लखनऊ। चुनावी सरगर्मी के बीच व्यापारी भी अब मुखर हो गए हैं। पिछले 15 सालों से लगातार तीन अलग-अलग सरकारों को देखने के बाद कई व्यापारी इस कदर नाराज हैं कि वो नोटा का विकल्प चुनने की बात करने लगे हैं। नोटबंदी की मार और जीएसटी की मुश्किलों से व्यापारी उबरे नहीं थे कि कोरोना के कहर ने उनको बुरी तरह तोड़ दिया है। इन सारी समस्याओं के बीच व्यापारियों ने सरकार से राहत की मांग की लेकिन उनका दावा है कि सब कागजी घोषणा ही बनकर रह गईं, वास्तव में उन्हें सिर्फ और सिर्फ कोरा आश्वासन मिला है। व्यापारियों की मांग है कि उनकी समस्याओं का निराकरण नहीं किया गया तो इससे न सिर्फ व्यापार प्रभावित होगा बल्कि सरकार को मिलने वाले राजस्व पर भी असर पड़ेगा। रोजगार और आर्थिक बजट के लिहाज से व्यापारियों की उपयोगिता को इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन सरकारी तंत्र की मार झेल रहे इन व्यवसायियों में खासी नाराजगी है। उनकी मांग है कि उन्हें किसी प्रकार का अनुचित लाभ ना दें बस एक आदर्श व्यापार की मूलभूत सुविधाएं मुहैया करा दी जाएं।
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व्यापारी सोहेल हैदर अल्वी कहते हैं कि जीएसटी को लागू किये गए कई साल हो गए, सैकड़ों संशोधन कर लिए गए लेकिन आज तक यह किसी को समझ नहीं आया है। वह तंज कसते हुए कहते हैं कि उदाहरण के तौर पर जैसे आज तक बीबी को कोई समझ नहीं पाया है, वैसा ही हाल जीएसटी का हो गया है। मैनेजर से लेकर सीए तक इसकी तकनीकी चीजों को समझ नहीं पा रहे हैं। अब ऐसे में आप बताइए कि हम व्यापार करें या दिन भर बैठकर जीएसटी की उलझनों में उलझ रहें। सोहेल हैदर अल्वी कहते हैं कि इसके अलावा कई ऐसी दिक्कतें हैं जिसको लेकर हम व्यापारी कई बार सरकार तक अपनी मांगों को पहुंचा चुके हैं। लेकिन, कोई सुनने वाला नहीं।
व्यवसायी गुंजन तोलानी पुलिसिया तंत्र से खासे नाराज नजर आये। लखनऊ में कमिश्नरेट सिस्टम लागू होने के बाद बदली व्यवस्था के सवाल पर कहते हैं कि कागजी बदलाव से कुछ नहीं होगा, तंत्र तो वही हैं। पुलिस अब और उत्पीड़न करने लगी है। थानों में सुनवाई नहीं होती है। इसके अलावा गुंजन तोलानी कहते हैं कि बाजार में पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। वो कहते हैं कि मैं मिष्ठान का कारोबार करता हूं। उदाहरण के तौर पर कोई ग्राहक अगर आता है तो बमुश्किल 10 मिनट ही रूकता है, इतने ही टाइम में उसकी गाड़ी उठा ली जाती है। अब आप बताइए कि वो कहां गाड़ी खड़ी करे? जब पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं है तो ग्राहक कहां जाएगा? गाड़ी उठने के बाद क्या वो हमारी दुकान पर आएगा। इसके अलावा पुलिस आकर दूसरे तरह से परेशान करती है। अमित शाह के रात दो बजे गहने पहनकर निकलने में डर नहीं लगने वाले बयान पर नीतिन अग्रवाल कहते हैं कि सोना तो बचा नहीं बचा है, लोग पहनेंगे क्या? हम तो दिन भर की मेहनत के बाद जो कमा पाते हैं, वही लेकर जाते हैं। उसको ही सुरक्षित रखना चुनौती है। इसके अलावा नीतिन अग्रवाल पुलिसिया उत्पीड़न, जीएसटी, नोटबंदी, कोरोना आदि की परेशानियों पर नाराज दिखे।
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नरेश अग्रवाल भी सरकारों से बेहद नाराज दिखाई दिए। वो कहते हैं कि हम सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं। इनकम देते हैं, टैक्स भरते हैं, उसके बदले में हमें क्या मिलता है? जाम, अव्यवस्था, जीएसटी की मुश्किलें, बिजली की महंगी दरें, पुलिस की बदतमीजियां आदि ना जाने क्या-क्या। ऐसे में हम क्या करें। हर सरकार के साथ ऐसा ही है, बस फर्क इतना है कि कहीं उन्नीस है तो कहीं बीस। चिराग जकोटिया कहते हैं कि जब-जब सरकार को जरूरत पड़ती है, हम साथ खड़े होते हैं। कोई आपदा आए तो व्यापारी क्या-क्या नहीं करते। लंगर लगवाने से लेकर सुविधाएं मुहैया कराने तक, लेकिन हम जब परेशानी में आते हैं तो कोई ध्यान नहीं देता। कोरोना का संकट किसने नहीं देखा? सबसे ज्यादा मार हम पर पड़ी लेकिन सरकार की ओर से कोई छूट नहीं। चाहे वो टैक्स भरने की बात हो, बिजली का बिल देना हो, हाउस टैक्स देना हो हर जगह सब एक ही हाल है। कोई सुनवाई नहीं।

