लखनऊ: उत्तर प्रदेश में मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल छह महीने बाद 14 मार्च 2022 को समाप्त हो रहा है। सूबे में सभी दलों ने आने वाले 2022 यूपी विधान सभा चुनाव के लिए अपनी राजनैतिक बिसात बिछाने का काम शुरू कर दिया हैं। वहीं सी-वोटर सर्वेक्षण ने चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत की भविष्यवाणी कर यूपी के राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया हैं।
कई विश्लेषक इन चुनावों को 2024 में होने वाले लोक सभा चुनावों के सेमीफ़ाइनल के रूप में देखते हैं। क्योंकि राजनीतिक हलक़ों में ये बात मशहूर हैं कि दिल्ली कि सत्ता का रास्ता यूपी से होकर गुजरता हैं। सूबे में भाजपा की जीत 2024 के आम चुनावों में पार्टी की संभावनाओं को बढ़ावा देगी।
वहीं सत्ता के गलियारों में यह चर्चा जोरों पर हैं कि यह विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद निर्विवाद रूप से योगी आदित्यनाथ को भाजपा में नंबर 3 के नेता के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और प्रधान मंत्री बनने की उनकी महत्वाकांक्षाओं को पंख देगा।
इस साल अप्रैल में हुए पंचायत चुनाव में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, जिसने पार्टी की उम्मीदों को बढ़ा दिया है। वहीं योगी सरकार सरकार में Covid 2nd wave में हुए कथित कुप्रबंधन और उससे उत्पन्न हुई आर्थिक तबाही, बढ़ती महंगाई, किसान आंदोलन को सपा अपने पक्ष में भुनाकर 2022 में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने का प्रयास कर रही हैं।
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हालांकि सपा के जीत की राह इतनी आसान नहीं हैं, कारण मौजूदा विधान सभा में बीजेपी को सपा से करीब 250+ सीटों और 18% वोट शेयर की बड़ी बढ़त हासिल है। वहीं बसपा “ब्राह्मण सम्मेलन” और जमीन पर दुबारा सक्रिय होने के चलते होने वाले त्रिकोणीय मुकाबले में करीब 15% -20% वोट शेयर बरकरार रखने में सफल दिख रही हैं जो सपा के काम को और अधिक कठिन बना देता है। हालांकि, राजनीति में असंभव कुछ भी नहीं है।
गौरतलब है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 40 फीसदी, सपा और बसपा को 22 फीसदी जबकि कांग्रेस को 6 फीसदी वोट मिले थे। अगर बीजेपी (BJP) 2017 की तुलना में 5% वोट शेयर खो भी देती है और इसका लाभ सपा को मिलता है, फिर भी भाजपा विजयी हो सकती है। जहां एबीपी सी-वोटर सर्वेक्षण के अनुमान के मुताबिक बीजेपी को 254 और सपा को 120 सीटें मिल सकती है।
यूपी में बीजेपी को हराने के लिए सपा को 20 फीसदी वोट-शेयर के बड़े झूले की जरूरत है जिससे वो बहुमत की छलांग लगा सके। हालांकि कई सकारात्मक बाते सपा के पक्ष मे जाती दिखती है जैसे गैर-यादव ओबीसी (Non-Yadav/OBC) जाट मतदाता महंगाई, और कृषि कानून के विरोध और ब्राह्मण उपेक्षा के चलते सपा का रुख कर सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ राजभर समुदाय (4%) का प्रतिनिधित्व करने वाली SBSP, जिसने ओवैसी के साथ मोर्चा बनाया है और चंद्रशेखर आजाद भी पश्चिम की कुछ दलित बहुल सीटों पर बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
c-voter सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार ब्राह्मण समुदाय के एक वर्ग (10%) का भाजपा से मोहभंग हो गया है। वहीं जाट समुदाय (2%) भाजपा के खिलाफ किसान विरोध का नेतृत्व कर रहा है और पश्चिमी यूपी में महत्वपूर्ण प्रभाव रखता है, जहां इसकी आबादी 15% -20% है। इसी क्षेत्र में सपा के सहयोगी दिवंगत अजीत सिंह की पार्टी आरअलडी (rld) का दबदबा है। लेकिन फिर भी भाजपा के 2014 से लगभग यथावत 40 फीसदी वोट बैंक में सेंध लगा पाना विरोधियों के लिए चुनौतीपूर्ण हैं।
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सपा प्रमुख अखिलेश यादव को सत्ता में वापसी के लिए बहुत प्रयास करने होंगे, योगी के साथ-साथ माया/प्रियंका को भी निशाना बनाना होगा और राज्य के लिए अपनी सकारात्मक दृष्टि का प्रचार करना करने के साथ सड़क पर उतरने की जरूरत है।

