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अबकी बार 400 पार, भारत में न सही, ब्रिटेन में ही सही

sunak

अमित बिश्नोई
पिछले तीन महीनों के दौरान एक बात जिसे सुन सुनकर कान पक गए थे, वो था “अबकी बार चार सौ पार”. भारत के लोकसभा चुनाव की शुरुआत इसी नारे के साथ हुई थी. ये नारा जब निकला था तब शायद किसी को भी यकीन था कि ऐसा भी हो सकता है, यहाँ तक कि उनकी पार्टी के लोगों को भी यकीन नहीं था कि ऐसा कुछ होने वाला है जहाँ से ये नारा निकला था और हुआ भी कुछ वैसा ही, नतीजे जब सामने आये तो चार सौ पार तो क्या तीन सौ भी पार नहीं हुआ. खैर जिसने भी ये नारा दिया उसकी तो बड़ी जग हंसाई हुई, ये अलग बात है कि सरकार उसी ने बनाई जिसने ये नारा दिया था. खैर चुनाव ख़त्म हो गए, सरकार भी बन गयी, संसद का पहला सत्र भी गर्मागर्मी के साथ ख़त्म हो गया, सत्र के दौरान “अबकी बार चार सौ पार” के नारे को विपक्ष ने कई बार कटाक्ष के तीर के रूप में सत्ता पक्ष की तरफ उछाला, सत्र ख़त्म हो गया तो बात आयी गयी हो गयी, सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने अपने काम में लग गए लेकिन आज जब ब्रिटेन के चुनाव नतीजे आये तो एकबार फिर अबकी बार चार सौ पार के नारे की चर्चा होने लगी क्योंकि चुनाव में ब्रिटेन की लेबर पार्टी को चार सौ से ज़्यादा सीटें हासिल हुई और 14 साल बाद ब्रिटेन से कंज़र्वेटिव पार्टी की बादशाहत ख़त्म हुई. भारतवंशी प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की इतनी बुरी तरह हार हुई जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। ब्रिटेन के नतीजों से सोशल मीडिया पर खूब मीम्स भी वायरल होने लगे. लोग कहने लगे कि भारत न सही ब्रिटेन ही सही, कहीं तो ये नारा साकार हुआ.

बता दें कि ब्रिटेन के चुनाव में सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 326 होता है और कीर स्टार्मर के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी को 400 से ज़्यादा सीटें हासिल हुई हैं , इसका मतलब है कि ब्रिटेन में 14 सालों से चले आ रहे कंज़र्वेटिव शासन का अंत हो चूका है और कीर के तीर से ऋषि सुनक धराशायी हो चुके हैं. सुनक ने अपनी पराजय स्वीकार कर ली है और देश के साथ अपने परिवार से माफ़ी भी मांगी है, उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा भी दे दिया है.

दरअसल ब्रिटेन में पिछले दस वर्षों से ज़्यादा समय से जो राजनीतिक माहौल था वो लगभग वैसा ही था जैसा मोदी जी के शासन में चल रहा है. अगर इन चुनावों में ऋषि सुनक के कैम्पेन को देखा जाय तो बेहद नकारात्मक था, लोगों में डर पैदा करने वाला था. जिस तरह मोदी जी अपने चुनावी अभियान में लोगों को डरा रहे थे कि अगर कांग्रेस पार्टी सत्ता में आ गयी तो आपकी संपत्ति हड़प लेगी, आपके गहने छीन लेगी, यहाँ तक कि महिलाओं के मंगल सूत्र छीन लेगी। गुजरात में तो बात भैंस खोल ले जाने की भी हुई। इसके अलावा मीट मटन मुर्गा मछली मुजरा, न जाने क्या क्या डराने वाली बातें वोटरों से कही गयीं। ठीक इसी तर्ज़ पर ऋषि सुनक का भी चुनावी अभियान चल रहा था , वो साफ़ तौर पर कह रहे थे कि लेबर पार्टी वाले अगर सत्ता में आ गए तो पूरा देश अँधेरे में डूब जायेगा, लोगों को बिजली नहीं मिलेगी, मंहगाई बढ़ जाएगी, लोग छुट्टियां नहीं मना पाएंगे क्योंकि उनके पास पैसे नहीं होंगे, अपनी कार से ऑफिस भी नहीं जा सकेंगे क्योंकि पेट्रोल बहुत मंहगा हो जायेगा, स्कूलों में पढाई ऑनलाइन शुरू हो जाएगी, इसलिए कंज़र्वेटिव को वोट कीजिये लेकिन जिस तरह भारत में डराने वाला नैरेटिव काम नहीं किया वैसे ही ब्रिटेन की जनता ने ऋषि सुनक के नैरेटिव को भी ठुकरा दिया। फर्क बस इतना रहा कि मोदी जी ने सरकार बना ली और उनके दोस्त ऋषि सुनक को जोड़तोड़ वाला मैनडेट भी नहीं मिल सका. हालाँकि ऋषि सुनक अपनी सीट जीत गए हैं.

देखा जाय तो भारत और ब्रिटेन के चुनाव में बड़ी समानता है, जिस तरह भारत में पिछले दस वर्षों के मोदी काल में कांग्रेस पार्टी की हालत बेहद खराब हो चुकी थी और उसके लिए ये चुनाव जीवन मरण का प्रश्न बन चूका था, कुछ वैसी ही हालत ब्रिटेन में लेबर पार्टी की हो चुकी थी, पिछले 14 वर्षों से वो सत्ता से दूर थी. ऋषि सुनक से पहले तक कंज़र्वेटिव शासन सवालों के घेरे में आ चूका था, यूरोपियन यूनियन से बाहर आने का फैसला कंज़र्वेटिव पार्टी के लिए बड़ा घातक साबित हुआ, इस फैसले के बाद पावर टैरिफ में अचानक उछाल आ गया, पहले यूरोपियन यूनियन का एक सदस्य होने के नाते उसे बिजली सस्ते दामों पर मिल जाती थी लेकिन EU से हटने के बाद उसे मंहगी बिजली खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा और इसका असर ब्रिटेन की इकोनॉमी पर पड़ा और मंहगाई ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए, इलाज न सिर्फ मंहगा हो गया बल्कि किसी गंभीर इलाज या गंभीर सर्जरी के लिए वोटिंग लिस्ट लम्बी होती चली गयी. लोगों को लम्बा इंतज़ार करना पड़ा, यही वजह है कि सुनक के प्रति ब्रिटेन के लोगों में गुस्सा भरता चला गया जो चुनाव नतीजों में सामने आया. दरअसल कंज़र्वेटिव सरकार को सबक सिखाने का काम वहां की जनता ने किया। कह सकते हैं कि जिस तरह भारत में विपक्षी पार्टियों से ज़्यादा जनता ने सत्ता पक्ष के खिलाफ चुनाव लड़ा, ठीक यही बात ब्रिटेन के चुनाव में और उसके बाद नतीजों में देखने को मिली और 400 पार का भारतीय नारा ब्रिटेन में साकार हो गया.

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