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चुनौतियों से भरी है डगर, पर चलना भी है जरूरी


चुनौतियों से भरी है डगर, पर चलना भी है जरूरी

उत्तराखंड के नये सीएम रावत को करना होगा मुश्किलों का सामना
सीएम पद की रेस से दूर रहकर भी सीएम बने रावत को दौड़ना होगा तेज

न्यूज डेस्क। त्रिवेंद्र सिंह रावत के उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिये जाने के बाद अनेक नाम सीएम बनाये जाने की चर्चाओं में थे। मगर ताजपोशी हुई तीरथ सिंह रावत की जिनके नाम पर किसी ने सोचा तक नहीं था। चुनावी वर्ष में सीएम बने रावत की राह चुनौतियों से भरी है मगर इस डगर पर उनका चलना जरूरी भी है और मजबूरी भी। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से लगभग एक साल पहले सीएम बने रावत को जहां त्रिवेंद सरकार के फैसलों पर भी पुर्नविचार करना होगा वहीं पार्टी की अंदरूनी कलह और जनता के बीच व्याप्त नाराजगी को दूर करना भी उनके लिये मुश्किलों भरा होगा।

बीजेपी सांसद और राष्ट्रीय सचिव तीरथ सिंह रावत ने आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल सात दिन पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। अब उनके पास इतना ही समय है जिसमें उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना हैै। सबसे पहले तो उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद सिंह रावत के कार्यकाल में लिये गये ऐसे फैसलों पर पुनःविचार करना होगा जिन्होंने प्रदेश के साधु-संतों से लेकर आम जनता तक को नाराज कर दिया। गढ़वाल के हिस्से गैरसैंण मंडल में कुमांऊ के 2 जिलों को शामिल करने के निर्णय ने कुमाऊं मंडल में सियासी भूचाल ला दिया। वहीं उत्तराखंड देवस्थानम् बोर्ड बनाकर केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम को सरकार के अधीन करने के फैसले ने उत्तराखंड के संत समाज को नाराज कर दिया। रावत की ही पार्टी के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी थी। इस मामले की सुनवाई अभी सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किये जाने के निणर्य पर भी सरकार को समर्थन मिलता नहीं दिखा।

वहीं सीएम रावत को अब तक मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल बड़े नेताओं के मन पर छायी निराशा को दूर कर उन्हें साथ लेकर चलना होगा। तीरथ सिंह रावत को छह माह के भीतर चुनाव लड़कर विधानसभा का सदस्य बनना होगा। इसके लिये सुरक्षित सीट छोड़ने को कोई बड़ा नेता तैयार नहीं है। सतपाल महाराज ने सीट छोड़ने से इंकार किया तो धन सिंह और उनने बीच कहासुनी सबके सामने आ गयी। जाहिर है कि त्रिवेंद सिंह रावत को सीएम पद से हटाये जाने और तीरथ सिंह रावत को सीएम बनाये जाने के बाद भी भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं है। यानि नये सीएम को विपक्षियों का सामना करने के साथ अंदरूनी विरोधियो का भी मुकाबला करना होगा। विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी मंे हो रही खेमेबंदी पर लगाम लगाना तीरथ सिंह रावत के सामने बड़ी चुनौती होगी।

सीएम बने तीरथ सिंह रावत के पास लगभग एक साल का कार्यकाल बचा है लेकिन बतौर सीएम उनके पास निर्णय लेने के लिये मात्र 8 से 10 महीने ही हैं। क्योंकि चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद वह कोई ऐलान या नयी योजना शुरू नहीं कर पायेंगे। इतने कम समय मंे पार्टी की अंदरूनी राजनीति को साधना, ब्यूरोक्रेसी पर लगाम कस जनता के प्रति जवाबदेह बनाना और पूर्व सीएम के कार्यकाल की गलतियों का जवाब जनता को देने की चुनौती नये सीएम के सामने होगी। राज्य में तेज हो रहे किसान आंदोलन और किसानों में भाजपा के प्रति बढ़ रही नाराजगी को शांत करना भी उनके लिये मुश्किलों भरा होगा। वहीं 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिला कर फिर से सत्ता की चाबी सौंपने की चुनौती भी तीरथ सिंह रावत के सामने है। जाहिर है कि इतने कम समय में इतने काम करने के लिये नये सीएम को न सिर्फ तेजी दिखानी होगी बल्कि पार्टी से लेकर ब्यूरोक्रेसी तक को साधने के लिये सख्त कदम भी उठाने होंगे। इससे लोग नाराज भी हो सकते हैं लेकिन सीएम रावत को यह खतरा मोल लेना ही होगा। वरना 2022 के विधानसभा चुनाव आने तक उनके पास खोने के लिये भी कुछ नहीं बचेगा।

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