- इस कारोबार से जुड़े पेइंग गेस्ट, होटल और टिफिन सर्विस जैसे बिजनेस इसी से जुड़े हुए हैं
- कोविड-19 के बढ़ते आउटब्रेक से यह कारोबार चार महीने से बंद चल रहा था
अमित बिश्नोई
कोविड-19 ने कोई भी कारोबार ऐसा नहीं छोड़ा जहां नुकसान न हुआ है. हालांकि अब धीरे-धीरे सभी बिजनेस को पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है. आपने कोटा, दिल्ली और प्रयागराज के कोचिंग संस्थानों के बारे में जरूर सुना होगा. 75 हजार करोड़ रुपए के करीब का इस बिजनेस पर कोरोना ने अपना डंक मार दिया था.
पांच महीने से बंद पड़े इस कारोबार पर बहुत गहरा असर पड़ा है. राजस्थान स्थित कोटा में तो इस कारोबार से हजारों लोग जुड़े हैं और पेइंग गेस्ट और होटल, टिफिन सर्विस और दूसरे कई सैकड़ों छोटे कारोबार इसी के भरोसे चलते हैं. महीनों नुकसान झेलने के बाद अब ऑनलाइन कोचिंग की नई-नई तकनीक से इस कारोबार से जुड़े लोगों में उम्मीद की नई किरण पैदा हुई है.
कई नामी-गिरामी संस्थानों ने हाल में ऑनलाइन कोचिंग शुरू की है. एक ताजा सर्वेक्षण से पता चला है कि तकनीक के बेहतर होने व इसकी पहुंच बढ़ने की वजह से अब प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले 90 प्रतिशत छात्र भी ऑफलाइन या क्लास रूम की जगह ऑनलाइन कोचिंग को ही तरजीह दे रहे हैं.
2014 में 7.10 करोड़ लोग प्राइवेट ट्यूशन लेते थे
देश में हाल के वर्षों में कोचिंग का कारोबार तेजी से बढ़ा है. इलाहाबाद और दिल्ली जैसे शहरों को छोड़ भी दें तो हाल के वर्षों में राजस्थान का अनाम-सा शहर कोटा देश के सबसे बड़े कोचिंग हब के तौर पर उभरा है. उद्योग-व्यापार संगठन एसोचैम ने वर्ष 2013 में ही अपनी एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया था कि वर्ष 2017 तक देश में कोचिंग उद्योग बढ़ कर 70 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा. वैसे, असंगठित क्षेत्र में होने की वजह से इस कारोबार के सटीक टर्नओवर का अनुमान लगाना कुछ मुश्किल है. लेकिन वर्ष 2014 में नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में फिलहाल 7.10 करोड़ छात्र कोचिंग या निजी ट्यूशन करते हैं.
कैसे बढ़ता गया कारोबार?
दरअसल, स्कूलों में पढ़ाई और शिक्षकों के खराब स्तर के साथ ही इंजीनियरिंग, मेडिकल और मैनेजमेंट संस्थानों में दाखिले के लिए बढ़ती गलाकाट होड़ ने कोचिंग के कारोबार को फलने-फूलने में भारी मदद पहुंचाई है. कोटा की कामयाबी के पीछे भी यही वजहें हैं. वहां तमाम कोचिंग संस्थानों में छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम और पैटर्न को घुट्टी में भर कर पिलाया जाता है. दो दशक पहले तक इस शहर को जेके सिंथेटिक्स और दूसरी छोटी-मोटी निर्माण कंपनियों के लिए जाना जाता था. लेकिन 1997 में जेके मिल के बंद होने से पांच हजार से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए थे. उसके बाद वर्ष 2017 में सरकारी इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड भी बंद हो गई. लेकिन उससे पहले ही इस शहर ने कोचिंग के तौर पर आजीविका की नई राह तलाश ली थी. जेके सिथेंटिक्स के एक रिटायर इंजीनियर बीके बंसल ने 1983 में यहां एक छात्र को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया था. फिर उन्होंने बंसल कोचिंग की स्थापना की जो नब्बे के दशक तक आईआईटी में प्रवेश के इच्छुक छात्रों के लिए मक्का बन गया. उसके बाद देखादेखी कई अन्य संस्थान शुरू हुए.
स्टूडेंट्स को किश्तों में भुगतान की सुविधा
कोरोना की वजह से छात्रों के घर लौट जाने के कारण स्थानीय लोगों की आमदनी अचानक गिर गई. कई कोचिंग संस्थानों को भी छात्रों से ली हुई अग्रिम फीस लौटानी पड़ी है. लेकिन अब ऑनलाइन कोचिंग के रास्ते ऐसे संस्थान नुकसान की भरपाई कर दोबारा अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास कर रहे हैं. यहां कोचिंग क्लासेज अमूमन फरवरी तक चलते हैं. यानी कोरोना के पांव पसारने से पहले ही 2019-20 के बैच की कोचिंग तो पूरी हो चुकी थी. अगले बैच के लिए दाखिला भी हो चुका था. लेकिन अचानक लॉकडाउन हो जाने की वजह से छात्र यहां नहीं आ सके. अब तमाम कोचिंग संस्थान ऑफलाइन की जगह ऑनलाइन कोचिंग की राह पर चल रहे हैं. इसके लिए ज्यादातर संस्थानों ने अपनी फीस नहीं बढ़ाई है. इसके साथ ही छात्रों को किश्तों में भुगतान की सुविधा भी दी जा रही है.

