बिजनेस बाइट्स स्पेशल’‘पक्की दारू पक्का वोट, दारू-मुर्गा खुला वोट’

उत्तर प्रदेशबिजनेस बाइट्स स्पेशल’‘पक्की दारू पक्का वोट, दारू-मुर्गा खुला वोट’

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  • पंचायत चुनाव में चल रही दारू-मुर्गे की पार्टियां
  • लंच किसी प्रत्याशी के यहां तो डिनर दूसरी प्रत्याशी के यहां कर रहे मतदाता
  • छुटभैये नेताओं की आयी मौज, पेट के साथ भरी जा रही हैं जेबें

सुनील शर्मा

न्यूज डेस्क। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की सरगर्मियां तेज होती जा रही हैं। प्रत्याशी कमर कस कर चुनावी मैदान में उतरने को बेताब हैं। वोटरों को अपने पाले में खिंचने को बेताब प्रत्याशी दिन-रात दावतें दे रहे हैं। और दावतें भी आलू-पूड़ी की नहीं बल्कि दारू-मुर्गे की दी जा रही है। ऐसे में वोटरों की मौज आ रही है और वह लंच किसी प्रत्याशी के साथ तो डिनर दूसरे प्रत्याशी के यहां कर रहे हैं। वहीं पक्के वोट दिलाने की ठेकेदारी करने वाले छुटभैये नेता तो पेट के साथ जेब भी गरम कर रहे हैं। चुनावी बेला में सबको साथ लेकर चलना प्रत्याशियों की मजबूरी है इसलिये वह चुपचाप जेब ढीली कर सबको निभाए जा रहे हैं।

पंचायत चुनाव के रणक्षेत्र में उतरे प्रत्याशियों का चुनावी नारा जो भी हो लेकिन उनके समर्थन में खडे़ होने और उनकी जीत सुनिश्चित बताने वाले वोटरों का नारा ‘कच्ची दारू कच्चा वोट, पक्की दारू पक्का वोट, दारू मुर्गा खुला वोट’ ही है। प्रत्याशी चाहे जो भी हो जो अच्छी दारू पिलायेगा उसको वोट मिलने की गारंटी दी जा रही है। अब दारू के साथ मुर्गा पार्टी और चिकन न खाने वालों के लिये पनीर का इंतजाम किया जाता है। इन पार्टियों के चलते शाम ढलते ही गांव को माहौल रंगीन होने लगा है।

शहरों के वोटर पड़ रहे महंगे

पंचायत चुनाव में वोट डालने के लिये शहरों में जाकर रहने लगे या काम कर रहे लोगों को भी प्रत्याशियों द्वारा वापस बुलाया जा रहा है। वोटरों की यह कैटेगरी प्रत्याशियों के लिये सबसे अधिक महंगी पड़ रही है। इन शहरी वोटरों के गांव आने-जाने का खर्च और काम के नुकसान की आर्थिक भरपाई भी प्रत्याशियों द्वारा की जा रही है। बहुत से वोटर तो ऐसे हैं जो कई प्रत्याशियों से अलग-अलग खर्च ले रहे हैं। प्रत्याशी सब कुछ जानते हुए भी चुप बैठकर उनकी मांगों को पूरा कर रहे हैं। क्योंकि चुनाव में मतदाताओं की नाराजगी मोल लेने का खतरा कोई नहीं उठाना चाहता।

दिन में बीयर, रात में दारू

गांव में शाम तो रंगीन होती ही है मगर दोपहर को हसीन बनाने का इंतजाम भी पूरा होता है। दिन की दावतों में लोग दारू की बजाये बीयर पीना अधिक पसंद कर रहे हैं। वहीं शाम को महंगी शराब पिलाने वाला प्रत्याशी पहली पसंद होता है। प्रधान पद के उम्मीदवारों के साथ क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत सदस्य भी वोटरों को लुभाने में लगे हुए हैं।

गांवों में शाम ढलते ही जश्न का माहौल दिखने लगता है। शहरों में रह रहे लोग भी वोट डालने गांव लौट रहे हैं। उनके आने-जाने के खर्च का इंतजाम भी उम्मीदवार ही कर रहे हैं।

चिकन-मटन के बढ गये रेट

गांवो में चल रही दावतों के कारण चिकन-मटन के रेट बढ गये हैं। पहले जहां चिकन के रेट लगभग 130 रुपये थे वहीं अब मुर्गा 200 रुपये किलो पर जा पहुंचा है। आने वाले दिनों में मुर्गे के दामों में और इजाफा होने की उम्मीद जताई जा रही है। वहीं मटन-मछली के रेट भी सिर चढ़ कर बोल रहे हैं। पनीर के दाम भी पहले से बढ़ गये हैं लेकिन उसकी डिमांड में बहुत अधिक फर्क नहीं आया है। गांवों में ‘सूरज अस्त, वोटर मस्त’ का माहौल है और शराब-मुर्गा के साथ नकद रुपये भी मतदाताओं को बांटे जा रहे हैं।

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