अमित बिश्नोई
मोहल्ले में आज एक मदारी आया, साथ में एक बंदरिया भी लाया, डुगडुगी बचाई तो बच्चों ने घेरा डाल दिया। मदारी ने डुगडुगी बजाकर बंदरिया को अपने इशारे पर नचाने वाला पुराना खेल दिखाना शुरू कर दिया। इस खेल को मैंने भी अपने बचपन में खूब देखा और शायद हमारे पूर्वजों ने भी। मदारी और बंदरिया से याद आया कि यूपी की सियासत में भी इन दिनों कुछ इसी तरह का खेल चल रहा है। मदारी के रूप भाजपा रुपी योगी जी नज़र आ रहे हैं तो वहीँ इशारों पर हरकत करने वाले की जगह चाचा शिवपाल दिखाई दे रहे हैं।
Read also: MLC Chunav 2022: इस हार को मैं क्या नाम दूँ?
चाचा शिवपाल यादव इस वक़्त यूपी की सियासत की धुरी और मीडिया की आँखों का तारा बने हुए हैं, हों भी क्यों न? रोज़ चटखारे वाली खबरें जो पैदा कर रहे हैं। रोज़ ही खबर आ रही हैं कि शिवपाल अब यहाँ हैं, चाचा अब योगी जी की गली से निकले हैं, अब भाजपा के फलां नेता को फोन किया है , भाजपा में जाना अब मात्र औपचारिकता है, सबकुछ सेट हो चूका। चाचा शिवपाल भी गदगद हैं कि उन्हें इतनी फुटेज मिल रही है, और इस फुटेज से भतीजा खीज रहा है, चिड़चिड़ा हो रहा है। सो वह भी कभी कॉमन सिविल कोड की पैरवी करके, कभी मोदी-योगी जी को ट्विटर पर फॉलो करके, कभी राम नवमी पर विशेष सन्देश देकर ख़बरों का बाजार गर्म किये हुए हैं। खबरिया चैनलों को चटखारे वाला मसाला मिला हुआ है, खूब नमक मिर्च लगाकर परोस रहे हैं।
अब अगर चुनाव पूर्व के घटनाक्रम को गौर से देखें तो आपको साफ़ लगेगा कि इस राजनीतिक सीरियल की पटकथा कहाँ लिखी जा रही है, इस सीरियल का निर्देशक कौन है और इसका मुख्य किरदार कौन है? चाचा और भतीजे में रिश्ते पहले से ही अच्छे नहीं थे यह सबको मालूम है यह तो चुनाव के समय एक युद्धविराम हुआ था जो चुनाव समाप्त होते फिर से शुरू हो चूका है और इसबार शायद निर्णायक रूप में। दोनों तरफ से यानि चाचा शिवपाल और भतीजे अखिलेश की ओर से। यह अलग बात है कि इस बार शुरुआत चाचा की तरफ से हुई है और यक़ीनन किसी के इशारे पर हुई है।
राजनीति में संकेत की भाषा का बड़ा महत्व होता है, कई बार कुछ बड़ा या कुछ निर्णायक करने से पहले संकेतों को भेजने का सिलसिला शुरू किया जाता है, शिवपाल भी पिछले कुछ दिनों से लगातार संकेत दे रहे हैं और यह संकेत उन्हें शायद इस सीरियल के निर्देशक से मिल रहे हैं और वह आज्ञाकारी बन्दर की तरह उसपर अपना रिएक्शन दे रहे हैं। यह खेल अभी लम्बा चलेगा या फिर मदारी इस खेले को जल्द समेट देगा, यकीन के साथ कहना मुश्किल होगा।
यूपी की सियासत वैसे भी बड़ी पेचीदा होती है, अक्सर ऐसा होता है कि जो दिखता है वो होता नहीं और जो होता है उसे लोग देख नहीं पाते। इसीलिए राजनीति को संभावनाओं का खेल कहा जाता है, इसमें कुछ भी हो सकता है. राजनीतिक गलियारों में अखिलेश, शिवपाल, आज़म खान और भाजपा को लेकर बहुत कुछ गश्त कर रहा है, तमाम संभावनाओं की तलाश की जा रही है. भाजपा में शिवपाल के जाने की बातों को जहाँ सबसे ज़्यादा हवा मिल रही है वहीँ शिवपाल और आज़म को लेकर एक नई सम्भावना की भी बात हो रही है और इन सबके बीच सपा के मुस्लिम विधायकों पर भी चर्चा हो रही है। कहा तो यहाँ तक जा रहा कि अखिलेश से मुसलमानों की चुनाव बाद उपजी नाराज़गी का कोई बड़ा राजनीतिक फायदा उठाने की पटकथा भी लिखी जा रही है, इस बीच शिवपाल द्वारा अपनी पार्टी प्रस्पा की सभी इकाइयों को भंग करने के एलान ने अफवाहों का बाजार और भी गर्म कर दिया है।
Read also: कांग्रेस के लिए Prashant Kishor क्या साबित होंगे हनुमान?
फिलहाल तो सबकुछ खिचड़ी लग रहा है लेकिन यह तो तय है कि पक तो कुछ रहा है, उम्मीद है जल्द ही पता चल जायेगा कि क्या पका है और किसने पकाया है और कौन इसे खाने वाला है, फिलहाल हम तो मदारी और बंदरिया की जुगलबंदी का मज़ा उठा रहे हैं।
