- राहुल-प्रियंका के साथ हुए दुव्र्यवहार ने फूंकी कांग्रेस में जान
- जयंत चैधरी पर हमले से जाट हुए सरकार के खिलाफ लामबंद
- दलित संगठन भी घटना के विरोध में एक साथ भर रहे हुंकार
सुनील शर्मा
न्यूज डेस्क। पूरे देश को झिंझोड़ कर रख देने वाले हाथरस प्रकरण में योगी सरकार की कार्यशैली और अधिकारियों की नजरअंदाजी सवालों के घेरे में रही। इस संवेदनशील मुद्दे की गंभीरता को न समझने वाले अधिकारी प्रकरण पर उठते सवालों का जवाब देने से बचते रहे। वहीं पीड़िता की मौत के बाद उसका जबरिया अंतिम संस्कार किये जाने पर सरकार को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा। पीड़िता की जुबां बंद हो जाने के बाद ही अधिकारियों ने अपनी जुबान खोली और दुष्कर्म को सिरे से नाकार दिया। अब इस प्रकरण में नये एंगल सामने आ रहे हैं और किसी भी दिन जेल में बंद आरोपियों को निर्दोष साबित कर असली हत्यारे को सामने लाने का दावा भी किया जा सकता है। और अब तो सच बताने वाली पीड़िता भी जिंदा नहीं रही। अब सच क्या है यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन हाथरस प्रकरण और उसके बाद बने राजनीतिक परिदृश्य ने उत्तर प्रदेश में विपक्ष को मजबूत कर दिया है। हाथरस प्रकरण को शुरूआत में गंभीरता से न लेने वाली प्रदेश सरकार के लिये यह प्रकरण गले की फांस बन गया है। प्रदेश में मृतप्राय पड़ी कांग्रेस में जान आयी तो लंबे समय बाद प्रदेश के जाट लामबंद हुए। दलित संगठन भी एक साथ हुंकार भर रहे हैं। वहीं मुजफ्फरनगर में हुई पंचायत में हरियाणा के नेता दीपेंद्र हुड्डा, इमरान मसूद, हरेंद्र मलिक जैसे नेताओं के शामिल होने से प्रदेेश में विपक्ष की एकजुटता का खतरा भी सरकार पर मंडरा रहा है।
देश की राजनीति में खास भूमिका निभाने वाला उत्तर प्रदेश, कंेद्र के सत्ता सिंहासन तक पहुंचने का प्रमुख मार्ग है। दशकों तक केंद्र और राज्य में सत्तारूढ रही कांग्रेस लंबे अरसे से उत्तर प्रदेश में अपना अस्तित्व बचाने का प्रयास कर रही थी। मगर हाथरस प्रकरण में पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे राहुल-प्रियंका गांधी को जबरन रोकना सरकार के गले की फांस और कांग्रेस के लिये संजीवनी बन गया। उत्तर प्रदेश में लगभग मृतप्राय स्थिति में आ चुकी कांग्रेस में हाथरस प्रकरण ने एक नयी जान फूंक दी है। राहुल का गिरना, कांग्रेस के लिये उठना साबित हुुआ। वहीं पुलिस द्वारा प्रियंका गांधी के साथ धक्का-मुक्की करना, कार्यकर्ताओं को लाठीचार्ज से बचाने के लिये प्रियंका का सामने खड़े होना कांग्रेस कार्यकर्ताओं को आंदोलित और उत्साहित कर गया। पूरे प्रदेश के कांग्रेसियों ने एकजुट होकर विरोध किया और कांग्र्रेस के प्रदेश संगठन में नयी जान आ गयी।
चैधरी चरण सिंह के जमाने में उत्तर प्रदेश के जाटों की तूती राज्य के साथ केंद्र के राजनीतिक गलियारों में भी बोलती थी। वक्त के साथ चैधरी अजित सिंह का जलवा कम हुआ और उन्हें जाट समुदाय की नाराजगी का शिकार होना पड़ा। वहीं जाट समुदाय का रूझान भी भारतीय जनता पार्टी की ओर होता जा रहा था। मगर जयंत चैधरी पर किये लाठीचार्ज से जाट समुदाय के भड़के आक्रोश ने उन्हें एकजुट कर दिया। गुरूवार को मुजफ्फरनगर में राष्ट्रीय लोकदल की लोकतंत्र बचाओ रैली को रोकने के प्रयास किये जाने के बावजूद जाटों ने एकजुट होकर हुंकार भरी है। इस महापंचायत में सपा-कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के अलावा भारतीय किसान यूनियन व 36 खाप मुखियाओं ने शामिल होकर समर्थन दिया। जनसभा में आयी भीड़ को देख जयंत चैधरी भी खासे उत्साहित दिखाई दिये। अगर जाटों की एकजुटता कायम रही तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद की गर्जना राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित अवश्य करेगी। बसपा और सपा भी इस घटना को लेकर विरोध जाहिर कर रही है। जयंत चैधरी की जनसभा में सपा और कांग्रेस के नेताओं ने भी भागीदारी कर एकजुटता का प्रदर्शन किया है।
एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलित संगठनों के भारत बंद में उत्तर प्रदेश में काफी हिंसा हुई थी। जिसके बाद हुई कार्रवाई और गिरफ्तारियों के कारण प्रदेश का दलित वर्ग सरकार के खिलाफ हो गया था। मगर दलितों के बसपा और भीम आर्मी में विभाजित हो जाने के कारण और सरकार के त्वरित कार्रवाई की बदौलत उस आंदोलन को दबा दिया गया था। मगर हाथरस प्रकरण में पीड़िता के दलित होने और आरोपियों के स्वर्ण जाति के होने के कारण जातीय आक्रोश फैल गया। सरकार ने आरोपियों को गिरफ्तार तो किया लेकिन सच को सामने लाने से न जाने क्यों बचती रही। ऐसे में दलितों के मन में पल रहा आक्रोश पीड़िता की मौत के बाद फूट पड़ा और तमाम दलित संगठन सड़कों पर उतर आये। हालांकि अच्छी बात यह रही की इस बार दलित समाज की ओर से हिंसा का प्रयास नहीं किया गया और उन्होंने लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात रख न्याय की मांग की।हाथरस प्रकरण का सच क्या है, अंत में कौन दोषी साबित होगा, सच सामने आयेगा या जांच के घेरे में ही घूम कर रह जायेगा। इन प्रश्नों का उत्तर भविष्य की गर्त में है। मगर हाथरस प्रकरण को गंभीरता से न लेने वाली प्रदेश सरकार और उसके अधिकारियों ने सरकार के विरोध में खड़े विपक्ष में नयी जान फूंक दी है। अगर यह एकजुटता कायम रही तो प्रदेश की राजनीति पर उसका प्रभाव पड़ना तय है। मुजफ्फरनगर में हुई रैली में एक ही मंच पर आये रालोद, कांग्रेस और सपा की एकजुटता ने निश्चित ही सरकार की पेशानी पर बल डाल दिये होंगे।

