रंजीता सिन्हा
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी पश्चिम बंगाल सरीखा ‘खेला’ हो सकता है। इसे कोरोना से मची हाहाकार कहें या सरकार की नीति-विशेष का साइड-इफेक्ट, यूपी के मुस्लिम वोटर सहित सभी जाति-संप्रदाय से जुड़ा एक बड़ा वर्ग सत्ता-संचालकों के तरीकों से इत्तेफाक नहीं रखना चाहता। खासकर मुस्लिम वोट बैंक ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणामों में साल 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए एक अहम संदेश दे ही दिया है। इसे बिहार चुनाव परिणामों का अनुभव कहें या मुस्लिम वोटर्स की दूरगामी सोच… यूपी के मुसलमान अगर राज्य के भावी विधानसभा चुनाव में खासकर भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए मोदी फैक्टर से मुकाबला कर लेने का साहस रखने वाले दल और उसके साहसी नेता को ही एकजुट होकर अपना समर्थन दें तो आश्चर्य न होगा। जाहिर है पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस के सहयोगी एआईयूडीएफ और असदुद्दीन ओवैसी से ज्यादा ममता बनर्जी का साथ दिया। इसी का नतीजा है कि बंगाल की सभी सातों सीटों पर असदुद्दीन ओवैसी व कांग्रेस के सहयोगी एआईयूडीएफ के तमाम प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई।
उत्तर प्रदेश की बात की जाय तो यह सवाल अब अहम है कि यहां का मुसलमान अगर बीजेपी को नापंसद करता है तो किस ओर रुख करेगा? हालांकि यूपी में जातीय समीकरण के अलावा 18 फीसदी मुस्लिम व 5 फीसद जाट वोट बैंक भी प्रदेश की राजनीति में खासी भूमिका निभाता है, जिनपर तमाम दलों की नजर रहती है। मुस्लिम वोटों पर भी हाल के सालों में सपा की पैठ रही है लेकिन जिस तरह से ओवैसी की पार्टी ने प्रदेश में सभी 403 सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान किया है उसने सपा की मुश्किलों को भी बढ़ा दिया है। वैसे ओवैसी की पार्टी ने बिहार की तर्ज पर बंगाल में मुस्लिम बहुल सीटों पर फोकस किया था लेकिन बिहार की तरह वो मुस्लिमों के दिल नहीं जीत पाई। यूपी में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ममता बनर्जी के प्रशंसक और समर्थक हैं। अगर चुनाव में अखिलेश के समर्थन में ममता बनर्जी उतरीं तो संभवत: मोदी फैक्टर की मुखालफत करने वाला एक खास वोटबैंक सपा की ओर आकर्षित हो सकता है। हालांकि मोदी फैक्टर के मुकाबिल राहुल-प्रियंका की जोड़ी भी कहीं से कम नहीं।
बहरहाल, दिल्ली पर सत्तासीन आम आदमी पार्टी भी यूपी में इस बार किस्मत आजमाने को तैयार है। आम आदमी पार्टी के दिल कें भी मुस्लिम सॉफ्ट कॉर्नर हैं। बीजेपी विरोधी होते हुए एक ओर ओवैसी अपनी मुस्लिम परस्ती के कारण यूपी के मुस्लिम वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करेंगे तो दूसरी ओर ‘आप’ केजरीवाल मॉडल के भरोसे इनका समर्थन लेना चाहेंगी। हालांकि, हकीकत यह है कि फिलवक्त इन दोनों की पार्टियों का वोटबैंक के रूप में यूपी में कोई मजबूत आधार नहीं है।
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इधर यूपी में सत्तासीन होते आये भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा जैसे प्रमुख दल अपने-अपने मुख्य वोट बैंक के इतर दूसरे वोट बैंक में सेंधमारी की पूरी कोशिश में जुटे हैं। इसी कड़ी में जहां भाजपा, यूपी के दलित वोट बैंक को अपनी ओर करने की कोशिश में है, तो सपा मुस्लिम व यादव वोट बैंक में दूसरे दलों की सेंधमारी को रोकने की पुरजोर आजमाइश कर रही है जिससे मुसलमानों का दूसरी पार्टी की ओर मोह ना हो। वहीं कांग्रेस ने इंदिरा गांधी की वास्तविक सियासी दावेदार समझी जाने वालीं प्रियंका गांधी को यूपी में मुख्य नेतृत्वकर्ता बना दिया है। रही बात मायावती की तो उनके भाजपा को लेकर तीखे तेवर अब पहले जैसे नहीं रहे।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि यूपी में जिस भी पार्टी को 30 फीसद वोट मिलता है वह प्रदेश में सरकार बनाने में सफल होती है। ऐसे में छोटे-छोटे समीकरण भी पार्टियों के लिए काफी अहम हैं और वह इन जातीय समीकरणों को नजरअंदाज नहीं किया सकता। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को नजरंदाज करना मुश्किल होगा।

