उबैद उल्लाह नासिर
मोदी सरकार द्वारा लाये गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के विरोध और धरना जल्द समाप्त होने के आसार दिखाई नहीं देते सरकार और किसान नेताओं के बीच अब तक जो बात चीत हुई है उस में यह तो कहा जा सकता है की सरकार ने कुछ संकेत दिए हैं लेकिन दोनों के बीच कडुवाहट किस हद तक है इसका अंदाजा इस से लगाया जा सकता है की पहले दौर की बात चीत में किसानों में सरकार की चाय पीने से इनकार कर दिया और दुसरे दौर में खाना खाने से इनकार कर दिया था उधर मोदी परस्त मीडिया किसानों के आन्दोलन को खालिस्तान से जोड़ने और भाजपा की ट्रोल आर्मी ने हर विरोध की तरह किसानों के इस विरोध को भी देश द्रोही खालिस्तानी समर्थक पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने वाले आदि न जाने क्या क्या कह कर किसानों को और उत्तेजित कर दिया है I मोदी और अमित शाह के नेत्रित्व में बीजेपी का यह ख़ास कल्चर बन गया है की वह विरोध को देश द्रोह बता कर और उसे तरह तरह के नाम दे कर बदनाम कर देती है Iक्षात्रों के विरोध को टुकड़े टुकड़े गैंग,मुसलमानों के विरोध को आतंकवादी,बुद्धजीवियों के विरोध को खान मार्किट गैंग दलितों आदिवासियों के विरोध को नक्सली आदि बताना उसका कल्चर बन गया है और अपनी ट्रोल आर्मी और बिकाऊ TV चेनलों के माध्यम से उनका चरित्र हनन किया जाता रहा है यही अब किसानों के साथ किया जा रहा है Iलोकतंत्र में विरोध को न बर्दाश्त कर पाना लोकतंत्र की मूल भावना पर प्रहार है I
किसानो की मुख्य मांग कम से कम सहारा मूल्यों को कानूनी दर्जा देना,मंडी व्यवस्था को मज़बूत करना,और आवश्यक वस्तु अधिनियम को समाप्त न करना है उनकी चिंता है कि सरकार सहारा कीमतों को समाप्त कर के किसानों को बड़े व्योपारियों की दया पर छोड़ देगी और वही उनकी उपज का मूल्य निर्धारित कर के उनका खून चूसेंगे सरकार बार बार विश्वास दिला रही है की सहारा कीमतों का सिस्टम समाप्त नहीं किया जाएगा लेकिन मोदी सरकर जिस तरह कॉर्पोरेट घरानों के हितों में काम कर रही है उसके चलते किसानों का यह डर वाजिब हैं I यह सच है की सहारा कीमतों को कभी कानूनी दर्जा हासिल नहीं था लेकिन किसानों और सरकार के बीच एक विश्वास था इस लिए किसानों ने इससे पहले यह मांग कभी नहीं की थी लेकिन मोदी सरकार ने यह विश्वास डिगा दिया है इसलिए किसान सहारा कीमत को कानूनी दर्जा देने की मांग पर अड़े हैं I सहारा कीमत का मूल सिद्धांत यह है की यदि मार्किट में किसान को उसकी उपज का MSP से कम दाम मिल रहा है तो वह इस मूल्य पर किसान की वह उपज खरीद लेगी धान गेहूं आदि उपज में यह व्यवस्था चल भी रही है I पंजाब सर्कार ने इस ओर पहल करते हुए धान और गेहूं की साहारा कीमत (MSP) को कानूनी दर्जा दे दिया है इसके अलावा और भी कई कानून किसानों के हित में बनाए है लेकिन केंद्र सरकार के इशारे पर राज्य के गवर्नर ने अभी तक इस कानून को मंज़ूरी नहीं दी है यही नहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की हिदायत पर पंजाब के बाद राजस्थान की सरकार ने भी ऐसे ही कानून बनाने के लिए विधान सभा का जब विशेष सत्र बुलाने के लिए राज्यपाल से अपील की तो वह उसको भी अभी तक टाले हुए हैं I
मंडी व्यवस्था समाप्त हन्ना देश के गावों के विकास में बाधक होगा क्योंकि मंडी शुल्क के तौर पर सरकारी खजाने में अरबों रुपया जमा होता है जो गाँवों के विकास जैसे लिंक रोड, पुलिया, अस्पताल स्कूल ,आदि बनवाने के काम आता है I सरकार का कहना है की मंडी व्यवस्था समाप्त हो जाने से किसान अपनी उपज जहाँ अच्छे मूल्य मिलें वहां बेचने को आज़ाद होंगे I सवाल यह है की इसके लिए मंडी व्यवस्था समाप्त करने की क्या ज़रूरत है किसान यह काम तो वैसे भी कर सकते हैं दुसरे कौन इतना बड़ा किसान है और उसकी कितनी अधिक उपज है की वह लखनऊ से अपना माल कोल्कता ले जाके बेच सकेगा न वह यह कर पायेगा और न ही उसका इससे पड़ता आएगा दुसरे कृषि उपज के मूल्य लगभग देश भर में एक ही जैसे होते हैं नासिक की प्याज लखनऊ में भी उसी रेट पर मिलती है पंजाब का गेहू कालीकट में भी उसी रेट पर मिलेगा I
जहाँ तक ठेका खेती की बात है तो वह दो प्रकार की होती है एक तो यह कि किसान दुसरे किसान को अपने खेत सालाना नक़द भुगतान की बुनियाद पर दे या सालाना गल्ले की बुनियाद पर यह व्यवस्था सैकड़ों साल से चली आ रही है दुसरे ठेका खेती बड़े कॉर्पोरेट घरानो द्वारा कराई जाती है जो किसान से उसी का खेत ठेके पर ले कर उसी से अपनी ज़रूरत की फसल बोवाते है मगर खरीदारी के समय तरह तरह के व्योधान पैदा कर के उसका खून चूसते हैं जैसा अँगरेज़ किसान नील की खेती के लिए कराते थे I मोदी सरकार ने जस व्यवस्था को कानूनी शक्ल दे दी है लेकिन प्रावधान यह किया है की किसान और कम्पनी के बीच मतभेद पर किसान अदालत नहीं बल्कि SDM के यहाँ अपील कर सकेंगे ज़ाहिर है अफसर शाह किसान के बजाय कम्पनी का हित देखेंगे क्योंकि कम्पनी के हित के साथ सत्ताधारी दल का हित भी जुड़ा होगा I
इन तमाम मुद्दों पर किसानो और सरकार के बीच बातचीत का तीसरा राउंड भी आज या कल शुरू होगा सरकार ने कुछ बिन्दुओं पर किसानों की चिंताओं पर मुनासिब रुख अपनाया है लेकिन मुख्य बिन्दुओं पर मतभेद अभी बरक़रार हैं सरकार को किसानों के सामने झुकना तो पडेगा यह पक्का है क्योंकि देश भर के किसान आन्दोलित हैं और लम्बी लड़ाई के लिए तैयार हैं इसलिए सरकार अपनी जिद छोड़ कर उनकी वाजिब मांगो को जल्द से जल्द मान ले और अपने कार्यकर्ताओं ट्रोल आर्मी और भक्त मीडिया की बे सरपैर की बातों पर लगाम लगाये I

