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पत्रकारिता को कलंकित करने वाली टीवी डिबेट्स का बायकाट ज़रूरी


पत्रकारिता को कलंकित करने वाली टीवी  डिबेट्स का बायकाट ज़रूरी

उबैदउल्लाह नासिर


आज तक चेनल पर एक अत्यंत कटु,असंवेदशील, सांप्रदायिक और चीख पुकार वाली  डिबेट के दौरान कांग्रेस के प्रखर राष्ट्रिय प्रवक्ता राजीव त्यागी की ह्रदय गति रुक जाने से मौत जितनी दुखदायी और शर्मनाक है उतना ही अब यह सोचने और कोई निर्णय लेने का वक़्त भी है कि क्या इस प्रकार की डिबेट से टीवी देकहने वालों के ज्ञान में कोई वृद्ध होती है उन्हें कुछ नए ज्ञान प्राप्त होते हैं तस्वीर के हर रुख को देखने का मौक़ा मिलता है जैसा की इन बहसों से शुरू शुरू में उम्मीद की गयी थी या केवल एक शोर एक तूफ़ान बदतमीजी गाली गलौज चरित्र हनन साम्प्रदायिक वैमनस्य बढाने और एक एजेंडे के तहत एक विशेष विचारधारा को अवाम के गले नीचे उतार कर भारत को गाँधी नेहरु पटेल आजाद और उन जैसे लाखों करोड़ों स्वंत्रता सेनानियों के सपने का भारत नहीं बल्कि उन लोगों के सपने का भारत बनाना है जिनका स्वंत्रता अन्दोलना से कोई लेना देना नहीं था वह वास्तव में स्वतंत्रता अन्दोलनके विरोधी ही नहीं थे  बल्कि  स्वतंत्रता आन्दोलन के उन तमाम आदर्शों उसूलों  और मान्यताओं के साथ उस सपने के भी विरोधी थे जो भारत की आज़ादी के बाद भारत के लिए इन सेनानियों ने देखे थे I वह सपना था भारत को एक ऐसा देश बनाना जहाँ धर्म जाति भाषा क्षेत्र के नाम पर किसी से कोई भेद भाव न हो जहाँ सबको समान अवसर प्राप्त हों भारत की विवधता को भी संजोया जाए और विविधता में ही एकता का धागा मज़बूत किया जाए इसके वैकल्पिक जो विचारधारा थी अर्थात आरएसएस की विचारधारा वह भारत पर एक धर्म विशेष (हिन्दू )  एक जाति विशेष (चित पावन ब्रह्मण )एक भाषा विशेष (हिंदी ) और यहाँ तक एक क्षेत्र विशेष (हिंदी या गाय पट्टी ) की supermacy चाहती थी I तमाम अंतरविरोधों और कठिनाइयों के बावजूद गाँधी पटेल आज़ाद की विचारधारा पर देश लगभग 60 साल तक मजबूती से चलता रहा गलतियाँ भी हुईं पथभ्रष्ट भी हुए डगमगाए भी लेकिन फिर भी संभल गए और इस विचारधारा से जो idea of india बना था उसे गले से लगाये रहे I लेकिन दूसरी विचारधारा ने हार नहीं मानी थी जनता द्वारा बार बार रिजेक्ट किये जाने के बावजूद वह अपनी विचारधारा को लागू करने और अपने सपनो का भारत बनाने कि जद्दोजह्द जारी रखी  अपना मकसद  हासिल करने के लिए हर तरह के समझौते किये  कभी कभी लगा की अपनी विचारधारा से भी समझौता कर रहे हैं लेकिन अर्जुन की तीर की तरह  कभी अपने निशाने से नज़र नहीं हटाई उनकी मेहनत लगन लक्ष्य के प्रति समर्पण और गिर कर उठने की क्षमता की तारीफ न करना बेइमानी होगा, इस लक्ष्य की प्राप्त के लिए उन्होंने साम दाम दंड भेद सभी हथकंडों को अपनाया उन्होंने End justify means के फार्मूला पर पूरी ईमानदारी से अमल किया उचित अनुचित के चक्कर में कभी नहीं पड़े I जबकि गांधियाई विचारधारा में लक्ष्य प्राप्त के साधन भी उचित होना पहली शर्त बताया गया है I

आज भारत इन्हीं दोनों विचारधाराओं के टकराव का मैदान बना हुआ है कुछ अपनी गलती कुछ  दूसरों की साज़िश से कांग्रेस धीरे धीरे कमज़ोर होती गयी क्षेत्रीय पार्टियों ने सर उठाया अधिकतर क्षत्रिय पार्टियां कांग्रेस के वोट बैंक को तोड़ कर ही बुलंदी पर पहुंची थीं उन्हें idea of India से उतना सरोकार नहीं था जितना कांग्रेस को था इन पार्टियों ने समय समय पर आरएसएस की सियासी विंग बीजेपी से समझौता भी किया और सत्ता में उसे भागीधारी दी इस तरह इन समझौतों के द्वारा बीजेपी ने अपनी मान्यता भारतीय जनमानस में मनवा ली और धीरे धीरे अमरबेल की तरह मज़बूत हो के उसी पेड़ को खा गयी जिनके सहारे वह उंचाई पर पहुंची थी I

२०१४ अर्थात भारत के सियासी फलक पर मोदी जी का  अवतरण भारत की सियासी और समाजी इतिहास का एक टर्निंग पॉइंट है वैसे तो 2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बन्ने के बाद ही मोदी जी ने भारत की सियासी जिंदगी में अपना मुकाम बना लिया था गुजरात का दंगा कुछ भीं रहा हो लेकिन उस ने मोदी जी को ज़मीन से उठा के आसमान पर पहुंचा दिया लेकिन २०१३ से एक सोचे समझे प्लान के तहत भारतीय सिस्टम के हर अंग में मोजूद संघी कार्यकर्ताओं ने एक जुट हो कर अभी नहीं तो कभी नहीं की भावना से काम शुरू किया अन्ना हजारे को मोहरा बना गया देश में लोकपाल को ले कर अन्ना हजारे ने ऐसा अन्दोलन खडा किया जो शायद अडवानी जी के राम मंदिर मूवमेंट से भी ज्यादा प्रभाव शाली था हालंकि इसे घर घर पहुंचाने में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का बड़ा हाथ था इस मूवमेंट भारत के अवाम की सोच को बिलकुल बदल के रख दिया I कांग्रेस सभी बुराइयों की जन्ननी बना दी गयी और मुसलमान सभी समस्याओं की जड़ बन गए दोनों के खिलाफ देश में एक माहौल बन गया I घर घर TV और उसके साथ उसका ज़हरीला प्रोपगंडा  पहुँच चूका था और यह सिलसिला आज भी जारी है Iइन चेनलों ने जैसे देश के संवैधानिक लोकतंत्र और धर्मनिर्पेक्ष स्वरुप को समाप्त करने की सुपारी ले रखी है I विगत सात वर्षों से इस्लाम और मुसलमानों के दान्विकरण का सिलसिला जारी है यह सब एक एजेंडे का हिस्सा है जो सरकार के इशारे पर चलाया जा रहा है I टीवी की इन बहसों में संघी विचारधारा के लोगों को तरह तरह के अंदाज़ में बिठाया जाता है कभी राजनैतिक विश्लेस्झा बता दिया जाता कभी डिफेन्स एक्सपर्ट कभी प्रोफेसर कभी कुछ कभी कुछ I वरिष्ट पत्रकार राजीव मित्तल ने बड़ी पते की बात कही की इन debates में कांग्रेस के प्रवक्ता को अभिमन्यू बना के बिठा दिया जाता है जिसपर चारों ओर से हमला होता है और अंत में खुद anchor जयद्रथ बन कर उस पर आखिरी हमला कर देता है Iउस दिन की बहस में ठीक यही हो रहा था बीजेपी का सब से बदतमीज़ बेहूदा और गरिहर प्रवक्ता संबित पात्रा राजीव त्यागी पर व्यक्तिगत हमले कर रहा था उन्हें जयचंद बता रहा था उनके तिलक को झूटा बता  रहा था जबकि anchor रोहित सरदाना अपनी आदत के मुताबिक घोर  साम्प्रदायिक अंदाज़ में उन से सवाल कर रहा था वह इन निजी हमलों से व्यथीत हो उठे उनकी तबियत  बिगड़ने लगी वह बार बार सीने पर हाथ रख रहे थे और अंततः वह हो गया जो सपने भी नहीं सोचा जा सकता मीडिया ट्रायल के हाथों कांग्रेस का एक  जुझारू कर्मठ अत्यंत knowlegeable और हंसमुख मिलनसार ब्योहारकुशल और प्र्खर प्रवक्ता बे मौत मर गया I

अब समय आ गया है की टीवी डिबेट्स की घोर साम्प्रदायिक बे मकसद ,चरित्र्हनन करने वाली समाज में ज़हर घोलने वाली और अवाम का ध्यान महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों से हटा कर साम्प्रदायिकता चरित्र हनन और भावनात्मक मुद्दों पर महदूद कर देने वाली इन debates को regularise और कण्ट्रोल किया जाए मगर कौन करेंगा सरकार के एजेंडे पर काम हो रहा है इसलिए संविधान प्रदत्त IPC की धरा 19 A और 153 आदि के  तहत पुलिस कार्रवाई कर सकती है मगर सरकार क्यों करने लगी  ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन है लेकिन वह बे रीढ़ की बे दांत की भी है और उस पर बी यही सब हावी हैं SC में जमीअतुल उलेमा की अपील विचाराधीन है लेकिन SC का जो रवय्या इस मोदी युग में है उसमें भी उम्मीद की कोई किरण नहीं दिखाई देती है I बहुत से लोगों ने TV पर इन डिबेट्स को देखना बंद कर दिया है यह एक प्रभावी क़दम हो सकता है अधिक से अधिक लोगों को ब्लड प्रेशर बढाने वाली इन डिबेट्स को देखना बंद कर देना चाहिए इसके बजे बहुत से वरिष्ट पत्रकारों ने जो मोदी जी की महिमा से बेरोजगार हो चुके हैं उन्होंने अपना you Tube चेनल शुरू किया है बहुत से digital माध्यम भी उन सब को subscribe कर के उनकी हौसला अफजाई की जानी चाहिए  alternate media ही गोदी मीडिया का विकल्प है I

इसके साथ ही कांग्रेस समेत सभी गैर भाजपाई दलों को इन debates का वहिष्कार करना चाहिए guests को भी  इस में शिरकत से इंकार कर देना चाहिए (यह लेखक खुद जब भी किसी साम्प्रदायिक मुद्दे पर डिबेट में बुलाया जाता है शिरकत से साफ़ मन कर देता है )Iराजीव त्यागी को श्रद्धांजलि देते हुए इन बेलगाम घोर साम्प्रदायिक राष्ट्र विरोधी पत्रकारिता को कलंकित करने वाली debates के खिलाफ जनचेतना जागृत करना बहुत ज़रुरी है I 

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