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बेगम अख्तर की नकल किया करती थी- सुनीता झींगरन


बेगम अख्तर की नकल किया करती थी- सुनीता झींगरन

Zeba Hasan

संगीत उन्हें विरासत में मिला था। उनके पर-नाना बैजूबावरा और तानसेन के गुरु रहे हैं। मलिका-ए-गज़ल बेगम अख्तर (Begum Akhtar) ने उन्हें गले लगाते हुए कहा था कि ‘भले ही मैं ना रहूं लेकिन मेरे बाद जब लोग तुम्हें सुनेंगे तो मुझे याद करेंगे’। बात हो रही है शास्त्रीय संगीत गायिका सुनीता झिंगरन (Sunita Jhingran) की। लखनऊ से रिश्ता रखने वाली, चार साल की उम्र से संगीत की शिक्षा की शरुआत करने वाली सुनीता झिंगरन पूरे हिंदुस्तान में हुसैनी ब्रह्म्ण के नाम से भी जानी जाती हैं। प्रॉफेट हजरत मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन (जिनकी शहादत और कुर्बानियों की याद में मुहर्रम मनाया जाता है) और उनके परिवार से उनकी मोहब्बत उनकी अवाज में दर्द बनकर बयां होती है। उनकी आवाज में पढ़े जाने वाले मर्सियों को सुनने के लिए लोग दूर दूर से फरमाइश करते हैं। हिंदु ब्राह्मण होते हुए इमाम हुसैन और उनके परिवार से सुनीता झींगरन का प्यार अब उनकी पहचान बन गया है।

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यह ज़मीं शब्बीर की यह आसमां शब्बीर का…

हिंदु ब्राह्म्ण होते हुए इमाम हुसैन और उनके परिवार से बेपनाह मोहब्बत करने के सवाल पर सुनीता यह शेर सुनाती हैं कि

आंख में उनकी जगह दिल में मकां शब्बीर का

यह जमीं शब्बीर की यह आसमां शब्बीर का

जब आने को कहा था कर्बला (इराक का एक शहर) से हिंद में

उसी रोज से हो गया हिंदुस्तां शब्बीर का।


सुनीता कहती हैं किमैं पिछले 27 साल से मिर्सिया और सलाम पढ़ रही हूं। मैंने स्वर्गीय क़ारी हैदर हुसैन से बकायदा इसकी तालीम ली है। और इस फन में कदम रखने का क्रेडिट बॉलिवुड डायरेक्टर मुजफ्फर अली को जाता है। उन्होंने मुझसे कहा था कि आपकी आवाज में जो दर्द है उसे मर्सिया और सलाम में भी आजमा कर देंखे। बस उनकी इस बात को मैंने दिल से लगा लिया था। तब से शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी जारी है। लखनऊ के बाहर भी मैं नौहे और मर्सिये पढ़ने के लिए जाती हूं।


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एक दिन भेज दिया बेगम अख्तर ने बुलावा

बेगम अख्तर (Begum Akhtar) से गुलुकारी की बारीकियां सीखने वाली सुनीता अपने और बेगम के रिश्ते की शुरुआत की दिलचस्प किस्सा कुछ यूं बयां करती हैं कि मैं बेगम अख्तर की गायिकी की दीवानी थी। उनके गाने सुना करती थी और उनकी आवाज की नकल भी करती थी। पता नहीं कैसे कहीं बेगम साहिबा ने मेरी आवाज सुन ली। उन्होंने पूछा कि यह कौन है इसे मेरे पास लेकर आओ। एक सुबह उनके देवर हमारे घर आए और पिता जी से बोले कि सुनीता को बेगम साहिबा ने बुलाया है। यह सुनते ही पिता जी मेरे पास आए और बोले कि जिनसे मिलने के लिए, जिनसे बात करने के लिए तुम तरसती हो उन्होंने खुद तुम्हे बुलाया है चलो तैयार हो आओ। मेरे तो हाथ पैर फूल गए थे, हम उनके घर पहुंचे तो उन्होंने मेरा नाम पूछा और मुझसे कहा कुछ सुनाओ। मैंने जब उन्हें उन्हीं की गजल सुनाई तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया। उनकी आंखों में आंसू थे और वह बोली कि जब मैं न रहूंगी और लोग तुम्हें सुनेंगे तो मुझे जरूर याद करेंगे।

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