अमित बिश्नोई
देश के उच्च सदन के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड़ के तेवर इन दिनों विपक्ष पर बहुत तीखे हैं, तीखे तो तब भी थे जब वो मोदी-2 में पश्चिम बंगाल के गवर्नर का पद छोड़कर उपराष्ट्रपति बनाये गए थे और राज्यसभा का सञ्चालन कर रहे थे. तेवर तो पश्चिम बंगाल में भी काफी तीखे, आये दिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से टकराव होना एक आम थी, ये अलग बात है कि तब वो चाहकर भी ऐसा नहीं कर पा रहे थे, जैसा सभापति के रूप में वो राज्यसभा में कर रहे हैं. मोदी-3 में विपक्ष के साथ उनका टकराव कुछ ज़्यादा ही बढ़ता जा रहा है, इतना कि विपक्ष भी अब आर पार की लड़ाई के मूड में आ गया है और उनको पद से हटाने के लिए एकजुट हो गया है. ज़्यादती हर चीज़ की बुरी होती है, कुछ ऐसा ही मामला अब राज्यसभा में भी हो रहा है. धनकड़ जी को अब बार बार आसन का अपमान होता दिखाई देने लग रहा है, यहाँ तक कि कोई मुस्कराता भी है तो उन्हें लगता है कि ये आसन का अपमान है. बर्दाश्त की भी एक सीमा होती है जो 9 अगस्त को समाप्त हो गयी. सपा सांसद जया बच्चन के सब्र का बाँध टूट गया और उन्होंने खुले आम राज्यसभा के सभापति जगदीप धनकड़ के अंदाज़े बयां पर सवाल उठा दिया, सवाल ही नहीं उठाया बल्कि यह भी कह दिया कि इसे और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। फिर क्या हुआ, उपराष्ट्रपति महोदय फट पड़े, ऐसा भड़के कि महिला राज्यसभा के ऊपर व्यक्तिगत टिप्पणी तक कर बैठे। नतीजा ये हुआ कि पहले से एकजुट विपक्ष और नज़दीक आ गया और बात माफ़ी मांगने और अब उन्हें हटाने तक आ गयी.
विपक्ष का ये रूप और ये एकजुटता उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति को भारी पड़ सकती है. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को उनके पद से हटाने के लिए उनके खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 67 के तहत प्रस्ताव लाने की खातिर नोटिस देने की तैयारी हो रही है जिसके तहत 87 सांसदों के हस्ताक्षर भी हो चुके हैं. हालाँकि उपराष्ट्रपति को पद से हटाना विपक्ष के लिए संभव नहीं है लेकिन अगर उनके खिलाफ नोटिस भी आती है तो ये कोई मामूली बात नहीं है. विपक्ष के इस कदम से इस बात को तो बल मिलेगा ही कि सदन में जगदीप धनकड़ का व्यवहार बेहद पक्षपातपूर्ण और भेदभाव वाला रहता है, नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे जैसे अन्य सीनियर नेताओं के साथ उनका जिस तरह का व्यवहार होता है, उनके भाषण के दौरान जिस तरह सभापति द्वारा बार बार टोकाटाकी होती है और माइक तक बंद कर दिया जाता है, राज्यसभा की लाइव स्ट्रीमिंग में ये सब पूरा देश देखता है। किस तरह वो बार बार आसन का हवाला देकर अपने सम्मान की बात कहते हैं। उनकी बार बार ये शिकायत रहती है कि आसन का सम्मान नहीं किया जा रहा है.
जहाँ तक सम्मान की बात है तो वो माँगा नहीं जाता है, कमाया जाता है, अपने आचरण और अपने व्यवहार द्वारा। अगर आपका व्यवहार और आचरण इस तरह का है तो किसी को ये कहने की कभी ज़रुरत ही नहीं कि मेरा सम्मान करो, लोग अपने आप ही सम्मान करते हैं. सदन में, फिर वो चाहे लोकसभा हो या फिर राज्यसभा, आसन पर बैठा व्यक्ति हमेशा सम्मानित होता है क्योंकि वो पूरे सदन का प्रतिनिधि होता है, सत्ता पक्ष का भी और विपक्ष का भी लेकिन आसन पर बैठे व्यक्ति का आचरण जब सत्ता पक्ष के एक सदस्य की तरह होने लगे तो फिर बात धीरे धीरे बिगड़ती ही है. 9 अगस्त को सभापति जगदीप धनकड़ ने जिस तरह नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ व्यवहार किया वो इतने सीनियर नेता के साथ होना शोभा नहीं देता, विशेषकर आसन बैठे व्यक्ति द्वारा। उनके इसी व्यवहार पर जब सपा सांसद जया बच्चन जो फिल्म इंडस्ट्री की एक नामवर अदाकारा रही हैं और पांच बार की सांसद भी हैं, उन्होंने जब सभापति महोदय के टोन पर सवाल उठा दिया तो इतना भड़क गए कि अपने पद की मर्यादा तक भूल गए. पांच बार की संसद सदस्या को सेलिब्रिटी कहने लगे. डायरेक्टर के अधीन काम करने वाला बताने लगे, कहने लगे कि होंगी आप सेलेब्रिटी उन्हें परवाह नहीं। उनके भाषण को फिल्म स्क्रिप्ट से जोड़ने लगे और न जाने क्या क्या कहने लगे. और फिर जब उनके इस व्यवहार पर विपक्ष ने सदन का बहिष्कार किया तब भी उनकी गैरमौजूदगी में न जाने क्या क्या बोले।
विपक्ष के साथ उनका व्यवहार कैसा रहता है और विपक्ष के प्रति उनकी सोच कैसी है ये इस बात से आसानी से पता लगता है। सपा सांसद ने जब उनके टोन पर सवाल उठाया तो सत्ता पक्ष की तरफ से शोर उठा और तब सभापति जगदीप धनकड़ ने सत्ता पक्ष के सांसदों को बैठने के कहते हुए कहा कि I know to deal with it, यानि मैं इससे निपटना जानता हूँ. उन्होंने सही कहा क्योंकि वो लगातार ऐसा करते आ रहे हैं। विपक्ष के सांसदों को स्कूल के बच्चों की तरह फटकारते हुए नज़र आते रहे हैं, उन्हें ये भी एहसास नहीं रहता कि इनमें कितने नेता उनसे काफी वरिष्ठ है और उनका राजनीतिक जीवन उनसे बहुत लम्बा है. 9 अगस्त को जो हुआ और विपक्ष ने जिस तरह अपनी नाराज़गी दिखाई वो एक दिन की बात नहीं थी, ये लावा अंदर अंदर ही जमा हो रहा था जो अब फट पड़ा है और यकीन मानिये इस लावे की आग से सभापति बच तो ज़रूर जायेंगे लेकिन कहीं न कहीं ये लावा अपनी तपिश का उन्हें एहसास ज़रूर कराएगा। सभापति महोदय को ये नहीं भूलना चाहिए कि ये 2019 वाला विपक्ष नहीं है, यहाँ कांग्रेस पर हमला होने पर इंडिया गठबंधन सामने आकर खड़ा हो जाता है. लोकसभा में यही हुआ और राज्यसभा में भी। राहुल की जाति पर सवाल उठा तो अखिलेश सामने आ खड़े हुए और मल्लिकार्जुन खरगे के साथ गलत बर्ताव हुआ तो जया बच्चन सामने खड़ी दिखाई दीं. फिलहाल अनुच्छेद 67 के तहत प्रस्ताव लाने की खातिर नोटिस देने की ख़बरों पर धनकड़ जी की धड़कने तो ज़रूर बढ़ गयी होंगी.
