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एक पहेली से कम नहीं कोरोना केस और मौतों के ऊपर नीचे होते आंकड़े


एक पहेली से कम नहीं कोरोना केस और मौतों के ऊपर नीचे होते आंकड़े

रंजीता सिन्हा
कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के बीच पॉजिटिविटी रेट घटने और रिकवरी रेट बढऩे की खबरों नेे वास्तव में राहत के देने के बजाय कन्फ्यूज्ड कर रखा है। कारण साफ है- एक ओर मौत के आंकड़े रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं और दूसरी ओर नदियों में लाशों के मिलने का सिलसिला थम नहीं रहा।
देश में बीते कुछ दिनों से रोज मिल रहे कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है। हालांकि, नए मरीजों की संख्या भले ही कम हो रही हो, लेकिन मौत के आंकड़ों में तेजी बरकरार है।

बुधवार को भी लगातार तीसरे दिन संक्रमण के 3 लाख से कम मामले सामने आएं, बावजूद इसके कई राज्यों में कोरोना से होने वाली मौतों का ग्राफ लगातार बढ़ा नजर आया। बुधवार को देशभर में कोरोना से 4,529 मौतें हुई हैं, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। आखिर क्या कारण है कि, देश में संक्रमण के मामलों में कमी लेकिन उससे होने वाली मौतों की संख्या में वृद्धि दर्ज की जा रही है। इस विषय पर हेल्थ एक्सपट्र्स ने चेतावनी देते हुए कहा है कि ये स्थिति अभी एक और हफ्ते तक जारी रह सकती है।

अगर एक्सपटर्स की टिप्पणियों का आंकलन करें तो पाएंगे कि, डॉ. राजीव पारख जो कि मेदांता के वैस्कुलर सर्जरी के अध्यक्ष हैं, ने कहा- देशभर में कोरोना से 4,000 से ज्यादा मौतें हो रही हैं और यह संख्या ज्यादा भी हो सकती है क्योंकि बहुतों ने टेस्ट ही न कराया हो? और उन मरीजों की भी मौत हो गई। डॉ. पारख के मुताबिक, दूसरी लहर में मृत्यु दर इसलिए ज्यादा है, क्योंकि इस लहर ने देश की एक बड़ी आबादी को प्रभावित किया है। डॉ. पारख ने यह भी कहा कि कोरोना की दूसरी लहर नए स्ट्रेन की वजह से गंभीर हुई है। पिछली बार का वायरस दूसरी लहर की तुलना में उतना गंभीर और जानलेवा नहीं था।


इन दिनों लखनऊ में कोविड मरीजों को घर-घर जाकर देखने की बीड़ा उठाए डॉ. राजेश प्रजापति कहते हैं कि, मरीजों या परिवारों को कभी भी अपने दम पर या बिना जानकारी के अपना कोई इलाज शुरू नहीं करना चाहिए और एक बार जब ऑक्सीजन का लेवल 92 प्रतिशत से नीचे चला जाता है, तो मरीज को तुरंत अस्पताल में भर्ती होना चाहिए या किसी एक्सपर्ट की सलाह लेनी चाहिए। दूसरी ओर होम्योपैथी चिकित्सा के बड़े पैरोकार और समाजसेवक डॉ. अनुरुद्ध वर्मा भी अपनी चिकित्सा पद्धति के साथ ऐसे मरीजों को समय के साथ डॉक्टरी सलाह पर एलोपैथिक चिकित्सा की कोरोना किट लेने की सलाह देने से नहीं चूकते।

बहरहाल, कोरोना से होने वाली मौतों के रिकॉर्ड तोड़ते आंकड़े गंभीर चिंता का विषय हैं। मौत के लिहाज से महामारी के बीच यह महीना सबसे ज्यादा घातक साबित हुआ है। हालांकि, विशेषज्ञों का दावा है कि, घटते मामले और बढ़ती मौतों के पीछे विविध कारण हो सकते हैं। वास्तविकता जो भी हो कोविड के मामलों में गिरावट के बावजूद उच्च मृत्यु दर से देश का कन्फ्यूज्ड होना स्वाभाविक है। मौतों के मामले में दुनिया के एक तरफ और भारत एक तरफ। देश एक सप्ताह से अधिक समय से हर रोज 4,000 से अधिक मौतों की रिपोर्ट कर रहा है।

खबरों पर गौर करें तो द इंडियन एक्स्प्रेस की एक रपट के मुताबकि, 13 दिन बीत चुके हैं, जब देश में मरीजों का रिकॉर्ड आंकड़ा दर्ज किया गया। इसके बाद से ही नए मरीजों की संख्या में गिरावट जारी है। आमतौर पर मौत के आंकड़ों में कमी आने में दो हफ्तों का समय लगता है। ऐसे में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कुछ दिनों में मौत की संख्या में गिरावट आएगी, लेकिन इस दौरान मौत की गिनती बढऩे की भी आशंका है।


ऐसा इसलिए भी हो सकता है, क्योंकि कई राज्यों में नई मौतों में कुछ दिनों और हफ्तों पहले के भी आंकड़े शामिल किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र में बीते 24 घंटे में कोरोना के 34,031 मामले सामने आए हैं और 594 लोगों की मौत हो गई। इस दौरान 51,457 लोग स्वस्थ भी हुए। जबकि इससे पहले सोमवार को 1,019 से ज्यादा मौतें हुईं। इनमें से 289 मौतें शनिवार से सोमवार के बीच हुईं।

हकीकत टटोलें तो यह भी पाते हैं कि, तमाम राज्यों में मृत्यु के आंकड़ों को दर्ज करने में प्रशासनिक स्तर पर होता विलंब, जिसकी अवधि बढ़कर हफ्तों तक जा सकती है। यकायक मृत्यु की गणित बढ़ा देता है। इस गणित में कई मृत्यु अप्रैल की भी थीं। एक सच्चाई यह भी है कि अप्रैल की मृत्यु दर का असर अब सामने आ रहा है।


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