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उत्तराखंड में UCC सर्वे दिखावा या हकीकत

आर्टिकल/इंटरव्यूउत्तराखंड में UCC सर्वे दिखावा या हकीकत

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अमित बिश्‍नोई

समान नागरिक संहिता भाजपा का पुराना संकल्प रहा है, इस विवादित मुद्दे को वो समय समय पर उभारकर देश की नब्ज़ भी टटोलने की कोशिश करती रही है. केंद्र में जब मोदी सरकार वजूद में आयी तब कश्मीर में अनुच्छेद 370, CAA-NRC के साथ समान नागरिक संहिता की बात बड़ी तेज़ी से उठी थी. लेकिन केंद्र की मोदी सरकार इस मुद्दे को अपनी प्राथमिकता से फिलहाल के लिए टाल दिया और दूसरे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। समय बीतता रहा और केंद्र में मोदी-2 का दौर शुरू हुआ. कश्मीर में आर्टिकल 370 का मुद्दा हल हो चूका था, CAA-NRC पर हालाँकि सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी मगर केंद्र की अभी भी प्राथमिकता CAA-NRC ही है, यह अलग बात है कि उसने समान नागरिक संहिता के संकल्प के लिए अपने शासन वाले राज्यों को ज़िम्मेदारी सौंप दी और इस मुद्दे को जीवित रखने का निर्देश दिया. निर्देशों का पालन करते हुए उत्तराखंड सरकार इस मामले में काफी आगे बढ़ चुकी है. धामी सरकार समान नागरिक संहिता पर पिछले एक महीने से सर्वे भी करा रही है जो अब पूरा हो चूका है और अगले महीने इसकी रिपोर्ट सरकार को मिल जाएगी. सरकार ने एक प्रोफोर्मा जारी कर लोगों से ऑनलाइन और ऑफलाइन उत्तराखंड के निवासियों से समान नागरिक संहिता लागू करने पर सुझाव माँगा गया है. सर्वे पर सवाल भी उठ रहे हैं, सबसे बड़ा सवाल तो इस कवायद पर उठ रहा है, भाजपा की नीयत पर उठ रहा है. बड़ा सवाल यह है कि केंद्र ने इस मुद्दे को भाजपा शासित राज्य सरकारों को क्यों सौंपा? क्यों वो खुद इस मुद्दे को अभी ठन्डे बस्ते में डाले हुए है और उससे बड़ा सवाल यह है कि यह सर्वे एक भूमिका बनाने की कोशिश है या फिर वाकई में लोगों से उनकी राय जानना चाहती है.

इस विवादित मुद्दे की बात करें तो यह मामला सबसे पहले असम से उठाया गया, हेमंत बिस्वा सरमा ने समान नागरिक संहिता को असम प्रदेश की बड़ी ज़रूरत बताया. सबसे पहले उन्होंने ही कहा था कि असम सरकार जल्द uniform civil code का मसविदा तैयार करेगी। बिस्वा सरमा ने मुस्लिम महिलाओं के लिए अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा था कि कोई भी मुस्लिम महिला यह नहीं चाहती कि उसका शौहर घर में तीन बीवियां और लेकर आये, सरकार को मुस्लिम महिलाओं की चिंता है. अब भाजपा सरकारों को वाकई मुस्लिम महिलाओं की चिंता है या फिर यह साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण की उसकी पुरानी रणनीति है, यह हमेशा बहस का विषय रहा है और आगे भी रहेगा लेकिन भाजपा की यह लगातार कोशिश रहती है कि इस तरह का कोई न कोई मुद्दा देश की सियासत में लगातार बने रहना चाहिए।

हेमंत बिस्वा सरमा का UCC पर मसविदा अभी तैयार हुआ या नहीं इसकी अभी पूरी जानकारी नहीं है लेकिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस मुद्दे पर ज़रूर गंभीर प्रयास करते हुए नज़र आ रहे हैं. UCC पर सर्वे इसी का सबूत है. उन्होंने पिछले महीने इसके लिए विशेषज्ञ कमिटी का गठन किया और लोगों को सुझाव देने के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाकर उनसे इस मुद्दे पर राय मांगी। धामी ने कहा था कि आजतक कोई भी कानून बनाने के लिए किसी सरकार ने लोगों से सुझाव नहीं मांगे। धामी की यह बात खुद अपने आप में एक बड़ा सवाल है कि इस कानून के लिए लोगों से सुझाव मांगने की उसे ज़रुरत क्यों पड़ी. राज्य में भारी बहुमत की सरकार है, कोई कानून आराम से बिना किसी से राय लिए बना सकती है. तो फिर यह दिखावा क्यों? कश्मीर में तो उसने आर्टिकल 370 हटाने के लिए क्या कोई जनमत कराया था, क्या कश्मीर के लोगों से उनकी राय मांगी थी, क्या असम में NRC लागू करने के लिए उसने वहां के लोगों से कोई राय पूछी थी? तो फिर उत्तराखंड में रायशुमारी क्यों? बड़ा सवाल यह कि अगर सर्वे में समान नागरिक संहिता के विरोध में लोगों की राय सामने आती है तो क्या भाजपा सरकार इस मुद्दे को तिलांजलि दे देगी? मेरे ख़याल से तो बिलकुल नहीं।

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