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फोन घुमाओ, सारी समस्याओं का समाधान पाओ


फोन घुमाओ, सारी समस्याओं का समाधान पाओ

सुनील शर्मा

लो जी लो कर लो बात, अब साहेब की मन की बात भी किसानों के समझ ना आ रही तो बताओ इसमें भी क्या उनकी गलती है। उन्होंने तो भईया इत्ती बड़ी बात कह दी की फोन पर इंतजार कर रहा हूं। एक फोन घुमाओ, सारी समस्याओं का समाधान पाओ। वो बात दूसरी है कि ये ना बताया साहेब ने कि कौन से नंबर पर फोन करना है और किसको फोन करना है। अब भईया किसान ठहरे भोले-भाले आदमी, कर रहे हैं इंतजार के साहेब के मन में आयेगी तो अगली बार फोन नंबर भी बता ही देंगे। वरना फोन तो कई महीनों से घुमा रहे थे मगर किसी ने सुनी ही नहीं। सुन लेते तो यहां आने की जरूरत पड़ती ही क्यों। तब हल्के में ले रहे थे अब कह रहे हैं भारी पड़ रहे हैं। अब किसान बेचारे नादान लोग हैं वो क्या समझें बड़ी-बड़ी बातें, वो तो बस एक ही जिद पर अड़े हैं, या तो समझा दो या समझ लो।

अब साहेब के मन की बात साहेब ही समझ सकते हैं न। अब देखो ने साहेब को किसानों की कित्ती चिंता है। वो न चाहते की शांति से धरना दे रहे किसानों को कोई परेशान करे। अब साहेब तो हर काम डिफरेंट स्टाईल में करते हैं सो उन्होंने रास्ते में कीलें गढ़वा दीं, बैरिकेट लगवा दिये और खड़े कर दिये जवान। अब आके दिखाओ कोई किसान भाईयों की शांति भंग करने को, टांगे न तोड़ दी तो कहना। और साहेब की पुलिस तो गजब ही है, किसानों की सुरक्षा के लिये स्टील के डंडे-कवच मंगवा लिये। कसम से, स्टील का कवच पहने और स्टील राॅड हाथ में लेकर खड़े पुलिसवाले तो बिल्कुल पुरानी फिल्मों के योद्धा से लग रहे थे। खैर जो भी हो लेकिन किसान भाईयों के पास परिंदा भी पर नहीं मार पायेगा यह बिल्कुल तय है। ये किसानों का धरना स्थल है कोई लाल किला नहीं कि जिसके मन में आया घुमने चल दिया। दिल्ली में कहीं भी घुस जाना, लालकिले तक पहुंच जाना आसान हो सकता है मगर साहेब के प्यारे किसान भाईयोें तक पहुंचना बेहद मुश्किल है।

अब साहेब ने इतना कुछ किया किसके लिये, अपने किसान भाईयों के लिये ही न। अब लोग हैं कि हर बात में विरोेध करने की आदत हो गयी है। कह रहे हैं किसानों को परेशान किया जा रहा है। जबकि साहेब तो चाहते हैं कि किसान यहीं बैठे रहें और उनको जबरन आने वाले परेशान न करें। और तो और सर्द हवाएं किसान भाईयों को परेशान न करें इसलिये चारों और सुरक्षाकर्मियों को गोल घेरा भी बनवा दिया है साहेब ने। सर्दी में भी किसान भाईयों का खून गर्म रहे और अपने सामान का ध्यान भी रहे इसलिये बार-बार हूटर भी बजवा देते है। वो हैं न जैसे गली मेें चैकीदार आता है रात को और कहता जाता है, जागते रहो-जागते रहो। लेकिन एक बात है भईया जी अगर रात को भी खुद ही जागना है तो ये चैकीदार रखा ही क्यों है। खुद ही जाग कर अपने सामान की रखवाली न कर लेते। खैर ये तो बातों की बातें हैं चलती रहेगी, मगर साहेब की नीयत पर शक करना तो बिल्कुल गलत है।

अब देखों न साहेब ने तो बढ़ती ठंड को देखते हुए घरने की जगह पर पानी का कनेक्शन भी कटवा दिया था। मन में था कि पानी होगा तो किसान नहाएंगे भी और बहाएंगे भी। कहीं किसान भाईयों को ठंड लग गयी तो बेचारे घर से इतना दूर आकर बीमार पड़ जायेंगे। और इतनी ठंड में पानी पीयेगा कौन इसलिये किसान भाईयो के स्वास्थ की चिंता करते हुए कटवा दिया पानी का कनेक्शन। अब न होगा पानी न लगेगी किसान भाईयो को ठंड। अब स्टाईट भले ही डिफरेंट थी मगर मन में तो प्यार का सागर हिलोरें ले रहा था, अब लोग न समझे बात तो बतायें की साहेब करें तो क्या करें।

अब लोगों को तो इस बात पर भी ऐतराज था कि धरने की जगह की बिजली कटवा दी। अरे वो तो रात-रात भर एलईडी-डीजे पर गाने चलते थे तो किसान भाई सो नहीं पाते थे। वहीं लाइटों से जगमग करते धरना स्थल पर आती नींद भी भाग जाती थी। अब गांवों में रहकर अंधेरे में सोने की आदत जो थी। अब साहेब तो सबके मन की बात बिना कहे समझ जाते हैं सो कटवा दी लाइट। अब सर्द रातों में घुप्प अंधेरे में सोने से बिल्कुल गांव-खेत में सोने की फील आती किसान भाईयों को। घर से दूर रहकर भी घर में ही रहने का अहसास होता तो दुआएं देते किसान। मगर चंद लोग ऐसे हैं जो समझ ही न पा रहे साहेब के मन की बात, अरे वो तो सब काम किसान भाईयों के भले के लिये ही करते हैं।

अब देखो न, दिन-रात मेहनत कर कानून तैयार किये। बेचारे खुद ही अपनी टीम के साथ लगे रहे। किसान भाईयों को जरा सी भी तकलीफ न होने दी कानून तैयार करने की। खुद ही सारी मेेहनत की और लागू भी खुद ही करवा दिये। अब साहेब तो चाहते थे कि किसान भाई सिर्फ खेती-बाड़ी पर ध्यान दें बाकी तो वह देख ही लेंगे। मगर लोग कह रहे हैं कि हमे क्यों नहीं बुलाया, हमें क्यों नहीं समझाया कानून। अब बुलाते तो कितनी परेशानी होती, कितना दिमाग लगाना पड़ता किसान भाईयों को और काम-काज छोड़ने पड़ते सो अलग, इसलिये नहीं बुलाया और इसीलिये नहीं समझाया।

तो मेरे किसान भाईयों, जहां इतना सबर किया है, थोड़ा और करो। अगली बार फोन नंबर देंगे तो कर के देख लेना फोन। क्या पता फोन घुमाते ही समस्याएं हल हो जायें। वरना आजादी के बाद से अपनी मांगों नहीं, अपने अधिकार के लिये सड़कों पर धरना-प्रदर्शन करना तो देश के किसानों के मानो भाग्य में लिखा है। सरकारें आती हैं-सरकारें जाती हैं, अपने मन की बात कहती हैं, मगर किसान के मन की बात कोई नहीं सुनता। जो नेता आंदोलन में उसके साथ खड़े होते हैं वहीं सरकार में आ जाने के बाद उनपर डंडे बरसवाते हैं। कोई अन्नदाता कहता है तो कोई धरती का भगवान बताता है, मगर कोई किसान के साथ न्याय नहीं करता, उनके अधिकार नहीं देता। खेत में हल चलाने के बाद अपने अधिकार मांगने के लिये सड़क पर बैठने वाला किसान आज भी अच्छे दिन आने का इंतजार कर रहा है।

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