ईरान में शादी से पहले लड़कियों के लिए कौमार्य बेहद अहम है। कई बार वहां पर शादी से पहले वर्जिनिटी सर्टिफ़िकेट ‘कौमार्य का प्रमाण पत्र’ मांगते हैं। हालांंक विश्व स्वास्थ्य संगठन इस प्रथा को मानवाधिकारों के ख़िलाफ़ मानता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भले ही कहा हो कि वर्जिनिटी टेस्ट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है ये अनैतिक है। लेकिन आज भी दुनिया के कई देशों में आज भी ये प्रचलित है। इन देशों में इंडोनेशिया, इराक़, तुर्की शामिल हैं। इन तीनों देशों में आज भी शादी से पहले वर्जिनिटी टेस्ट या फिर वर्जिनिटी सर्टिफिकेट मांगा जाता है। ईरान की मेडिकल संस्थाओं का कहना है कि वर्जिनिटी टेस्ट को वो विशेष परिस्थितियों में करते हैं. जैसे कि अदालत का मामला हो या फिर बलात्कार का आरोप।
वर्जिनिटी सर्टिफ़िकेट की अधिकतर मांग वो जोड़े करते हैं जो शादी करने जा रहे हों। ऐसे में ये निजी क्लिनिकों में जाते हैं जिसमें आमतौर पर लड़कियों के साथ उनकी माएं होती हैं। महिला डॉक्टर या मिडवाइफ़ टेस्ट करती हैं और उसके बाद सर्टिफ़िकेट जारी कर देती हैं। इसमें लड़की का नाम, उसके पिता का नाम और राष्ट्रीय पहचान पत्र के अतिरिक्त कुछ फोटो होते के साथ ही सर्टिफ़िकेट पर हाइमन कि स्थिति दर्ज की जाती है। जिसमें आमतौर पर लिखा होता है कि लड़की वर्जिन प्रतीत होती है। रूढ़िवादी परिवारों में दस्तावेज़ पर दो गवाहों के साइन होते हैं। जो आमतौर पर माएं होती हैं। सर्टिफिकेट जारी करने वाली संस्थाएं कहती हैं कि ये एक अपमानजनक प्रथा है। हालांकि वो ये मानते हैं कि वास्तविकता में वो महिलाओं की मदद करती हैं।
Read also: बिहार जैसा दृश्य अब पूरे देश में दिखेगा: तेजस्वी
उन पर परिवारों का इतना अधिक दबाव होता है कि कई बार वो दंपति के लिए मौखिक रूप से झूठ बोलना पड़ता है। कई मौके पर जोड़े अगर सेक्स कर चुके हैं और शादी करना चाहते हैं तो इन संस्थानों को परिवार के सामने लड़की को वर्जिन सर्टिफिकेट देना होता है। इन देशों में आज भी पुरुषों के लिए वर्जिन लड़की से शादी करना ही प्राथमिकता है। अगर कोई लड़की शादी से पहले अपनी वर्जिनिटी गंवा देती है तो वो भरोसेमंद नहीं मानी जाती हैं। वो किसी और पुरुष के लिए अपने पति को छोड़ सकती है। वर्जिनिटी टेस्ट के ख़िलाफ़ भले लोग अब बोल रहे हों और प्रदर्शन करते हो। लेकिन ईरान के समाज और संस्कृति में ये विचार काफी गहरा है। सरकार द्वारा निकट भविष्य में इस पर प्रतिबंध लगाने की संभावना बहुत कम नज़र आती है। पिछले एक साल से इस प्रथा के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलनों की संख्या भी बढ़ी है।
