लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (Uttar Pradesh Assembly Elections) के अंतिम चरण में पूर्वांचल की 111 सीटों में से सातवें चरण की 54 सीटों पर 7 मार्च को मतदान होगा। लेकिन पूर्वांचल मोदी-योगी के मैदान में होने के बावजूद भी भाजपा इस बार थोड़ी कमजोर दिख रही है।
बता दे कि पिछले विधानसभा चुनाव में छठे और सातवें चरण की 111 सीटों में एनडीए गठबंधन ने 85 सीटें जीती थी। जिसमें भाजपा ने अकेले 76 सीटें जीती थी वहीं सहयोगी अपना दल (एस) को 5 और सुभासपा को 4 सीटें मिली थी। जबकि सपा को 12 और बसपा को 11 सीटें तो कांग्रेस-निषाद पार्टी और निर्दलीय को एक-एक सीट मिली थी।
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हालांकि पूर्वांचल में मोदी-योगी (Modi-Yogi in Purvanchal) का गढ़ होने के बावजूद भी भाजपा के लिए जीत का समीकरण बैठाना आसान नहीं दिख रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अब तक हुए मतदान के रुझान से ऐसा लगता है कि अखिलेश यादव के गठबंधन ने पहले, दूसरे और छठवें चरण में सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है, जबकि भाजपा तीसरे, चौथे और पांचवे चरण में नुकसान को सीमित करने में कामयाब रही है। वहीं छठे और सातवें चरण में भाजपा के लिए बढ़त बनाए रखना आसान नहीं दिख रहा है।
विदित हो कि 2017 में बीजेपी को 325 सीटों का प्रचंड बहुमत मिला था लेकिन अगर सपा गठबंधन को अगर यूपी चुनाव में कामयाबी हासिल करनी है तो उसे बीजेपी को 200 से नीचे रोकना होगा।
पूर्वांचल के अंतिम चरण (Last phase of purvanchal) में भाजपा के कमजोर होने के कुछ कारण है जैसे- पूर्वी यूपी में बीजेपी का विजय मार्जिन यूपी के औसत से कम है। एनडीए ने यूपी की 403 सीटों में से 55 प्रतिशत सीटों पर 10 फीसदी से अधिक के वोट अंतर के साथ विजय प्राप्त की थी लेकिन पूर्वांचल की 44 फीसदी सीटों पर जीत का अंतर 10 फीसदी से कम था। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यहाँ एक-दो प्रतिशत का स्विंग और प्रत्याशी के प्रति विरोध खेल बिगाड़ सकता है।
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वहीं गैर यादव ओबीसी नेताओं को भाजपा और बसपा से अपने खेमें में लाने का फायदा भी सपा को पूर्वांचल में होता दिख रहा क्योंकि इस क्षेत्र में जातीय समीकरण व्यापक है और जातीय आधार पर छोटे दल अपनी पकड़ रखते है। इन्हीं में से प्रमुख राजभर बिरादरी के नेता ओपी राजभर (सुभासपा) जो करीब दो दर्जन सीटों पर अपने प्रभाव का दावा करते है, इस बार सपा गठबंधन के साथ दिख रहे है।

