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पहाड़ का पहला अरबपति Dan Singh ‘मालदार’ जिसने चीन को भी पछाड़ा

Dan Singh Bisht

देहरादून- भारत में जब भी अरबपति लोगों का जिक्र होता है तो हमेशा टाटा, अंबानी, बिरला जैसे नाम सामने आते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं पहाड़ के पहले अरबपति के बारे में जिसने न केवल व्यापार में चीन को मात दी बल्कि अपने व्यापार का लोहा अंग्रेजी हुकूमत को भी मानने पर मजबूर कर दिया. हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड के पहले अरबपति कहे जाने वाले ‘दान सिंह’ “मालदार” की. टिंबर किंग ऑफ इंडिया कहे जाने वाले दान सिंह ने अपना व्यापार जम्मू से लेकर लाहौर और नेपाल के काठमांडू सहित कई देशों में अपना लोहा मनवाया. दान सिंह का परिवार घी का व्यापार किया करते थे.

घी के व्यापार से टिंबर किंग तक का सफर

प्रथम विश्व युद्ध से पहले रायसिंह नेपाल के बैतड़ी मैं मामूली शादी का व्यापार किया करते थे. फर्स्ट वर्ल्ड वार शुरू हुआ तो राय सिंह के लिए यह एक बड़ा अवसर साबित हुआ और उन्होंने पिथौरागढ़ आकर सेना को घी सप्लाई करने का काम शुरू किया. जिसके बाद राय सिंह के परिवार की माली हालत सुधरने लगी अब राय सिंह और उनके बेटे देव सिंह ठेकेदारी के काम में भी अपना हाथ आजमाने लगे और लगातार नई ऊंचाइयां छू रहे थे. लेकिन अभी उन ऊंचाइयों को छूना बाकी था जहां से राय सिंह के परिवार को शायद ही कोई भूल सके. राय सिंह के पोते दान सिंह ने व्यापार की ऐसी ऊंचाइयों को छुआ कि आज भी पहाड़ पर उन्हें पहले अरबपति होने का गौरव हासिल है. बताते हैं कि 1906 में दान सिंह अंग्रेज अधिकारी के साथ लकड़ी के कामों की बारीकियों को जानने के लिए वर्मा गए. जिसके बाद दान सिंह ने व्यापार की उन सभी ऊंचाइयों को छुआ जहां हर कोई पहुंचना चाहता है.

अंग्रेजों से खरीदे गांव

डांसिंग लकड़ी के व्यापार में कितना आगे पहुंच गए थे कि अब हर जगह उनकी अकूत संपत्ति होने लगी. बताया जाता है कि दान सिंह ने अंग्रेजों से कुमाऊं के 22 गांव की हकदारी बड़ी रकम चुका कर ली थी. यही नहीं दान सिंह चाय के काम में भी अब उतर चुके थे और उन्होंने बेरीनाग में बड़ा चाय का बागान खरीदा. बताया जाता है कि उस समय चीन की चाय सबसे बेहतर मानी जाती थी, दान सिंह ने चीन की चाय का तोड़ निकालते हुए वहां की अपने को बेहतर साबित किया.

चुनाव में जमानत जप्त

दान सिंह जब व्यापार की बुलंदियों पर थे तब उन्होंने व्यापार के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारियों का भी बखूबी निर्वहन किया. दान सिंह न केवल अंग्रेजों के प्रिय थे अपितु लोगों में भी उनके लिए काफी सम्मान था. बताया जाता है कि दान सिंह ने हरगोविंद के खिलाफ चुनाव लड़ा और चुनाव में बेइंतेहा पैसा बहाने के बाद भी वे अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए. जिसके बाद उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा.

शुगर मिल से हुआ पतन

दान सिंह जितनी तेजी से कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रहे थे उसी तेजी से उनका पतन भी हुआ. बताया जाता है कि 1956 किच्छा में 2 हजार टन प्रतिदिन की क्षमता वाली शुगर मिल शुरू करने की लिए दान सिंह ने बांग्लादेश से बड़ी मशीनें मंगवाई. उन्हें उम्मीद थी कि सरकार से उन्हें इस पर रियायत मिलेगी, लेकिन बांग्लादेश से चली मशीनें कोलकाता के बंदरगाह पर उत्तर ही नहीं पाई. जिसके चलते दान सिंह शुगर मिल को 1 दिन भी नहीं चला पाए. कहा जाता है कि इस घटना का उन पर बड़ा असर हुआ और उनके स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी. 10 सितंबर 1964 को वह इस दुनिया से अलविदा कह गए. उनके बाद भाई मोहन सिंह बिष्ट ने उनके कारोबार को संभाला लेकिन जिस ऊंचाई पर दान सिंह अपने व्यापार को ले गए थे वहां से जमीन पर आते देर न लगी और पूरा व्यापार चौपट हो गया.

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