लखनऊ। उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा में सभी प्रत्याशी अपनी जीत का दावा करते हैं। लेकिन आंकड़ों पर गौर करें तो 1989 से लेकर अब तक जितने भी चुनाव हुए हैं उसमें 80 फ़ीसदी से ज्यादा प्रत्याशियों की जमानत जब्त होती हैं। इस बार भी जिस तरह से समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी (Samajwadi Party and Bharatiya Janata Party) के बीच में प्रत्यक्ष मुकाबला चल रहा है उम्मीद है कि जमानत जब्त कर आने वाले प्रत्याशियों की संख्या में कमी नहीं आएगी।
इस बार चुनाव में 4441 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हालांकि 2017 के चुनाव से यह संख्या कम है। 2017 विधानसभा में 4853 प्रत्याशियों ने विधायक बनने के लिए पर्चा भरा था। इस बार पूरे प्रदेश में सिर्फ 4 सीटें ऐसी हैं जहां पर 15 से ज्यादा प्रत्याशी मैदान में है। बाकी 399 सीटों पर प्रत्याशियों की संख्या 15 से कम है।
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₹5000 की जमानत राशि जब्त होती है
विधानसभा चुनाव (Assembly Elections) लड़ने के लिए हर प्रत्याशी को ₹5000 की जमानत राशि जमा करनी होती है। अगर प्रत्याशी को उस सीट पर कुल पड़े वोट में छठा हिस्सा नहीं मिलता है तो यह ₹5000 जब्त हो जाते हैं। इसी को जमानत जब्त बोलते हैं। विधानसभा के आंकड़ों के हिसाब से 1993 में सबसे ज्यादा प्रत्याशियों के जमानत जब्त हुए थे। उस दौरान 88.95% प्रत्याशी अपनी जमानत नहीं बचा पाए थे।
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1993 में 9726 प्रत्याशी चुनाव लड़े थे जिसमें से 8652 प्रत्याशियों ने अपनी जमानत जब्त कर आई थी। उसके बाद 1996 में 4429 प्रत्याशी मैदान में डटे थे जिसमें से 3244 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई थी। 2002 के विधानसभा चुनाव में 5533 प्रत्याशी थे इसमें 4402 प्रत्याशी अपनी जमानत नहीं बचा पाए थे। ऐसे ही 2007 में 6086 प्रत्याशी में 5034 प्रत्याशी जमानत नहीं बचा पाए थे। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में 6839 प्रत्याशियों में से 5760 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई थी। जबकि पिछले चुनाव में यानी कि 2017 के चुनाव में 4853 प्रत्याशी मैदान में थे इनमें से 3736 प्रत्याशियों की जमानत राशि वापस नहीं मिल पाई थी।

