Uttarakhand Surkanda Devi Temple: उत्तराखंड का अदभुत मंदिर, मिलता है जंहा औषधीय प्रसाद

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उत्तराखंड को पूरी दुनिया देवभूमि के के नाम से भी जानती है. मठ और मंदिरों का यह देश मंद‍िर में म‍िलने वाले प्रसाद के लिए भी जाना जाता है. उत्तराखंड के टिहरी जिले में स्थित इस मंदिर में आपको कुछ अलग ही प्रसाद मिलता है. मंद‍िर में लड्डू, पेड़ा और माखन-म‍िश्री का प्रसाद तो आपने लिया होगा. लेक‍िन माँ सुरकंडा देवी मंदिर में आपको कुछ अलग ही तरह का प्रसाद म‍िलता है. यहां प्रसाद के रूप में भक्‍तों को “रौंसली” की पत्तियां दी जाती हैं। औषधीय गुणों भी भरपूर ये पत्तियां कई रोगों को दूर करने में सहायक होती है. यही नहीं स्थानीय लोग इसे देववृक्ष की पत्तियां मानते हुए इसका पूजन करते है. कहा जाता है कि इन पत्तियों को ज‍िस भी स्‍थान पर रखा जाए वहां सुख-समृद्धि का वास होता है। औषिधीय मान्यता लिए हुए इस वृक्ष की लकड़‍ियों का प्रयोग पूजा के अलावा क‍िसी अन्‍य कार्य में नहीं किया जाता है. देववृक्ष की लकड़ियों को ईमारत व् फर्नीचर बनाने के काम में भी नहीं लिया जाता है.

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 सुरकण्डा मंदिर की मान्यता
 
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर को भगवान् शिव और माँ सती से जोड़ कर देखा जाता है. कहा जाता है कि राजा दक्ष ने एक वैद‍िक यज्ञ का आयोजन में भगवान्  शिव  को  छोड़ सभी को आमंत्रित क‍िया. भोलेनाथ के लाख समझाने के बावजूद भी देवी सती अपने प‍िता दक्ष के यज्ञ में शाम‍िल होने गईं। वहां भगवान शिव के लिए की गई सभी के द्वारा की जाने वाली अपमानजनक टिप्पणी से वह अत्‍यंत आहत हुईं। फलस्‍वरूप उन्‍होंने यज्ञ कुंड में अपने प्राण द‍िए। भगवान शिव को जब यह समाचार मिला तो वो नाराज हो गए और सती माता के पार्थिव शरीर को कंधे पर रख तांडव करने लगे. धरती को बचने के लिए श्रीहर‍ि ने अपने सुदर्शन चक्र को सती के नश्वर शरीर को के कई टुकड़े कर दिए. सती के शरीर के 51 भाग हुए और वह भाग जहां गिरे वहां पवित्र शक्ति पीठ की स्थापना हुई। माना जाता है की यँहा पर माता सती का सर गिरा था. जिसके बाद यह स्थान सिरकंडा कहलाया जो वर्तमान में सुरकंडा नाम से प्रसिद्ध है।

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 माता के दरबार में पहुंच हुई आसान 

51 शक्ति पीठ में से एक सुरकण्डा सुरकुट पर्वत पर स्थित है. जो समुद्रतल से 9995 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। मंद‍िर में देवी काली की प्रत‍िमा स्‍थापित है। मंद‍िर में पूरी होने वाली मुरादों को लेकर केदारखंड व स्कंद पुराण में एक कथा म‍िलती है। इसके अनुसार इसी स्‍थान पर प्रार्थना करके देवराज इंद्र ने अपना खोया हुआ राज्‍य वापस प्राप्‍त क‍िया था। पूर्व में इस मंदिर तक जाने के लिए करीब 4 किलोमीटर की खड़ी चढाई करनी पड़ती  थी लेकिन  उत्तराखंड सरकार के प्रयासों  से यह  चढाई अब  रोपवे से तय की जा सकती है. जिसकी हाल ही में शुरुवात की गई है. तो अगली बार जब भी आप उत्तराखंड आये तो टिहरी जिले में स्थित सुरकण्डा मंदिर आकर यँहा के ओषधीय गुणों वाले प्रसाद को अवश्य प्राप्त करें.

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