-फरीद वारसी
पिछले कई दिनों से खबर गश्त कर रही है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की तैयारी कर रहे हैं। राज्य का विधि आयोग इस संबंध में कानूनी प्रस्ताव तैयार कर रहा है और मध्यप्रदेश की भाजपा शासित सरकार के विधि आयोग से विचार-विमर्श कर रहा है। कहा जा रहा है कि आने वाले दो महीने में विधि आयोग अपनी रिपोर्ट योगी सरकार को सौंप देगा। संभावित कानून के बारे में कहा जा रहा है कि दो से अधिक बच्चों वाले परिवारों को सरकारी योजनाओं की सुविधाओं से वंचित रखा जा सकता है। अब सवाल उठ रहा है कि चुनावी बेला में जनसँख्या नियंत्रण कानून की बातें क्यों?
गौरतलब है कि असम में चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने का एलान किया है, उन्होंने एक वर्ग विशेष से अच्छी फैमिली प्लानिंग अपनाने की बात कहकर जता दिया है कि नया कानून लाने का उद्देश्य क्या है. जबकि ख़बरों के अनुसार उत्तर प्रदेश की योगी सरकार चुनाव के मैदान से उतरने से पहले ही जनसंख्या नियंत्रण कानून ला रही है। जिससे सांप्रदायिकता के आधार पर लिपटे उनके राजनीतिक मंसूबो को आसानी से समझा जा सकता है। जबकि केंद्र सरकार पहले ही इस संबंध में सुप्रीमकोर्ट में यह हलफनामा दे चुकी है कि किसी भी शादी-शुदा जोड़े को परिवार नियोजन के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। इधर योगी सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण कानून लाए जाने की बात का कुछ साधू-संतों ने भी समर्थन किया है, फिर गोदी मीडिया की ब्रेकिंग न्यूज का यह तीखा अंदाज कि यूपी के ‘‘आबादी बम’’ को योगी आदित्यनाथ ही करेंगे डिफ्यूज, जो योगी सरकार के इरादों को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है।
विदित हो कि संघ परिवार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण कानून लाए जाने का जोर शुरू से ही रहा है और योजनाबद्ध तरीके से इस बात का दुष्प्रचार किया जाता रहा है कि देश में बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए एक वर्ग विशेष जिम्मेदार है और उसे ही सारी सरकारी सुविधाएं मिल रही हैं। जबकि 2011 में हुई जनगणना के अनुसार यह बात सामने निकल कर आई कि बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जिस वर्ग को बदनाम और जिम्मेदार ठहराने की कोशिश हो रही है, दरअसल, वहां जनसंख्या नियंत्रण के लिए जागरूता बढ़ी है। अब तो जानकार भी यह मानते हैं कि लगभग हर धर्म और समुदाय के लोगों ने अपनी प्रजनन दर को नियंत्रित किया है। पहले ‘‘हम दो और हमारे दो’ का नारा था। किन्तु अब बदलते हालातों में जैसे बढ़ती महंगाई, महंगी होती शिक्षा एवं चिकित्सा व्यवस्था, कैरियर के प्रति बढ़ती प्रतिस्पर्धा और एकल परिवार की व्यवस्था जैसे कारणों के चलते लोगबाग स्वेच्छा से अपने परिवार को सीमित रखने को बाध्य हुए हैं। ‘‘हम दो हमारे एक’’ को बढ़ावा दे रहे हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि उपरोक्त कारणों व जागरूकता के कारण जनसंख्या नियंत्रण काफी हद तक कंट्रोल हुआ है,
वहीं दूसरी ओर, संभावित जनसंख्या नियंत्रण कानून के तहत दो से अधिक बच्चों वाले परिवारों को सरकारी सुविधाओं से वंचित रखने की जो बात कही जा रही है। तो सवाल यह है कि सरकारी सुविधाएं लेता कौन है। कुछ हद तक मध्यम वर्ग और काफी हद तक बीपीएल कार्डधारक, जो गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करता है, यह वर्ग शोषित, कमजोर व वंचित है। इसमें किसी एक धर्म के लोग शामिल नहीं है, बल्कि सभी धर्म, जाति व संप्रदाय के लोग शामिल हैं। कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि गरीबी ही इनका धर्म व दयनीय दुर्दशा ही इनकी पहचान है। सबसे बड़ी बात यह है कि यही वर्ग मतदान में अन्य वर्गो की तुलना में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है और चुनावों में इसी वर्ग को लुभाने के लिए तमाम राजनीतिक दल अपने-अपने घोषणापत्रों या संकल्पपत्रों में लोक लुभावनी घोषणाएं करते हैं। सत्ता में आने के बाद कुछ घोषणाओं को लागू भी करते हैं। पिछली अखिलेश सरकार ने ऐसे ही वर्ग के लोगों की मदद के लिए सबसे बड़ी पेंशन योजना यानी समाजवादी पेंशन योजना की शुरूआत की थी। जिसकी प्रशंसा तब सुप्रीम कोर्ट तक ने की थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद योगी सरकार ने समाजवादी पेंशन योजना को बंद कर इस वंचित वर्ग को काफी निराश किया था। कहने का मतलब यह है कि अगर जनसंख्या नियंत्रण कानून इस गरीब वर्ग पर थोपा गया और उनकी सरकारी सुविधाओं पर कैंची चली तो इसका चुनावों में भाजपा को काफी नुकसान हो, इस सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। वैसे भी लगातार दो साल के लाॅकडाउन के चलते यही कमजोर वर्ग ही सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। अतः ‘‘कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना’’ की तर्ज पर जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की हवा चल रही है, वह कहीं योगी सरकार के लिए गले की हड्डी न बन जाए। वहीं जनसंख्या नियंत्रण कानून को देशहित के लिए बताया जा रहा है। अगर यही बात है तो सत्ता में साढे चार साल तक रहने के बाद देशहित का ख्याल क्यों नहीं आया? अब चुनाव के करीब ही देशहित का प्रेम क्यों हिलौरे मार रहा है?
अगर जनसंख्या नियंत्रण करने की बात है तो समाजशास्त्रियों का मानना है कि समाज में कुछ ऐसी बुराईयां हैं, जिन्हें कानून के डंडे से नहीं, बल्कि जागरूता अभियान चला कर समाप्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए दुनिया के तमाम ऐसे देश हैं जहां जागरूता अभियान चला कर जनसंख्या को नियंत्रण किया गया। तो सवाल यह है कि योगी सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती है? राजनीति के जानकारों का मानना है कि विधान चुनाव से पूर्व जनसंख्या नियंत्रण कानून को ला कर जहां चुनाव को सांप्रदायिक राजनीति की ओर मोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। अभी तो चुनावी बिगुल नहीं बजा है। चुनाव करीब आते-आते अभी न जाने और कितने और चुनावी स्टंट देखने को मिलेंगे ।

