By: Dheeraj Upadhyaya
लखनऊ: यूपी विधानसभा चुनाव अपने अंतिम स्टेशन पर पहुँचने वाला है लेकिन सवाल यह है कि क्या पूर्वांचल का आखिरी चुनावी स्टाप भाजपा या सपा किसे अपने गंतव्य उत्तरप्रदेश विधानसभा Uttar Pradesh Assembly तक पहुंचाएगा? जानकारों के मुताबिक जिस प्रकार किसानों की नाराजगी और महंगाई के मुद्दे पर सपा गठबंधन ने पश्चिम से शुरू हुए पहले चरण से तीसरे चरण तक बढ़त हासिल की वहीं अवध का चौथा-पंचवा फेज भाजपा के लिए राहत भरा रहा लेकिन कांटे की टक्कर वाला यह मुक़ाबला छठा–सातवाँ दौर आते-आते अंतिम और निर्णायक चरण में पूर्वांचल Purvanchal पहुँच गया है। इस क्षेत्र में जिस तरह से सपा ने जातीय आधार पर घेरेबंदी की है और बसपा ने यहाँ मजबूत सियासी बिसात बिछा रखी है। ऐसे में यहाँ भी भाजपा के लिए चुनौती कम नहीं है हालांकि यह तय है सरकार बनाने का अंतिम फैसला पूरब ही करेगा।
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बतादे कि पूर्वांचल में यूपी की कुल 33 फीसदी सीटे है। वहीं आखिरी दो चरणों में यहाँ कुल 111 सीटों पर मतदान होगा जिसमें 2017 में भाजपा गठबंधन ने कुल 85 सीटें जीती थी। जिसमें बीजेपी ने अकेले 76 सीटें जीती थी जबकि उसके सहयोगी अपना दल (एस) को 5 और सुभासपा को 4 सीटें मिली थी। वहीं, बसपा ने 11 और सपा ने 12 सीटें जीती थी तो कांग्रेस-निषाद पार्टी और निर्दलीय को एक-एक सीट मिल पायी थी।
गौरतलब है भाजपा ने भी अपने आंतरिक सर्वेक्षणों के आधार पर पूर्वांचल के सामाजिक गणित को देखते हुए अंतिम चरणों के लिए कमर कस ली गई है। यहीं कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी Modi सातवें व अंतिम चरण के मतदान से चार दिन पहले ही बनारस (Kashi) पहुँच गए है और इसे केंद्र बनाकर पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में प्रचार और जनसभा करेंगे। मोदी तीन से पांच मार्च तक काशी में रहकर रोड शो और डोर-टू-डोर कैंपेन कर बनारस के साथ-साथ पूरे पूर्वांचल में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने का काम करेंगे।
भाजपा को एक बार फिर पूर्वांचल में 2017 की तरह मोदी का सहारा
मोदी और काशी अब एक दूसरे के पर्याय बन गए है शायद इसलिए भाजपा BJP की नैया पार लगाने के लिए मोदी को चुनाव-दर-चुनाव काशी की शरण में आना पड़ता है। बता दें कि 2017 चुनाव में भी मोदी ने तीन दिन तक काशी प्रवास कर पूर्वांचल के जिलों में चुनावी जनसभाओं के जरिए भाजपा के लिए समर्थन जुटाया था और पूर्वांचल का पूरा सियासी माहौल ही बदल दिया था।
भाजपा और सपा दोनों के लिए पूर्वांचल की लड़ाई निर्णायक है। इस बार जहाँ सपा के पक्ष में जातीय समीकरण है तो वही भाजपा अपने ट्रम्प कार्ड मोदी और पूर्वांचल में हुए विकास, फ्री राशन और अन्य लाभकारी योजनाओं के सहारे लखनऊ की सत्ता में वापसी का प्रयास कर रही है।
लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि क्या पीएम मोदी 2017 की तरह इस बार भी अपने सियासी दुर्ग पूर्वांचल को बचाने में कामयाब होते है या फिर सपा गैर-यादव पिछड़ो वाली सोशल इंजीन्यरिंग social engineering के सहारे 2022 में कोई सियासी करिश्मा दिखा पाने में सफल हो पाएगी।

