पहला चरण: नफा और नुकसान के दावे

विधानसभा चुनावपहला चरण: नफा और नुकसान के दावे

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पहला चरण: नफा और नुकसान के दावे

अमित बिश्‍नोई

UP Election 2022 Phase-I – धांधलियों, ख़राब EVM, फ़र्ज़ी वोटिंग और आरोप- प्रत्यारोपों के बीच उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का पहला चरण जाट लैंड यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शांति पूर्वक संपन्न हो गया. मतदान के बाद अब हार-जीत, किसको कितनी सीटें, किसने इज़्ज़त बचाई, किसने सेंध लगाई इन सब बातों पर चुनावी पंडितों द्वारा विश्लेषण शुरू हो चूका है. सबका अपना अपना नजरिया और सोच है, उनका विश्लेषण भी उसी सोच पर आधारित है. इनमें कुछ वो हैं जो कमरे में बैठकर, टीवी देखकर, अखबार पढ़कर, वेब मीडिया की बहसों, चर्चाओं में हिस्सा लेने वाले हैं और कुछ वह लोग हैं जो फील्ड में गए हैं, लोगों से बातें की हैं, शहरों और देहातों में क्या रुझान है इसको समझा है. वहीँ मेनस्ट्रीम मीडिया जिसे आप भक्त मीडिया भी कह सकते हैं उसपर चल रही पेड चर्चाओं में शामिल चुनावी विश्लेषक भी हैं. हमने यहाँ उन सबको सुनकर और समझकर एक नतीजा निकालने की कोशिश है. लेकिन हम यहाँ पर नाम किसी का नहीं लेंगे।

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कल मतदान के बाद चुनावी चर्चाओं में जो कॉमन बात मोटा मोटी नज़र आयी वह यह कि भाजपा को नुक्सान पहुँच रहा है इसपर सभी एकमत हैं. दूसरी, लहर जैसी कोई बात नहीं है, तीसरी भाजपा के सफाये जैसी कोई बात नहीं। चौथी तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा जाट बिरादरी में फूट डालने में कामयाब नहीं हो पायी। इन 58 सीटों पर पिछली बार की तुलना में आंकड़ों के ऐतबार से मतदान थोड़ा कम हुआ है पर इतना भी नहीं कि आप कोई निश्चित निष्कर्ष आसानी से निकाल पाएं। वैसे भी 2017 में मुज़फ्फरनगर में हुए दंगों के बाद सांप्रदायिक ध्रूवीकरण अपने चरम पर था इसलिए भी मतदान अधिक हुआ था. इस हिसाब से देखा जाय तो मतदान काफी अच्छा हुआ है. सिर्फ कैराना विधानसभा को अगर छोड़ दें तो बाक़ी जगहों पर मतदान उन्नीस बीस ही रहा. कैराना में ज़रूर वोटिंग प्रतिशत 75 पहुँच गया।

दरअसल भाजपा का पश्चिमी उत्तर प्रदेश चुनावी कैम्पेन का पूरा मॉडल कैराना पर ही आधारित था. किसानों में गुस्से के बाद भाजपा ने इस चरण में सिर्फ दो ही मुद्दे ज़ोर शोर से उठाये। पहला पलायन और दूसरा सुरक्षा और यही वजह थी अमित शाह ने अपना चुनावी प्रचार कैराना से शुरू किया और पलायन से प्रभावित परिवारों से मिलकर शुरू किया, वहीँ मतदान से ठीक पहले योगी आदित्यनाथ ने सुरक्षा पर सावधान रहने और चूके तो बंगाल, कश्मीर और केरल बन जाने की अपील करके मतदान को दिशा देने की कोशिश की।

खैर विषय पर वापस आते हैं और जानते हैं कि चर्चाओं से क्या निष्कर्ष निकला। एक बड़ा निष्कर्ष तो यह सामने आये कि इस बार जाट और मुस्लिम का मज़बूत गठजोड़ दिखा और इस मज़बूत गठजोड़ का नतीजा यह निकल सकता है कि इन 58 में से 23 सीटें जहाँ यह गठजोड़ पूरी तरह से निर्णायक है भाजपा को गहरी चोट पहुंचा सकता है दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि इन सीटों पर भाजपा हारती हुई नज़र आ रही है. शेष 35 सीटों पर नतीजे इस बात पर निर्भर हैं कि भाजपा विरोधी वोटरों का बिखराव कितना हुआ है. मुकाबला कहीं त्रिकोणीय तो कहीं चतुष्कोणीय भी नज़र आया. एक और बात जो कल के मतदान में दिखी, वह यह कि वोटर अपने वोट को बिखरते हुए नहीं देखना चाह रहा था और यह बात 10 मार्च को नतीजों में दिखना चाहिए, हार जीत का अंतर काफी कम रहने वाला है।

एक और फैक्टर जिसकी कल मतदान के दौरान काफी चर्चा रही, वह थी लखीमपुर कांड के मुख्य आरोपी केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के पुत्र आशीष मिश्रा को ज़मानत मिलने की. चूंकि यह खबर बीच मतदान में आयी, तो क्या इससे किसानों का ज़ख्म फिर हरा हुआ होगा, क्या इस काण्ड को लेकर किसानों में वह गुस्सा जो इस अंतराल में ख़त्म नहीं तो कम हुआ होगा फिरसे उभर आया होगा। क्या यह गुस्सा वोट में तब्दील हुआ होगा। क्या टेनी पुत्र को ऐसे मौके पर ज़मानत मिलना भाजपा के लिए नुक्सान देह हुआ होगा, चर्चा का विषय है. मेरे विचार से थोड़ा बहुत असर तो पड़ा ही होगा। टेनी पुत्र को 14 फरवरी के बाद ज़मानत मिलती तो भाजपा के लिए ज़्यादा ठीक रहता।

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बहरहाल 623 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला तो 10 मार्च को होगा। इन 58 में से 53 सीटें भाजपा की झोली में थी. देखना होगा भाजपा की यह झोली कितनी जगह से फटी और उन फटी हुई जगहों से कितनीं सीटें बाहर निकल गयी और उन गिरी हुई सीटों को किसने उठाकर अपने झोली में डाल लिया। कहते हैं पश्चिमी यूपी का चुनाव ट्रेंड सेटर होता है, और इस ट्रेंड का अगले चरणों के मतदान में असर दिखता है, यहीं वजह है कि सभी पार्टियां हमेशा की तरह बड़ी जीत के दावे कर रही हैं वह भी जो वाकई जीत की दौड़ में नहीं हैं लेकिन असली ट्रेंड तो मतदाता ही जनता है क्योंकी ट्रेंड सेटर तो वही होता है।

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