मुझको मेरे बाद ज़माना ढूंढेगा

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अमित बिश्नोई
डॉ. मनमोहन सिंह आज हम सबके बीच नहीं हैं. दुनिया से एकदिन सबको जाना होता है, देश के दो बार प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह भी हम सबको छोड़कर चले गए, कोई हैरानी नहीं हुई, उम्र भी 92 बरस की हो चुकी थी लेकिन आज उनका जाना उन लोगों को भी अच्छा नहीं लग रहा होगा जो उन्हें जीवित रहते लगातार उन्हें निशाना बनाते रहे हैं. ये जानते हुए भी कि ये बंदा भारतीय राजनीति से अलग हटकर है, एक साफ़ सुथरी और बेदाग़ छवि रखने वाला, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था को एक दिशा दी. जिसकी बनाई गयी राह पर चलकर आज देश दुनिया की एक बड़ी आर्थिक शक्ति बन चूका है, जिसके बनाये हुए पथ और खोली गयी राह पर चलकर ही विकास की बड़ी बड़ी बातें आज हो रही हैं. जिसको दुनिया एक प्रधानमंत्री से ज़्यादा एक अर्थशास्त्री मानती है, जिसकी असली पहचान भी वही है. जो मन मस्तिष्क से भी वही था, प्रधानमंत्री बनना तो उनके लिए एक एक्सीडेंट था या फिर कह सकते हैं कि शायद उनकी कुंडली में राजयोग था इसलिए वो देश के प्रधानमंत्री बने, एक बार नहीं दो बार. लेकिन उनकी असली पहचान एक रिफॉर्मिस्ट की थी, एक इकोनॉमिस्ट की थी.

उनके आलोचक अक्सर उन्हें “चुप प्रधानमंत्री” के रूप में लेबल करते थे. 2004 से 2014 तक यूपीए सरकार के अपने एक दशक के कार्यकाल के दौरान उनके व्यवहार पर कटाक्ष करते थे। क्या क्या नहीं कहा करते थे, रिमोट पीएम, दस जनपथ से चलने वाला पीएम, रेनकोट पहनकर नहाने वाला इंसान। और ये सब हमले कोई और नहीं बल्कि आज सत्ता में बैठा शीर्ष नेतृत्व करता था, आज वही लोग मान रहे हैं कि जब वो प्रधानमंत्री थे तो उन्होंने लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए व्यापक प्रयास किए, वित्त मंत्री और RBI गवर्नर के रूप में वर्षों तक देश की आर्थिक नीति पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। संसद में उनके हस्तक्षेपों को व्यवहारिक बता रहे हैं. यही वो लोग हैं जिन्होंने कभी उन्हें भ्रष्टाचार का बादशाह कहा, पता नहीं कितने ऐसे मनगढंत घोटाले गढ़े गए जो कभी हुए ही नहीं, जो कभी अदालत में साबित ही नहीं हुए. इन मनगढंत घोटालों को उजागर करने वाले अधिकारी जो रिटायरमेंट के बाद सत्ता का सुख भोगते रहे, कभी कुछ नहीं बोले, मीडिया ने उनसे सैकड़ों बार सवाल किया मगर वो चुप रहे. मगर लेबल मनमोहन सिंह पर लगा चुप रहने का. इस मामले पर मनमोहन सिंह ने अपनी चुप्पी तोड़ी थी और बड़े ही अनोखे अंदाज़ में तमाचा मारा था, एक ऐसा तमाचा जिसको अगर महसूस किया जाय तो बड़ा ज़ोरदार था, ये अलग बात है कि बेशर्मों को ऐसी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। 2018 में ‘चेंजिंग इंडिया’ किताब का विमोचन हुआ था, छह-खंड की इस पुस्तक में डॉ. मनमोहन सिंह ने एक अर्थशास्त्री के रूप में अपने करियर के बारे में विचार लिखे थे कि कैसे उन्होंने भारत के बाजार को उदार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और फिर प्रधानमंत्री बने। डॉ. मनमोहन सिंह ने तब कहा था कि लोग कहते हैं कि मैं एक चुप रहने वाला प्रधानमंत्री था। लेकिन मुझे लगता है कि किताब के ये खंड खुद ही बोलते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री ने अपने आलोचकों को ज़ोरदार जवाब देते हुए कहा था कि मैं ऐसा प्रधानमंत्री नहीं था जो प्रेस से बात करने से डरता था। मैं नियमित रूप से प्रेस से मिलता था और हर विदेश यात्रा पर मैं वापस लौटने पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करता था। मनमोहन सिंह का वर्तमान प्रधानमंत्री पर ये पहला सीधा हमला था क्योंकि वर्तमान प्रधानमंत्री को मनमोहन सिंह का सबसे बड़ा आलोचक कहा जाता है, चाहे वो रेनकोट पहनकर नहाने की बात हो या फिर डॉलर के मुकाबले रूपये के पतले (गिरने) की बात हो. 2014 से पहले रूपये का गिरना देश की प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता था ये अलग बात है कि आज रुपया 85 रूपये से ज़्यादा पतला हो चूका है.

अपने चुप प्रधानमंत्री के टैग पर उनकी एक और टिप्पणी बड़ी चर्चा में रही थी. ये टिप्पणी 2014 में एक पत्रकार वार्ता के दौरान आयी थी और एक प्रधानमंत्री के रूप में ये उनकी आखरी पत्रकार वार्ता थी. तब उनसे अपने मंत्रियों पर लगाम न लगा पाने और कई स्थितियों में कार्रवाई न करने और चुप रहने के बारे में सवाल किया गया था और मनमोहन सिंह ने जवाब देते हुए कहा था कि इतिहास मेरे प्रति समकालीन मीडिया या संसद में विपक्षी दलों की तुलना में अधिक दयालु होगा। उन्होंने कहा था कि गठबंधन राजनीति की परिस्थितियों और मजबूरियों को ध्यान में रखते हुए मैंने परिस्थितियों के अनुसार जितना अच्छा कर सकता था, किया है। बता दें कि उस समय, यूपीए-2 सरकार अपने कई मंत्रालयों में भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझ रही थी, जो 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस की हार और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के सत्ता में आने के पीछे एक प्रमुख कारण था। ये वही आरोप थे जो CAG द्वारा गढ़े गए थे जिनकी चर्चा मैं पहले कर चूका हूँ और जो सिर्फ आरोप ही रहे, कभी साबित नहीं हो पाए यहाँ तक कि पिछले 11 वर्षों में भी नहीं जब सत्ता में मोदी के नेतृत्व में सरकार चल रही है.

26 सितंबर, 1932 को पंजाब के गाह में जन्मे मनमोहन सिंह का सफर एक ऐसे गांव में पढ़ाई में होनहार छात्र से शुरू हुआ जहां बिजली भी नहीं थी. 1957 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी की ऑनर्स डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने ऑक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र में डी.फिल. की। उन्होंने एक शिक्षाविद के रूप में अपना करियर शुरू किया और सार्वजनिक सेवा में आने से पहले पंजाब विश्वविद्यालय और बाद में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्यापन किया। 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव द्वारा वित्त मंत्री के रूप में डॉ. सिंह की नियुक्ति ने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। ऐसे समय में जब देश वित्तीय पतन के कगार पर था, डॉ. सिंह ने व्यापक उदारीकरण सुधारों की शुरुआत की। उन्होंने लाइसेंस राज को खत्म किया, निजी उद्यम को बंधनमुक्त किया और भारत द्वारा कुछ महीने पहले ही गिरवी रखे गए स्वर्ण भंडार को पुनः खरीदा। आज दुनिया उनके कामों को याद कर रही है, उन्हें याद कर रही है, उनकी सादगी को याद कर रही है, उनकी सादगी (जिसे विरोधी चुप्पी कहते थे) को याद कर रही है. मैं दावे से कह सकता हूँ कि उनकी गलत आलोचना करने वाले भले ही किसी राजनीतिक मजबूरी के चलते उनके पीछे पड़े रहे हों लेकिन आज उनके जाने के बाद उन्हें भी कहीं न कहीं इस बात का दिल में मलाल होगा कि ये बंदा इस तरह की आलोचनाओं का हकदार नहीं था.

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