- उत्तराखंड में 12 प्रतिशत है सैन्य परिवारों का वोटबैंक
सुनील शर्मा।
उत्तराखंड की राजनीति में जीत सुनिश्चित करनी है तो सैन्य वोटरों का साथ होना बेहद जरूरी है। सैन्य बहुल राज्य में सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों पर सभी राजनीतिक दलों की निगाहें टिकी हुईं हैं। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की बेला में प्रत्येक राजनीतिक दल खुद को सैनिकों का हितैषी साबित करने का प्रयास कर रहा है। कार्यक्रम, सम्मान समारोह आदि आयोजित कर सैन्य वोटरों को अपने पाले में खींचने की कोशिश की जा रही है।
जाति-धर्म से इतर उत्तराखंड में सैन्य वोट बैंक किसी भी चुनाव को पलटने में सक्षम है। कारण यह कि वर्तमान में उत्तराखंड में 2.67 लाख सैनिक और पूर्व सैनिक हैं जो राज्य के कुल वोटरों का लगभग 3.30 प्रतिशत बैठते हैं। यदि सैनिक और पूर्व सैनिकों के साथ उनके परिवारों के वोट को भी शामिल कर लिया जाये तो सैन्य वोटरों का प्रतिशत बढ़कर 12 तक पहुंच जाता है। अनेक पर्वतीय इलाके तो ऐसे हैं जहां हर परिवार में से एक व्यक्ति सेना में शामिल है। जाहिर है कि इस 12 प्रतिशत वोटबैंक में किसी भी राजनीतिक दल को सत्ता सिंहासन पर बैठाने या उसे सत्ता से बाहर करने की ताकत मौजूद है। यह वोटबैंक जिसको समर्थन दे देता है उसका पलड़ा चुनाव में हमेशा भारी रहा है।
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यही कारण है कि उत्तराखंड के सभी राजनीतिक दल सैन्य वोटबैंक को लुभाने का हर संभव प्रयास करते रहे हैं। सैनिकों के हित में योजनाएं लाने, घोषणाएं करने, पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ गठित करने का कार्य प्रत्येक राजनीतिक दल करता आया है। अब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही सैनिकों के हित में आवाज बुलंद कर खुद को उनका सबसे बड़ा हितैषी साबित करने का प्रयास सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं।
सैनिक बहुल प्रदेश में सत्तारूढ भाजपा उत्तराखंड में शहीद सम्मान यात्रा आयोजित कर सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों तक पहुंच बनाने में जुटी हुई है। उत्तराखंड में सैन्य धाम बनाने की घोषणा कर भाजपा सैनिकों के बलिदान को सम्मान देने का प्रयास बता रही है। भाजपा के अनेक वरिष्ठ नेता सैन्य पृष्ठभूमि से रहे हैं जो सैन्य वोटरों को भाजपा से जोड़े रखने में मदद करते हैं। सैनिकों के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं भी उत्तराखंड भाजपा सरकार ने अपने शासनकाल में की हैं।
वहीं कांग्रेस भी सैन्य पृष्ठभूमि वाले मतदाताओं को लुभाने और स्वयं को सैनिकों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने का प्रयास कर रही है। सैनिक सम्मान सम्मेलन आयोजित कर कांग्रेस इस प्रभावशाली वोटबैंक तक पहुंच बना रही है। वहीं आम आदमी पार्टी भी उत्तराखंड की राजनीति में सैन्य वोटरों का महत्व भली-भांति समझ रही है। ऐसे में आप ने उत्तराखंड के सीएम के तौर पर पूर्व सैनिक को पेश किया है।
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हालांकि सैन्य पृष्ठभूमि वाले वोटर अंतिम समय तक अपने पत्ते खोलते नहीं हैं। ऐसे में यह वोटबैंक किस राजनीतिक दल के पाले में जायेगा यह कहना तो मुश्किल है। लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक, अभिनंदन की पाकिस्तान से वापसी, वन रेंक, वन पेंशन और सैन्य धाम का निर्माण जैसे मुद्दे इस वोटबैंक को भाजपा की ओर आकर्षित जरूर कर रहे हैं। लेकिन चुनाव आने में अभी समय है और मन कभी भी बदल सकता है। देखना होगा की अंतिम समय पर राजनीति किस करवट बैठती है और सैन्य वोटरों का झुकाव किस राजनीतिक दल को सत्ता सिंहासन पर बैठायेगा। फिलहाल तो इस बड़े वोटबैंक को सभी राजनीतिक दल अपना साबित करने में जुटे हैं।

