझाने में मददगार बनेंगे।
बात सिर्फ ईसाई बाहुल्य राज्यों और दक्षिण की स्टेट्स की नहीं है, दिल्ली-एनसीआर में तेज़ी से फल फूल रही पाश्चात्य सभ्यता भी नए साल के जश्न में खूब बढ़चढ़कर हिस्सा लेती है, शायद उस समुदाय से भी ज़्यादा जिनके कल्चर में न्यू ईयर पार्टी मनाना ज़रूरी हिस्सा है। दिल्ली हो, नॉएडा हो, गाज़ियाबाद हो, मेरठ हो, या फिर गुड़गांव, मल्टी स्टोरीड कल्चर में साल दर साल नए साल के जश्न का जूनून बढ़ता जा रहा, शराब पानी की तरह बहती है और मंहगी गाड़ियां रफ़्तार के साथ दौड़ती हैं. प्रशासन का सारा ध्यान सिर्फ इसपर लगाम लगाने पर है, ट्रैफिक डायवर्जन बनाये गए हैं , सोसायटीज़ में बाहर के लोगों का आठ बजे के बाद प्रवेश के परमिशन को प्रतिबंधित किया गया है लेकिन इन सोसायटीज़ की अट्टालिकाओं में रहने वाले हज़ारों लोगों को क्या इस प्रशासन ने 6 फ़ीट की दूरी बनाये रखने को कहा, क्या मास्क को ज़रूरी किया। बेशक ये सिर्फ सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है, लोगों में इसके लिए जागरूकता होनी चाहिए, उन्हें भी अच्छे बुरे का एहसास होना चाहिए, उन्हें भी मौके की नज़ाकत को समझना चाहिए। खैर मैंने तो अपना फ़र्ज़ निभा दिया अब लोगों समझना होगा। कोरोना वायरस ने कितने लोगों के शरीर में जगह बनाई ये आंकड़े तो नए साल के जश्न की पार्टियों के ख़त्म होने बाद ही सामने आएंगे, हम तो कहते हैं कि नए साल के स्वागत का एक भारतीय तरीका भी होता है जो पूजा पाठ से शुरू होता है और पूजा पाठ पर ख़त्म होता है, तो क्यों न इस बार नए साल का स्वागत इसी तरीके से किया जाय.
